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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 239 of 404

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Page 239

भाषाटीकासमेत । (२२१)
पित्तजश्लीपद ।
पित्तजं पीतसंकाशं दाहज्वरयुतं मृदु ।
पित्तकी श्लीपद पीले रंगकी, दाह और ज्वरयुक्त होय तथा नरम होय है ॥
श्लैष्मिकश्लीपद ।
श्लैष्मिकं स्निग्धवर्णं च श्वेतं पाण्डु गुरु स्थिरम् ॥ ३ ॥
कफकी श्लीपदका वर्ण चिकना, सफेद, पीला, भारी और कठिन होय है ॥
असाध्य लक्षण ।
वल्मीकमिव सञ्जातं कण्टकैरुपचीयते ।
अब्दात्मकं महत्तच्च वर्जनीयं विशेषतः ॥ ४ ॥
सर्पकी बांबीके समान बढी हुई और जिसके ऊपर कांटे होयँ, ऐसी एक वर्षकी
होगई हो और बडी होय उसको वैद्य त्याग दे ॥
श्लीपदमें कफको प्राधान्य अव्यभिचारकरके है उसको कहते हैं-
त्रीण्यप्येतानि जानीयाच्छ्लीपदानि कफोच्छ्रयात् ।
गुरुत्वं च महत्त्वं च यस्मान्नास्ति विना कफात् ॥ ५ ॥
इन पूर्वोक्त तीनों श्लीपदोंमें कफकी अधिकता है कारण इसका यह है कि, भारी
और महत्त्व ये दोनों कफके बिना नहीं होते ॥
श्लीपद कौनसे देशमें उत्पन्न होता है उसको कहते हैं-
पुराणोदकभूयिष्ठाः सर्वर्तुषु च शीतलाः ।
ये देशास्तेषु जायन्ते श्लीपदानि विशेषतः ॥ ६ ॥
वर्षार्ऋतुमें पानी अधिक वर्षे परन्तु पृथ्वीके नीचे होनेसे सूखे नहीं इसीसे पुराने
पानीका संचय ( इकट्ठा ) होय और सर्व ऋतुमें सरदी रहाकरे ऐसे जो अनूपदेश
( पूर्व आदि देश ) उनमें यह श्लीपदरोग विशेषकरके होय है । जांगल देशोंमें
अग्निका अधिक अंश होय है इससे उन देशोंमें जलको पुरातनत्व नहीं होय है और
अनूपदेशमें गरमी मन्द पडनेसे उष्ण ऋतुमें भी शीतलता होय है, हाथ कान
आदिमें श्लीपदरोगकी शंका होनेसे दोषोंके कोपद्वारा ज्वर करके श्लीपदको जान ले ॥
असाध्य लक्षण ।
यच्छ्लेष्मलाहारविहारजातं पुंसः प्रकृत्या च कफात्मकस्य ।
सास्रावमत्युन्नतसर्वलिङ्गं सकण्डुरं श्लेष्मयुतं विवर्ज्यम् ॥ ७ ॥

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA