किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
by महाकवि भारवि
Source: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (origin)
About this granth
The Kiratarjuniyam (किरातार्जुनीयम्) of Bharavi is one of the three 'great epics' (brihattrayi) of Sanskrit, with Magha's Shishupalavadha and Shriharsha's Naishadhiyacharita. From a brief episode of the Mahabharata's Vana Parva, Bharavi builds eighteen cantos: Arjuna performs austerities on Mount Indrakila to win divine weapons, Indra tests him with apsarases and gandharvas, and finally Shiva, disguised as a Kirata hunter, fights him and, pleased with his courage, grants him the Pashupata weapon. Bharavi is admired for his weight of meaning and his maxims.
This scan is the complete edition, No. 241 of the Kashi Sanskrit Series, published by Chaukhambha Prakashan, Varanasi. It contains Mallinatha's classic Ghantapatha commentary, the Sudha commentary of Gangadhara Sharma and Parameshvaradin Pandeya, and a Hindi commentary and Sanskrit introduction by Acharya Sheshraj Sharma Regmi.
The introduction identifies Arjuna as the hero, Shiva as the Kirata as his rival and heroism as the main rasa, and summarises each canto, from the apsarases' journey to Indrakila to Indra's dialogue with Arjuna in the guise of an old Brahmin.
| अलङ्कारस्थापना | ४२७ |
|---|---|
| ४३ वस्तुध्वनि — त्रयो० २३, २७। | ५८ संसृष्टि — द्वि० ५०, तृ० ४६, च० १७, प० १८, २० २३, सप्त० १२ अष्ट० १, ७, १०, ४६, न० ६३, ६४, द० ३२, पञ्चद० १६, सप्तद० ४६। |
| ४४ वास्तव — च० २२। | ५९ संदेह — च० ५, पं० १२, ३६, ष० १२, अष्ट० १५, ३५, ३६, ५३, न० ७, १५, ९२, ९४। |
| ४५ विभावना — प० २६, अष्ट० ४०, न० २५। | ६० सम — द० २५। |
| ४६ विरोध — द० १४। | ६१ समपरिवृत्ति — स० ३५। |
| ४७ विरोधाभास — न० ६३, ६४, एका० ३५, द्वा० १६, अष्टाद० ४१। | ६२ समासोक्ति — प्र० १८, तृ० ४४, ६०, प० २७, अष्ट० ६, न० ५, ११, द० ३१, चतुर्द० ३। |
| ४८ विशेषोक्ति — तृ० ८। | ६३ समाहित — द० ५१। |
| ४९ विषम — अष्ट० ४१, द० ३८। | ६४ समुच्चय — पञ्चद० १, षो० ३५। |
| ५० वृत्त्यनुप्रास — प्र० १। | ६५ सर्वतोभद्र — पञ्चद० १५। |
| ५१ व्यतिरेक — प० ४४, एका० ६३, द्वा० १४, त्रयो० ५१, ५३। | ६६ सहोक्ति — प्र० ३९, द० ३९, ४८। |
| ५२ शृङ्खला यमक — पञ्चद० ४२। | ६७ सामान्य — अष्ट० ४२। |
| ५३ श्लिष्टोपमा — न० १८। | ६८ स्मरण — च० ३८, प० २४, ष० १२। |
| ५४ श्लेष — अष्ट० २, द० २४, ३४, एका० ५९, त्रयो० १४, १५, चतुर्द ५२, सप्तद० २७। | ६९ स्वभावोक्ति — च० १०, १३, १६ १७, १८, २९, ष० १५, सप्त० १२, १९, अष्ट० १७, १८, २२ २६, ४५, ४९, द्वा० ४२, त्रयो० १८, २२, ३०, ३१, चतुर्द० १६। |
| ५५ संशय — न० ६९। | ७० हेतूत्प्रेक्षा — द्वि० १०, अष्ट २०। |
| ५६ सङ्कर — च० ३४, प० २६, ष० २, ८, ४० ४१, स० २३, २५, अष्ट० ६, ११, १५, १८, ४२; न० ३, ५, १२, १४, २७, ३२, ५५, ५७, ६२, द० २४, २५, ३४, ३६, द्वा० १४, त्रयो० २१, ५३, ६६, चतुर्द० २९, षो० ३५। | |
| ५७ संसर्ग — अष्ट० २। |
किरातार्जुनीयव्याख्यायां प्रमाणत्वेन समुपन्यस्तानां ग्रन्थानां ग्रन्थकाराणां च नामानि ।
| ग्रन्थ / ग्रन्थकार | ग्रन्थ / ग्रन्थकार |
|---|---|
| अगस्त्यः १२।४० | मनुः १।१७, २।६, १४।६ इत्यादि |
| अमरः १।१, १।२, १।७, इत्यादि | माघः ५।३, ८।४९. |
| आगमः १।४६, ३।३७, ९।३ इत्यादि. | मातङ्गः ४।३३. |
| आलङ्कारिकाः १।१, १८।४८. | मार्तण्डः ८।१५. |
| कामन्दकः १।३१, २।६, २।१० इत्यादि | यादवः १।३४, ३।११, ७।४ इत्यादि. |
| काव्यप्रकाशः १।८, १।१२, १।३९ इ० | रघुवंशन् ८।४९. |
| काशिका १।३, १।६, २।११ इत्यादि. | रघुवंशसञ्जीविनी ११।७६. |
| केशवः २।२१, ८।२४, ९।११ इत्यादि | रसरत्नाकरः ९।७२. |
| कैयटः १।१, १।१०, ८।११ इत्यादि. | रसिकाः १२।४०. |
| क्षीरस्वामी १।९, १।२१, १०।३. | रामायणम् १।९. |
| गणव्याख्यानम् २।१७, २।३०, ३।६ | रुद्रटः ५।८. |
| दण्डी १।४६, ८।४४. | वाग्भटः ५।८. |
| दशरूपकम् ८।१३, ९।२६ ९।४५. | वात्स्यायनः ९।४७. |
| धन्वन्तरिः ४।२८. | वामनः २।२७, २।३७, ४।२४ इत्यादि. |
| नारदः १।१३. | विद्याधरः ४।३८. |
| निरुक्तम् ७।१०. | विश्वः १।८, १।९, १।२४ इत्यादि. |
| नीतिवाक्यामृतम् १।२, १।४, १।२६. इत्यादि. | वैजयन्ती १।१३, २।८, ४।३६ इत्यादि. |
| नृत्यविलासः ८।५३. | वैद्यकम् ५।११. |
| नैषधम् ८।४९. | व्यक्तिविवेकः ३।२१. |
| न्यायः १।२४, २।५. | शब्दार्णवः ८।३१. |
| न्यायोद्द्योतः २।१७. | शाकटायनः ३।३५. |
| पाण्डुकाव्यम् ७।८. | शाश्वतः २।२२, ३।५, ७।२७ इत्यादि. |
| पुराणम् २।२६. | सज्जनः १३।४५, १४।२७, १६।५९. |
| प्रकाशवर्ष ४।१०. | सर्वस्वकारः २।१८, ९।१५. |
| भारतम् ५।३०, १३।१०, १४।१०. | सामुद्रिकाः ६।१. |
| भाष्यकारः १।१, १।१०, ८।११ इत्यादि | स्मरणम् (स्मृतिः) १।१३, ६।२९ इत्या- |
| हलायुधः २।३, ४।१८, ७।१३. | |
| हैमः १।२९, ५।४९, १०।३. |
श्लोकानामकाराद्यनुक्रमणिका
अ
| श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० | श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| अकृत्रिमप्रेमरसाभिरामं | ३ | ३७ | अथ शशधरमौलेरस्य | १८ | ४६ |
| अखण्डमाखण्डल | १ | २९ | अथ स्फुरन्मोनविधूत | ८ | २७ |
| अखिलमिदममुष्य | ५ | २१ | अथ स्वमायाकृतमन्दिरो | ८ | ८ |
| अगूढहासस्फुटदन्त | ८ | ३६ | अथ हिमशुचिभस्म | १८ | १५ |
| अग्रमानुषु नितान्त | ९ | ७ | अथाग्रे द्रुनता मार्वि | १५ | ७ |
| अचक्रमत सपह्लवां | १० | ४९ | अथापदामुद्धरणक्षमेषु | १७ | १ |
| अचित्ततायामपि | १७ | ४७ | अथामिपश्यन्निव | ३ | ५६ |
| अचिरेण परस्य | २ | ९ | अथामयस्मिन्मशचिच | ११ | १ |
| अजन्मा पुरुषस्तावत् | ११ | ७० | अथारुवन्नैरासनतः | २ | ५७ |
| अजस्रमोजिह्मममोघ | १४ | ५७ | अथो शरस्तेन मदर्थं | १४ | १७ |
| अणीयसे विश्वविधा | १८ | ४१ | अथोष्णमासेव सुरेह | ३ | ३२ |
| अणुरप्युपहन्ति | २ | ५१ | अशोषितं वैद्युतजातवेदसा | ४ | २१ |
| अतिपातितकाल | २ | ४२ | अथ क्रिया कामदुघाः | ३ | ६ |
| अतिशयितवनान्तर | १० | ८ | अधरीचकार च विवेक | ६ | २१ |
| अतीतसंख्या विहिता | १४ | १० | अधिगक्य गुह्यकादिति | ६ | ३८ |
| अत्यर्थं दुरुपसदानुपेत्य | ५ | ९ | अधिरुह्य पुष्पभरनम्रशिखैः | ६ | १७ |
| अथ कृतकविलोभनं | १० | १७ | अनादरोपात्तघृतैक | १४ | ३६ |
| अथ क्षमामेव | १ | ४४ | अनाप्तपुण्योपचये | ३ | ५ |
| अथ चंदवभिः | २ | १६ | अनामृशन्तावक्वचिदेव | १७ | ३३ |
| अथ जयाय नु प्रेहमयी | ५ | १ | अनायुधे सत्त्वजिघांसिते | १४ | १६ |
| अथ दीपितवारिवाह० | १३ | २० | अनारतं तेन पदेषु | १ | १५ |
| अथ दीर्घतमं तमः | १३ | ३० | अनारतं यो मणिपीठ | १ | ४० |
| अथ भूतभव्यभवदीश | १२ | १९ | अनिर्जयेन द्विषतां | ११ | ७१ |
| अथ भूतानि वार्त्रघ्न | १५ | १ | अनुकूलपातिनमचण्ड | ६ | २५ |
| अथ वासवस्य वचनेन | १२ | १ | अनुकूलमस्य च विचिन्त्य | १२ | ४३ |
| अथ विहितविषेयै | १६ | ६२ | अनुचरेण धनाधिपतेरथ | ५ | १६ |
| अथ वैष कृतज्ञयेव पूर्वं | १३ | ५ | अनुजगु रथ दिव्यं | ३ | १० |
| अनुजानुमण्यमवसक्त | १२ | २२ |
४३०
किरातार्जुनीयम्
| प्रतीक | स० | श्लो० | प्रतीक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| अनुद्धताकारतया | ३ | ३ | अभिमुनि सहसा | १० | ४५ |
| अनुपालयता मवे | २ | १० | अभियोग इमान | २ | ४६ |
| अनुभाववतावुरु | १३ | १५ | अभिरश्मिमालि | १२ | २ |
| अनुशासतमित्यना | २ | ५४ | अभिलषत उपायं | १७ | ६४ |
| अनुसानु पुष्पितलता | ६ | १ | अभिवर्षति योऽनु | २ | ३१ |
| अनुहेमवप्रमरुणैः सयतां | ६ | ८ | अमूतमामज्य विरुद्ध | १४ | १९ |
| अनेकराजन्य रथाश्व | १ | १६ | अभ्यधानि मुनिचापलात् | १३ | ६३ |
| अनेन योगेन विवृद्ध | ३ | २८ | अभ्यायत: सन्ततधूम | १६ | ६ |
| अन्तः पर्यवस्थाता | ११ | १३ | अमविणां कृत्यमिव | १४ | ६३ |
| अन्तिकाऽन्तिकगतेन्दु | ९ | २१ | अमी पृथुस्तम्ब्रभृतः | ४ | २६ |
| अन्यदीयविशेखे न | १३ | ४६ | अमी समुद्भूतसरोज | ४ | १५ |
| अन्यदोपमिव स स्वकं | १४ | ४८ | अपयार्थक्रियारम्भैः | ११ | ५२ |
| अन्योन्यरक्तमनसा | ९ | ७४ | अयमच्युतश्च वचनेन | १२ | ३५ |
| अपनेयमुदेतुमिच्छता | २ | ३६ | अयमसौ भगवानुत | १८ | ९ |
| अपयन्धनुषः शिवान्तिक | १३ | २३ | अयमेव मृगऽस्वकाम | १३ | ९ |
| अपरा गसमीर णे | २ | ५० | अयं व. बलैड्यमापन्नाम् | १५ | १९ |
| अपवर्जितविप्लवे | २ | २६ | अलकाधिपभृत्यदर्शितं | ३ | ५१ |
| अपवादाभीतस्य | ११ | ५६ | अलकृतानाममृतो | १७ | २९ |
| अपश्यद्भिरिवेशानं | १५ | २ | अलङ्घ्य तत्तदुदीक्ष्य | १९ | ६० |
| अपहृष्येऽथवा सद्भिः | ११ | ६८ | अलङ्घयत्वाज्जनेः | ११ | ४० |
| अप्राकृतस्याहव | १६ | २४ | अलमेष विलोकितः | ५ | १७ |
| अभितस्तं पृथासूनुः | ११ | ८ | अलसपदमनेोरमं प्रकृत्या | १० | ६० |
| अभिद्रोहेण भूतानाम् | ११ | २१ | अवचयपरिभोगवन्ति | १० | ५ |
| अभिनयमनसः | १० | ४२ | अवद्यन्विशिखः शम्भोः | १५ | ३७ |
| अभिभवति मनः कदम्ब | १० | २३ | अवधूतपङ्कजपराग | ६ | ३ |
| अभिभवोदितमन्यु | १८ | ७ | अवधूयारिभिर्नीता | ११ | ५८ |
| अभिमानधनस्य | २ | १९ | अवन्ध्यकोपस्य | १ | ३३ |
| अभिमानवतो | २ | १३ | अवरुग्णतुङ्गसुरवा रु | ६ | ५ |
श्लोकानुक्रमणिका
४३१
| श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० | श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| अवलीढसनाभिरश्वसेनः | १३ | ११ | अंसस्थले केचिद् | १६ | ३० |
| अवहितहृदयो विधाय | २ | ५८ | अंसाववहृद्वनतो | १६ | २१ |
| अविप्रहृष्याप्यनुलेन | १८ | ३३ | आ | ||
| अविज्ञातप्रबन्धस्य | ११ | ४३ | आकारमाशंसितभूरि | ३ | २७ |
| अवितृप्ततया तथापि | २ | २९ | आकीर्णं बलरजसा | ७ | ३६ |
| अविभावितनिष्क्रमं | १३ | २७ | आकीर्णा मुखनलिनेः | ७ | १८ |
| अविमृष्यमेतदभिलष्यति | ६ | ४४ | आकुमारमुपदेष्टु | १३ | ४३ |
| अविरतोजितवारि | ५ | ६ | आकुलभ्रलतस्त्रि | ९ | ८ |
| अविरलफलिनीवनं | १० | २८ | आसिसचापावरणेपु | १७ | ५९ |
| अविरलमलसेषु | १० | ४३ | आसिप्तसम्पातमपेत | १६ | ४१ |
| अविलङ्घ्यविकंपणम् | ३ | ५७ | आक्षिप्यमाणं रिपुभिः | ३ | ५० |
| अविवेकवृथाश्रमा | १३ | २९ | आघट्टयामास गता | १७ | ३८ |
| असकलनयनेक्षितानि | १० | ५९ | आघ्राय सद्यमतिवृप्य | ७ | ३४ |
| असजमाराधयतो | १ | ११ | आतपे धृतिमतो | ९ | ३० |
| असमापितकृत्य | २ | ४८ | आतिथेयीमथासाद्य | ११ | ९ |
| असावनास्थापरया | ४ | ३४ | आत्मनोनमुपतिष्ठते | १३ | ६९ |
| असिः शरा वर्म धनुश्च | १४ | २० | आत्मलामपरिणाम | १८ | ३४ |
| असङ्कदीनामपुत्रीप | १६ | १० | आदृता नलपदैः | ९ | ४१ |
| असंविदानस्य ममेश | १८ | ४२ | आत्राधामरणभया | १८ | ३९ |
| असंशयं न्यस्तमृषान्त | ८ | २८ | आपत्तभ्रमरकुला | ७ | १० |
| असंशयालोचितकार्य | ३ | ३३ | आमोदवासितचला | ९ | ७७ |
| असहायोत्साहं जयिनं | १८ | ४७ | आयस्तः सुरसरिदोध | ७ | ३२ |
| अस्त्रवेदमधिगम्य तत्त्वतः | १३ | ६२ | आरोढुः समवनतस्य | ७ | १३ |
| अस्त्रवेदविद्यं महो | १३ | ६७ | आशंसितापचिति | ६ | ४६ |
| अस्त्रैः समानामपि | १७ | ३६ | आशु कान्तमभिसारित | ९ | ३८ |
| अस्मिनगुह्यात् पिनाक | ५ | ३१ | आसक्तभरनीकाशै | ११ | ५ |
| अस्मिन्यशः पौरुष | १६ | ९ | आसक्ता धूरियं | ११ | ७७ |
| अंशुपाणिभिरतीव | ९ | ३ | आसन्नद्विपपदवीमदा | ७ | ३४ |
४३२ | किरातार्जुनीयम्
| श्लोकांश | स० | श्लो० | श्लोकांश | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| आसादिता तत्प्रथमं | १६ | २७ | इदमीदृग्गुणोपेतं | ११ | ४१ |
| आसुरं लोकविश्राम | १५ | २८ | इमान्यमूनीत्यपवर्जिते | ८ | १० |
| आसेदुषां गोत्रभिदो | १८ | १८ | इमामदं वेद न तावकीं | १ | ३७ |
| आस्निग्व्यशब्दनभसः | १८ | ४३ | इयमिष्टगुणाय रोचतां | २ | ५ |
| आश्यामालाभ्य नीतेषु | १५ | ४ | इयं च दुर्वारमहारथानां | १६ | १७ |
| आस्थितः स्थगित | ९ | ९ | इयं शिवाया नियते | ४ | २१ |
| आहिते नु मधुना | ९ | ६६ | इह दुरधिगमः किञ्चिदेवा | ५ | १८ |
| इ | इह वीतभयास्तपोऽनुभावा | १३ | ४ | ||
| इच्छतां सह वधूभिः | ९ | १३ | इह सनियमयोः सुराप | ५ | ४० |
| इतरेतरानभिभवेन | ६ | ३४ | ई | ||
| इति कथयति तत्र | ४ | १७ | ईशार्थमम्भसि चिराप | ५ | १९ |
| इति गां विधाय विरतषु | १२ | ३२ | उ | ||
| इति चालयन्नचलसानु | १२ | ५२ | उच्चतां स वचनीय | १ | ३९ |
| इति तानुदारमनुनीय | १२ | ४० | उज्झतीशुचमिवाशु | ९ | १८ |
| इति तेन विचिन्त्य चाप | १३ | १८ | उज्झत्सु संहार इवा | १६ | १६ |
| इति दर्शितविक्रियं | २ | २५ | उत्फुल्लस्थलनालिनी | ५ | ३९ |
| इति निगदितवन्तं | १८ | ४४ | उत्सङ्गे मणिविषमे ममं | ७ | २१ |
| इति ब्रूवाणेन महेन्द्र | ३ | २० | उत्सृष्टवज्रकुशकङ्कटा | ७ | ३० |
| इति विविधमुदासे | १६ | ६३ | उदस्य धैर्यं दयितेन | ८ | ५० |
| इति विषमिवचक्षुषा | १० | ५६ | उदारकीर्तेरुदयं | १ | १८ |
| इति शासति सेनान्या | १५ | २९ | उदाहरणमाशीःषु | ११ | ६५ |
| इतीरयित्वा गिरमात्त | १ | २६ | उदितोपलस्खलन | ६ | ४ |
| इतीरिताकूतमनील | १४ | २४ | उदीरितां तामिति | ३ | ५५ |
| इत्थं विहृत्य वनिताभि | ८ | ५५ | उदूढवक्षःस्थगितैक | १४ | ११ |
| इत्युक्तवन्तं परिरम्य | ११ | ८० | उद्गतेन्दुमविभिन्न | ९ | २४ |
| इत्युक्तवन्तं व्रज साधये | ३ | २४ | उन्मज्जन्मकर इवा | १७ | ६३ |
| इत्युक्तवामुषितविशेष | ३ | १० | उपकार इवासति | १३ | ३३ |
| इत्युक्त्वा सपदि द्वितं | ५ | ५१ | उपकारकमाहते | २ | ४४ |
श्लोकानुक्रमणिका
<div align="right">४३३</div>| श्लोक | स० | श्लो० | श्लोक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| उपजापसहान्बिल | २ | ४७ | कच्छान्ते सुरसरितो | १२ | ५४ |
| उपपत्तिरुदाहृता | २ | २८ | कतिपयसहकारपुष्प | १० | ३० |
| उपलभ्य चञ्चलतरङ्ग | ६ | १४ | कथमिव तव सम्मति | १० | ४६ |
| प्लावितोद्धततरङ्ग | ६ | १० | कथं वादीयतामर्वाङ् | ११ | ७६ |
| उपाघत्त सपत्नेषु | ११ | ५० | कथाप्रसङ्गेन जनैः | १ | २४ |
| उपारताः पश्चिमरात्रि | ४ | १० | कपोलसंश्लेषि विलो | ४ | ९ |
| उपेयुषीणां बृहतीरधि | ८ | १२ | करणस्पृष्टङ्गलनिःसृतयोः | १८ | ११ |
| उपेयुषी बिभ्रतमन्तक | १४ | ३८ | करिष्यसे यत्र सुदुश्च | ३ | २९ |
| उपैति सस्यं परिणाम | ४ | २२ | करुणमभिहितं त्रपा | १० | ५८ |
| उपैत्यनन्तद्युतिरप्य | १६ | ६१ | करोति योऽक्षोपजनाति | ३ | ५१ |
| उपोढकल्याणफलो | १७ | ५४ | करो धुनाना नवपल्लवाकृति-पयस्यगाधे | ८ | ४८ |
| उमापति पाण्डुसुत | १७ | १२ | करो धुनाना नवपल्लवाकृति-वृथा कृता | ८ | ७ |
| उरसि शूलभृतः प्रहिता | १८ | ५ | कलत्रभारेण विलोल | ८ | १० |
| उरु सत्त्वमाहु विदरि | ६ | ३५ | कवचं स बिभ्रदुपवीत | १२ | ९ |
| ऊ | कषणकम्पनि रस्तघटा | ५ | ४७ | ||
| ऊर्ध्वं तिरश्चीनमधश्च | १६ | ५० | कान्तदूत्य इव कुङ्कुम | ९ | ६ |
| ऋ | कान्तवेश्म बहु सन्दिशती | ९ | ३७ | ||
| ऋषिवंशजः स यदि | ६ | ३६ | कान्तमङ्गमपराजित | ९ | ५२ |
| ए | कान्ताजनं सुरतखेद | ९ | ७६ | ||
| एकतामिव गतस्य | ९ | १२ | कान्तानां कृतपुलकः | ७ | ५ |
| एवं प्रतिद्वन्द्विषु तस्य | १७ | १८ | कि गतेन न हि युक्त | ९ | ४० |
| ओ | कि त्यक्तापास्तदेवन्व | १५ | २१ | ||
| ओजसापि खलु नून | ९ | ३३ | किमपेक्ष्य फलं | २ | २१ |
| ओष्ठपल्लवविदंश | ९ | ५७ | किमसामयिकं वित | २ | ४० |
| औ | कि मुपेक्षसे कथय | १२ | ३१ | ||
| औपसत्पमयादव | ९ | ११ | किरातसैन्यादुरुचाप | १४ | ४५ |
| क | |||||
| ककुदे वृषस्य कृत | १२ | २० |
२८ कि०
४३४ | किरातार्जुनीयम्
| पाद / श्लोकांश | स० | श्लो० | पाद / श्लोकांश | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| कुप्यताशुभ्रवतानत | ९ | ५३ | क्षीणयावकरसोऽप्यति | ९ | ६२ |
| कुररीगणः कृतरवस्तरवः | ५ | २५ | क्षुभितामिनिसुतः | १२ | ४५ |
| कुरु तन्मतिमेव | २ | २२ | क्षोभेण तेनाथ गणा | १७ | २२ |
| कुरु तात तपांस्यमार्ग | ११ | १३ | ख | ||
| कुसुमनगवनान्युपेत | १० | ३१ | खण्डिताशंशया तेषां | १५ | ३ |
| कुसुमितमवलम्ब्य | १० | ५३ | ग | ||
| कृतधृति परिवन्दिते | १८ | २१ | गणाधिपानामविधाय | १४ | ५४ |
| कृतप्रणामस्य महीं | १ | २ | गणयति नखलेखा | ९ | ७८ |
| कृतं पुरुषशब्देन | ११ | ७२ | गतान्पशूनां सहजन्म | ४ | १३ |
| कृतवानन्यदेहेषु | ११ | २६ | गतैः परेषामविभाव | १४ | ५२ |
| कृतानतिर्व्याहतसा | ४ | ४१ | गतैः सहावैः कलहंस | ८ | २९ |
| कृतान्तदुर्वृत्त इवा | १६ | २९ | गन्धमुद्धतरजःकण | ९ | ३१ |
| कृतारिषड्वर्गनयेन | १ | ९ | गभीररन्ध्रेषु भृशं मही | १४ | ४६ |
| कृतावधानं जितबर्हि | ४ | ३३ | गम्यतामुपगते नयनानां | ९ | ४ |
| कृतोर्मिरेखं शिथिलत्व | ४ | ६ | गुणसम्पदा समधिगम्य | ५ | २४ |
| कृष्णद्वैपायनादेशात् | ११ | ४६ | गुणानुरक्तामनुरक्त | १ | ३१ |
| को न्विमं हरितुरङ्ग | १३ | ५० | गुणापनादेन तदन्य | १४ | १२ |
| कोऽपवादः स्तुतिपदे | १२ | २५ | गृहक्रियारम्भफलं | १४ | ४२ |
| क्रान्तानां ग्रहचरितात् | ७ | १२ | गुरुस्थिराणुत्तम | १६ | २८ |
| क्रामद्भिर्धनपदवोमनेक | ५ | ३४ | गुरून्कुर्वन्ति ते वंश्यान् | ११ | ६४ |
| क्रियासुयुक्तैर्नृप | १ | ४ | गूढोऽपि वपुषा राजन् | ११ | ६ |
| क्रोधान्धकारान्तरितो | १७ | ९ | ग्रसमानमिवोजांसि | ११ | ७३ |
| क्लान्तोऽपि त्रिदशवधू | ७ | २१ | ग्रहविमानगणानभितो | ५ | १४ |
| क्व चिराय परिग्रहः | २ | ३९ | घ | ||
| क्षत्रियस्तनयः पाण्डोः | ११ | ४५ | घनपोत्रविदीर्णशाल | १३ | ३ |
| क्षययुक्तमपि स्वभावजं | २ | ११ | घनं विदार्यार्जुन | १४ | ५० |
| क्षितिनभःसुरलोक | ५ | ४ | घनानि कामं कुसुमानि | ८ | ४ |
| क्षिपति योऽनुवनं | ५ | ४५ |
श्लोकानुक्रमणिका
४३५
| श्लोक | स० | श्लो० | श्लोक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| च | जलदजालघनैरुसिता | ५ | ४८ | ||
| चञ्चलं वसु नितान्त | १३ | ५३ | जलोवसंमूर्च्छनमूच्छित | १६ | ५९ |
| चतसृष्वपि ते विवेकिनी | २ | ६ | जहातु नैनं कथमर्थ | ३ | १४ |
| चमरीगणगंगबलस्य | १२ | ४७ | जहार चास्मादचिरेण | १७ | ४४ |
| चयानित्वाद्रीनिव | १६ | ५२ | जहिहि कठिनता | १० | ५० |
| चलनेऽवनिञ्चलति | १२ | २८ | जहीहि कोपं दयितो | ८ | ८ |
| चारुचुम्बिशरारेची | १५ | ३८ | जिह्वाशतान्युल्लस | १६ | ३७ |
| चिचीपतां जन्मवतां | ३ | ११ | जोयन्तां दुर्जया देहे | ११ | १२ |
| चित्तनिवृत्तिविधायि | ९ | ७१ | जेतुमेव भवता | १३ | ५४ |
| चित्तवानसि कल्याणी | ११ | १४ | ज्वलत्सुतव जात | २ | २४ |
| चित्रीयमाणानति | १७ | ३१ | ज्वलतोऽनलादनु | १२ | ७ |
| चिरनियमकृशोऽपि | १० | १४ | ज्वलितं न हिरण्य | २ | २० |
| चिरमपि कलितान्य | १० | ४८ | त | ||
| च्युते स तस्मिन्त्रिपुधो | १७ | ३७ | तत उदय इव द्विरदे | १८ | १ |
| छ | ततः किरातस्य वचो | १४ | १ | ||
| छायां विनिर्भूय तमोमयीं | १६ | ३२ | ततः किराताधिपते | १६ | १ |
| ज | ततः प्रनष्टे सममेव | १५ | ५४ | ||
| जगदीशरणे युक्तो | १५ | ४५ | ततः प्रत्यात्यस्तमदा | १७ | १७ |
| जगतप्रसूतिर्जगदेक | ४ | ३२ | ततः शरच्चन्द्रकरा | ३ | १ |
| जटानां कीर्ण्या केशैः | ११ | ३ | ततः सकूजत्कलहंस | ४ | १ |
| जनैरुपग्राममनिन्द्य | ४ | १९ | ततः सदपं प्रतनु | १४ | ३५ |
| जन्येष्वतपसां | १३ | ६४ | ततः स संप्रेक्ष्य शरदगुणं | ४ | २० |
| जन्मिनोऽस्य स्थिति | ११ | ३० | ततः सुपर्णव्रजपक्ष | १६ | ४४ |
| जपतः सदा जपमुपांशु | १२ | ८ | ततस्तपोवीर्यसमुद्धतस्य | १७ | ३५ |
| जयमत्रभवान्नूनं | ११ | १८ | ततोऽप्रभूमि व्यवसाय | १७ | ५५ |
| जयारवक्ष्वेडितनाद | १४ | २९ | ततो धरित्रीधरतुल्य | १६ | ५५ |
| जयेन कश्चिद्धिरमेद्यं | १४ | ६२ | ततोऽनुपूर्वायतवृत्त | १७ | ५० |
| जरतोमपि विद्वाण | ११ | ७ | ततोऽपवादेन पताकिनी | १४ | २७ |
| तत्तदीयविशिखा | १३ | ५७ |
४३६ किराताजुनीयम्
| पाद/श्लोकांश | स० | श्लो० | पाद/श्लोकांश | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| तत्तितिक्षितमिदं | १३ | ६८ | तरसा भुवनानि यो | १८ | १० |
| तत्र कार्मुकभृतं | १४ | ३५ | तरसैव कोऽपि भुवनैक | १२ | २१ |
| तथा न पूर्वं कृतभूषणा | ८ | ४१ | तवोत्तरोयं करिषमं | १८ | ३२ |
| तथापि जिह्यः स | १ | ८ | तस्मै हि भारोद्धरणे | १७ | १८ |
| तथापि विघ्नं नृप | ३ | १२ | तस्यातियत्नादति | १७ | १२ |
| तदनघ धनुरस्तु | १० | ५० | तस्याहवायासविलोल | १७ | ८ |
| तदभूरिवासस्कृतं | ६ | २९ | त शम्भुराक्षिसमहैषु | १७ | ४१ |
| तदलं प्रतिपक्ष | २ | १५ | तान्मूरिधाम्नश्चतुरोऽपि | ३ | ३१ |
| तदा रम्याण्यरम्याणि | ११ | २८ | तापसोपि विभुता | १३ | ३१ |
| तदासु कर्तुं त्वयि | १ | २५ | तामैक्षन्त क्षणं सभ्या | ११ | ५१ |
| तदाशु कुर्वन्वचनं | ३ | ५४ | तावदाश्रियते लक्ष्म्या | ११ | ६१ |
| तदुपैक्ष्य विघ्नयत | ६ | ४३ | तिरोहितश्वभ्रनिकुञ्ज | १४ | ३१ |
| तद्गणा ददृशुर्भीमं | १५ | ३५ | तिरोहितान्यानि नितान्त | ८ | ४७ |
| तनुमवजितलोक | १० | १५ | तिरोहितेन्दोरथ | १६ | १६ |
| तनुवारभसो भास्वान | १५ | २३ | तिष्ठतां तपसि पुण्य | १६ | ४४ |
| तनूरलक्तारुणपाणि | ८ | ५ | तिष्ठद्भिः कथमपि | ७ | १ |
| तपनमण्डलदीपितमेक | ५ | २ | तीरान्तराणि मिथुनानि | ८ | ५१ |
| तपसा कृशं वपुरुवाह | १२ | ६ | तुतोष पश्यन्कलभस्य | ४ | ४ |
| तपसा तथा न मुदमस्य | १८ | १४ | तुल्यरूपमसितोत्पल | ९ | १६ |
| तपसा निपीडितकृश | १२ | ३९ | तुषारलेखाकुलितो | १ | ३१ |
| तपोबलेनैव विधाय | १४ | ६० | तेजः समाश्रित्यपरै | १७ | ३ |
| तप्तानामुपदधिरे विषाण | ७ | १३ | तेन व्यातेनिरे भीमा | १५ | ४६ |
| तमतनुबनराजिश्यामितो | ४ | ३८ | तेन भूरिरुपकारिता | १३ | ४० |
| तमनतिशयनीयं सर्वतः | ५ | ५२ | तेनानिमित्तेन तथा | १७ | ४ |
| तमनिन्यवन्दिन इवेन्द्रः | ६ | २ | तेनानुजसहायेन | ११ | ४८ |
| तमाशुचक्षुःश्रवसां | १६ | ४२ | त्रयीमूतूनामिनिला | १४ | ४८ |
| तमुदीरितारुणजटांशु | १२ | १४ | त्रासजिह्मां यतश्चेष्टा | १५ | ३ |
| त्रिःसप्त कृत्वो जगती | १ | १८ |
श्लोकानुक्रमणिका
४३७
| स० | श्लो० | स० | श्लो० | ||
|---|---|---|---|---|---|
| त्वमन्तकः स्याश्च | १८ | ३५ | द्युति वहन्ती वनिता | ८ | ९३ |
| त्वया माभू समारम्भि | ११ | १० | द्युवियद्गामिनो तार | १५ | ४३ |
| त्विषां ततिः पाटलिता | १६ | ३३ | द्योरुन्नतामेव दिशः | १६ | ३५ |
| द | द्रुतपदमभियातु | १० | २ | ||
| दक्षिणां प्रणतदक्षिणां | १८ | २७ | द्वारि चक्षुरधिपाणि | ९ | ४३ |
| ददृशेऽथ सबिस्मयं | १३ | १७ | द्विरदानिव द्विरिख | २ | २३ |
| दधत इव विलासशालि | ५ | ३२ | द्विषतः परासिसिपु | १२ | ३४ |
| दधतमाकरिभिः करिभिः | ५ | ७ | द्विषतामुदयः | २ | ८ |
| दधति क्षतोः परिणतः | ६ | ७ | द्विषतां विहितं | २ | १० |
| दनुजः स्विदयं क्षपाः | १३ | ८ | द्विषन्निमित्ता यदियं | १ | ४१ |
| दरीमुखैरासवराग | १६ | ४६ | द्विषां विघाताय | १ | ३ |
| दिङ्नागहस्ताकृति | १६ | ३८ | द्विषां क्षतोर्याः प्रथमे | १४ | ५५ |
| दिवः पृथिव्याः ककुभां | १४ | ५३ | ध | ||
| दिव्यस्त्रीणा सचरण | ५ | २३ | धनुः प्ररन्ध्रध्वनितं | १६ | २० |
| दिशः समूहन्निव | १४ | ५० | धर्मात्मजो धर्मनिवन्धि | ३ | ३४ |
| दीपयन्नथ नभः | ९ | २३ | धार्तराष्ट्रैः सह प्रीति | ११ | ५५ |
| दीपितस्त्वमनुभाव | १३ | ३८ | धाष्टर्यलङ्घितयथोचित | ९ | ७२ |
| दुरक्षाम्बोध्यता राज्ञा | ११ | ४७ | धूतानामभिमुखपातिभिः | ७ | ३ |
| दुरापदवनजयाया | ११ | ६३ | धृतिविसवलयावलि | १० | २४ |
| दुरासदानरीनूप्रान् | ११ | २३ | धृतिविसवलंय निधाय | १० | ४६ |
| दुर्वचं तदद्य मा स्म | १३ | ४९ | धूतहेतिरप्यधूतजिह्म | ६ | २४ |
| दुःशासनामर्षरजो | ३ | ४७ | धृतोत्पलापोड इव | १६ | १५ |
| दूनास्तेऽरिवलादूना | १५ | ३१ | धैर्याविसादेन हृतप्रसादा | ३ | ३८ |
| दृश्यतामयमनीकहा | १३ | ७० | धैर्येण विश्वास्यतया | ३ | १४ |
| दृष्टावदानाद्वयतेऽरि | १७ | १६ | ध्रुवं प्रणाशः प्रहितस्य | १४ | ९ |
| दृष्ट्वा दृश्यान्त्याचरणी | १८ | २८ | ध्वनिरगविवरेषु | १० | ४ |
| देवाकानिनि कावादे | १४ | २५ | ध्वंसेत हृदयं सद्यः | ११ | ५७ |
| द्यों निरून्धदतिनील | ९ | २० |
४३८ | किरातार्जुनीयम्
| न | स० | श्लो० | स० | श्लो० | |
|---|---|---|---|---|---|
| न ज्ञातं तात यत्तस्य | ११ | ४२ | निद्राविनोदितनितान्त | १ | ७५ |
| न तेन सज्यं क्वचिदु | १ | २१ | निपत्तिनेऽधिनिरोध | १८ | ६ |
| न ददाह मुहुर्वनानि | १२ | १६ | निष्पीयमानस्तबका | ८ | ६ |
| न दलति निचये | १० | ३९ | निबद्धनिश्वासविकम्पिता | ४ | १५ |
| ननु हो मथना राधो | १५ | २० | निमीलदाकेकरलोल | ८ | ५३ |
| न नोननुन्नो नुन्नोनो | १५ | २४ | निरञ्जनं साचिविलोकितं | ८ | ५२ |
| न पपात सन्निहित | १२ | ४ | निरत्ययं साम न दान | १ | १२ |
| न प्रसादमुचितं गमिता | १ | २५ | निरास्पदं प्रशनकुतूहलित्व | ३ | ९ |
| न मृगः खलु कोऽप्ययं | १३ | ६ | निरीक्ष्यमाणा इव | ४ | ३ |
| नयनादिव शूलिनः | १३ | २२ | निरीक्ष्यसंरम्भनिरस्त | ३ | ११ |
| न रागि चेतः परमा | १८ | ५१ | निर्याय विधाय दिनादि | ३ | २५ |
| नवपल्लवाञ्जलिभृतः | ६ | २६ | निवृत्तवृत्तोऽपयोधर | ८ | ७ |
| न वर्त्म कस्मैचिदपि | १४ | १४ | निशम्य सिद्धिं द्विषतां | १ | १७ |
| नवविनिद्रजपाकुसुम | ५ | ८ | निशातरोद्रेषु विकासतां | १४ | ३० |
| नवात्तपालोहितमाहितं | ४ | ८ | निशि तामिरितोऽभीको | १५ | २२ |
| न विरोधिनी रूपमियाय | १२ | ४६ | निःशेषं प्रशमितरेण | ७ | ३८ |
| न विसिस्मिये न विषसाद | १२ | ५ | निःशेषं शकलित | १७ | ६२ |
| न समयपरिरक्षणं | १ | ४५ | निःश्वासधूमैः स्थगितां | १६ | ११ |
| न सुखं प्रार्थये नार्थ | ११ | ६६ | निषण्णमापहप्रतिकार | १४ | ३७ |
| न सजो रुचिर | ९ | ३५ | विषादिसन्नाहमणि | १६ | १२ |
| नानारत्नज्योतिषां | ५ | ३६ | निसर्गदुर्बोधमबोध | १ | ६ |
| नाम्तरङ्गाः श्रियो जातु | ११ | २४ | निहते विडम्बित | १२ | ३८ |
| नाभियोक्तुमनुत | १३ | ५८ | निहितसरसयावकै | १० | ३ |
| नासुरोऽयं न वा नागो | १५ | १२ | नीतोच्छ्रायं मुहुरशिशिर | ५ | ३१ |
| निचायिनि लवली | १० | २९ | नीरन्ध्रं पयिषु रजो | ७ | २५ |
| निजह्निरे तस्य हरेषु | १७ | २६ | नीरन्ध्रं परिगमिते | १७ | ६ |
| निजेन नीतं विजितान्य | १४ | ३९ | नीलनौरजनिभेहिम | ९ | १९ |
| नुनोद तस्य स्थलपद्मिनी | ४ | ५ |
श्लोकानुक्रमणिका
४३९
| श्लोक | स० | श्लो० | श्लोक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| नूनमत्र भवतः शराकृति | १३ | ४५ | पश्चात्क्रिया तूणयुगस्य | १७ | ४२ |
| नृपतिमुनिपरिग्रहंण | १० | ६ | पाणिपल्लवविधूनन | ९ | ५० |
| नृपसुतमभितः | १० | ४४ | पातितोत्तङ्गमहात्म्यैः | १५ | ११ |
| न्यायनिर्णीतसारत्वा | ११ | ३९ | पातुमाहितरतीन्व्यभि | ९ | ५१ |
| प | पार्यवाणाः पशुपते | १५ | ४० | ||
| पतत्सु शस्त्रेण वितत्य | १४ | ४९ | पुरःसरा धामवता | १ | ४३ |
| पतन्ति नास्मिन्विशदाः | ४ | २३ | पुराधिरूढः शयनं | १ | ३८ |
| पातितारिपतजलदाम्न | ६ | २७ | पुरोपनीतं नृप | १ | ३९ |
| पतिं नगानामिव | १७ | ५ | पुंसः पदं मध्यममुत्त | १६ | १९ |
| पयश्च्युतायां समितौ | २ | १५ | पृथग्विधान्यस्त्रविराम | १६ | ३४ |
| पपात पूर्वा जहतो | ४ | १८ | पृथुकदम्बकदम्ब... | ५ | ९ |
| परमास्त्रपरिग्रहोत्सजैः | १३ | २६ | पृथुधाम्नि तत्र परिबोधि | ६ | ४५ |
| परवानयं समिद्धो | ११ | ३३ | पृथूरुपर्यस्तवृहल्लता | १५ | ३४ |
| परस्य भूयान्विवर | १६ | २३ | प्रकृतमनुसार नाभि | १० | ५१ |
| पराहृतध्वस्तशिखे | १६ | ५६ | प्रचलिते चलितं | १८ | १० |
| परिकीर्णमुद्रतभुजस्थ | १२ | ११ | प्रणतिश्रवणान्विहाय | २ | ४४ |
| परिक्षते वक्षसि दन्ति | १६ | ११ | प्रणयिमद्य विधाय | ६ | ४७ |
| परिणामसुखे गरीयसि | २ | ४ | प्रणिधात चित्तमय | ६ | ३९ |
| परिणाहिना तुहिनराशि | १२ | २३ | प्रणिधाय तत्र विधि | ६ | १९ |
| परिभ्रमन्मूर्धजषट्पदा | ४ | १४ | प्रतप्तचामीकरभासुरेण | १६ | ४० |
| परिश्रमह्लोहित | १ | ३४ | प्रतिक्रियायै विधुरः | १७ | ४१ |
| परिमोह्यमानेन | १५ | ३६ | प्रतिघ्नतोभिः कृत | १६ | ४३ |
| परिवीत मंशुभिरदस्त | १२ | १८ | प्रतिदिशमांभगच्छता | १० | २१ |
| परिसरविषयेषु लीढ | ५ | ३८ | प्रतिदिशं प्लवगाधिप | १४ | ६४ |
| परिसुरपतिमनुग्राम | १० | २० | प्रतिबोधजृम्भणविभिन्न | ६ | १२ |
| परिस्फुरन्मीनविवट्टितो | ८ | ४५ | प्रत्यार्द्रीकृततिलकास्तूपार | ७ | १५ |
| परीतनुश्चावजदे | ४ | ११ | प्रत्याह्रतोजाः कृत | १७ | १५ |
| परोऽव जानाति यदज्ञता | १४ | २३ | प्रनृत्तशबवित्रस्त | १५ | २६ |
४४० | किरातार्जुनोयम्
| स० | श्लो० | स० | श्लो० | ||
|---|---|---|---|---|---|
| प्रपित्सोः किं न ते | ११ | १६ | प्राप्यते यदिह दूर | १८ | २५ |
| प्रबभूव नालमवलोकयितुं | ६ | ६ | प्रियेऽपरा यच्छति | ८ | १५ |
| प्रभवति न तथा परो | १० | ३५ | प्रियेण संप्रथ्य विपक्ष | ८ | ३७ |
| प्रभवः खलु कोष | २ | १२ | प्रियेण सिक्ता चरमं | ८ | ५४ |
| प्रमाष्टुंमयशःपङ्क | ११ | ६७ | प्रियेपु यैः पार्थ विनोप | ३ | ५२ |
| प्रयच्छतोच्चैः कुसुमानि | ८ | १४ | प्रियैर्मनीलं करवारि | ८ | ४९ |
| प्रयुज्य समाचरितं | १४ | ७ | प्रीते पिनाकिना मया | ११ | ८१ |
| प्रलीनभूपालमपि | १ | २३ | प्रेरितः शशधरेण करोधः | ९ | २८ |
| प्रवृत्तेऽथ महाहव | १८ | ८ | प्लुतनालतीसितकपाल | १२ | २४ |
| प्रवालभङ्गारुणपाणि | ८ | २१ | ब | ||
| प्रविकर्षनिनादभिन्न | १३ | १६ | बदरीतपोवननिवास | १२ | ३३ |
| प्रविततशरजालच्छन्न | १४ | ६५ | बद्धकोपकृतोरपि | ९ | ६४ |
| प्रविवेश गामिव | १२ | १० | बभार शून्याकृति | १७ | ३१ |
| प्रवृत्तनक्तंदिव | १६ | ४७ | बलवदपि बलं मिथो | १० | ३७ |
| प्रवृद्धसिन्धूमिचय | १६ | ६० | बलवानपि कोपजन्मनः | २ | १७ |
| प्रशान्तधर्माभिभवः | ८ | २८ | बलशालितया यथा | १३ | १२ |
| प्रश्च्योतन्नदसुरभीणि | ७ | ३५ | बहुधा गतां जगति | ६ | ४२ |
| प्रसक्तदावानल | १६ | २६ | बहु बर्हिचन्द्रकनिभं | ६ | ११ |
| प्रसह्य योऽस्मासु परैः | ३ | ४४ | बहुशः कृतसत्कृतंविधातुं | १३ | १० |
| प्रमादरम्यमोजस्वि | १४ | ३८ | वाणच्छिदस्ते विशिखाः | १७ | २० |
| प्रसादलक्ष्मीं दधतं | ३ | २ | विभ्रान्तनूपुररूत | १२ | ४९ |
| प्रसेदिवांसं न समाप | १७ | २३ | वृहदृहत्कलदावि | १२ | ४२ |
| प्रस्थानश्रमजनितां | ७ | ३१ | भ | ||
| प्रस्थिताभिरधिनाथ | ९ | ३६ | भयङ्करः प्राणभृतां | ११ | १७ |
| प्रहीयते कार्यवशा | १६ | २२ | भयादिवाश्लिष्य झषाहते | ८ | ४६ |
| प्राञ्जलावपि जने | ९ | १० | भर्तुभिः प्रणयमन्त्रम | ९ | ५४ |
| प्राप्तोऽभिमानव्यसनाद | ३ | ७५ | भर्तृरूपसखि निशिप | ९ | ६६ |
| प्राप्यते गुणवतापि | ९ | ५८ | भवतः स्मरतां सदा | १८ | ३८ |
श्लोकानुक्रमणिका
| श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० | श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| भवद्भिरक्षुण्णाराति | १५ | १० | मया मृगान्धन्तुमनेन | १४ | २५ |
| भवन्तमेतर्हि मनस्वि | १ | ३२ | मरुतः शिव्रा नवतृणा | ६ | ३३ |
| भवन्ति ते सभ्यतमा | १४ | ४ | महतां पतिः स्विद् | १२ | १५ |
| भवभीतये हतवृहत्सम | ६ | ४१ | महते फलाय तदवेक्ष्य | ६ | २८ |
| भवादृशेषु प्रमदा | १ | २८ | महत्त्वयोगाय महा | ३ | २३ |
| भव्यो भवन्नपि मुने | ५ | ४९ | मध्यैर्यभस्कन्धनतून | १४ | ४० |
| भिस्त्वेव भाभिः सवितु | १६ | ५१ | महानले भिन्नसिताम्र | १६ | ५७ |
| भुजगराजसितेन | ५ | ४ | महारथानां प्रतिदन्त्य | १६ | १४ |
| भूभर्तुः समविकमादधे | ७ | २७ | महास्त्रदुर्गे शिथिल | १६ | २६ |
| भूयः समापान | १७ | ७ | महिषक्षतागुरुतमाल | १२ | ५० |
| भूरिप्रभावेण रणामि | १७ | २ | महीभृता पक्षवतेह | १६ | १३ |
| भूरेणुना रासनधूसरेण | १६ | ७ | महीभृतां सच्चरितं | १ | २० |
| भृशकुसुमशरैषु | १० | ६१ | महेपुजङ्घवी शत्रो | १५ | ३२ |
| भ्रूविलाससुभगाननु | ९ | ५६ | महौजसो मानधना | १ | १९ |
| म | मा जपन्मदविमूढ | ९ | ७० | ||
| मग्नां द्विषच्छद्मनि | ३ | ३९ | मा गश्चित्रांयकचरः | ३ | ५३ |
| मणिमयूखजयांशुक | ५ | ५ | मानिनीजनविलोचन | ९ | २६ |
| मतिभेदतमस्तिरो | २ | ३३ | मा भूवन्नपथहृतस्तवे | ५ | ५० |
| मतिमान्निनयप्रमाथि | २ | ५२ | माया स्विद्देशा मति | १६ | १८ |
| मथिताम्भसो रथविकीर्ण | १२ | ५१ | मार्गणैश्च तत्र | १३ | ५९ |
| मदमानसमुद्धतं | २ | ४९ | मा विहासिष्ट समरं | १५ | ८ |
| मदसिक्तमुखंर्मुगा | ७ | १८ | माहेन्द्र नगमभितः | ७ | २० |
| मदसुतिश्यामित | १६ | २ | मित्रमिष्टमुपकारि | १३ | ५१ |
| मधुरैरवशानि | २ | ५५ | मुकुलितमतिशय्य | १० | २७ |
| मध्यमोपलनिश्रे लसदंशा | ९ | २ | मुक्तमूललघुरज्जित | ९ | ५ |
| मनसा जप्यैः प्रणतिभिः | ६ | २२ | मुखैरसौ विद्रुमभङ्ग | ४ | ३६ |
| मनःशिलाभञ्जनिभेन | १६ | ४५ | मुञ्चतीशे शराञ्छिष्णो | १५ | ३४ |
| मनोरमं प्रापितमन्तरं | ४ | ७ | मुमितमधुलिहो वितानो | १८ | २० |
| मन्दमस्यत्रिशुलतां | १५ | १३ |
४४२ किरातार्जुनीयम्
| पाद | स० | श्लो० | पाद | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| मुनयस्ततोऽभिमुख | १२ | २५ | यशोऽधिगन्तुं सुख | ३ | ४० |
| मुनिदनुततयान्विलोम्य | १० | १६ | यष्टुमिच्छसि पितॄन् | १३ | ६५ |
| मुनिमभिमुखतां | १० | ४० | यस्मिन्ननैश्वर्यकृत | ३ | १९ |
| मुनिरहिम निरागसः | १३ | ७ | यः करोति वचोदर्का | १२ | १९ |
| मुनिरूपतोऽनुरूपेण | ११ | २ | यः सर्वपामावरोधा | १८ | ४० |
| मुनिपुदहनातप्ता | १५ | ३० | या गम्याः सत्सहायानां | ११ | २२ |
| मुनेविचित्रैरिविभिः | १७ | १९ | यातस्य ग्रन्थ्यततरंग | ७ | १६ |
| मुनेः शरोघेण तदुग्र | १४ | ५९ | युक्तः प्रमाद्यसि हिता | ११ | २९ |
| मुहुरनुपतता विध्य | १० | ३३ | युक्ताः स्वशक्त्या मुनयः | ८ | २१ |
| मुहुश्चलत्पल्लवलोहिनी | १८ | ५३ | युयुत्सुरिव कवचं | ११ | १५ |
| मूलं दोषस्य हिंसादे | ११ | २० | येनापविद्धसलिलः | ५ | ३० |
| मृगान्धिनिघ्नन्मृगयुः | १४ | ५ | योगं च तं योग्यतमाय | ३ | २६ |
| मृणालिनीनामनुरञ्जितं | ४ | ७२ | योषितः पुलकरोधि | ९ | ४१ |
| मृदितकिसलयः सुराङ्गना | १० | ९ | योषिदुद्धतमनोभव | ९ | ६६ |
| य | र | ||||
| यच्छति प्रतिमुखं | ९ | १० | रक्षोभिः सुरमनुजैः | १८ | ३६ |
| यथा निजे वर्त्मनि | १३ | ५७ | रजनीषु राजतनयस्य | १३ | १२ |
| ययाप्रतिज्ञं द्विषतां | ११ | ७४ | रञ्जिता नु विविधा | ९ | १५ |
| यथायथं ताः सहिता | ८ | २ | रणाय जैत्रः प्रदिशन्निव | १४ | २८ |
| यथास्वमार्गंसित | १४ | ४३ | रथांगसंकीडितमश्व | १६ | ८ |
| यदवोचत वीक्ष्य | २ | २ | रम्या नवद्युतिरुपैति | ५ | ३७ |
| यदात्थ कामं भवता | १४ | १८ | रयेण सा संनिदधे | १७ | ५० |
| यदा विगृह्णाति हतं | १६ | २४ | रहितरत्नचयानशिलो | ५ | १० |
| यदि प्रमाणीकृतमार्य | १४ | १९ | रागकान्तनयनेषु | ९ | ६३ |
| यदि मनसि शमः | १० | ५५ | राजद्भिः पथि मरुता | ७ | ६ |
| यमनियमकृशीकृत | १० | १० | रात्रिरागमलिनानि | ९ | १६ |
| यथा समासादित | ३ | २२ | रामानामवजितमाल्य | ७ | ७ |
| यशसेव तिरोधधन्मुहु | ३ | ५८ | रिक्ते सविभ्रम्भमथा | १७ | ३६ |
श्लोकानुक्रमणिका
४४३
| श्लोक | स० | श्लो० | श्लोक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| रुचिकरमपि नार्थं | १० | ६२ | वाससां शिथिलतामुर | ९ | ६५ |
| रुचिरपल्लवपुष्पलता | ५ | १९ | विकचवारिरुह दधतं | ५ | १३ |
| रुचिराकृतिः कनकसानु | ६ | १ | विकसितकुसुमाधारं | १० | ३२ |
| रुजन्महेतुम्बहुधा | १५ | ५१ | विकामुंकः कर्ममु शोच | १३ | ५३ |
| रून्धतो नयनवायव | ९ | ६७ | विकाशमोदूजंगनांण | १५ | ५२ |
| ल | विकोशनिधौततनो | १७ | ४९ | ||
| लघ्वसितया निशां | २ | ५३ | विगणय्य कारकमनेक | ६ | ३७ |
| लभ्यमेकप्रकृतेन | १३ | ५२ | विगाढमात्रे रमणीभि | ८ | ३१ |
| लब्धा चरित्रे तव | ३ | १७ | विचकर्ष च संहितेषु | १३ | १८ |
| लिलिखुस्तेऽथ शरकाल | १६ | ५४ | विचित्रया चित्रपतेव | १६ | ३ |
| लेखया विमलदृग् | ९ | २२ | विच्छिन्नाभ्रविलायं | ११ | ७९ |
| लोकं विधात्रा विहितस्य | ३ | ४१ | विजहीहि रणोत्साहं | ११ | ३१ |
| लोचनाञ्चलकृता | ९ | ६० | विजिगीषते यदि जगन्ति | १२ | ३० |
| लोलदृष्टि वदन | ९ | ५७ | विजित्य यः प्राज्य | १ | ३५ |
| व | विततशीकरराशिभिः | ५ | १५ | ||
| वदनेन पुष्पितलतान्तः | १२ | ४१ | वितन्वतांस्तस्य शरा | १७ | २० |
| वनान्तशय्याऽठिनौ | १ | ३६ | विदिताः प्रविश्य विहिता | ६ | ३० |
| वनाश्रयाः कस्य मृगाः | १४ | १३ | विदूरपातेन निदामुपेयुः | ८ | १० |
| वनेऽवने वनसदां | १५ | १० | विधाय रक्षाम्यरतः | १ | १२ |
| वपुरिन्द्रगोपतपनेषु | १२ | ३ | विधाय विध्वंसमनात्मन | ३ | १६ |
| वपुषा परमेण भूधरा | १३ | १ | विधिसमयनिगोगा | १ | ४६ |
| वयं क्व वर्णाश्रमरक्षणो | १४ | २२ | विधुरं किमतः परं | २ | ७ |
| वरं कृतघ्नस्तगुणा | १५ | १५ | विधूतकेशाः परि | ८ | ३३ |
| वरोधभिवारणहस्त | ८ | २२ | विधूनयन्ती गहनानि | १४ | ४७ |
| वसूनि वाञ्छन्न वशी | १ | १३ | विनम्रशालिप्रसवोव | ४ | २ |
| वंशलक्ष्मीमनुद्घृत्य | ११ | ६९ | विनयं गुणा इव विवेक | १२ | १८ |
| वंशोचितत्वादभिमान | १७ | ४ | विनिर्यतीनां गुरुखेद | ८ | २६ |
| वाजिभूमिरिभराज | १३ | ५५ | विपक्षचित्तोन्मथना | ८ | ३४ |
४४४
किरातार्जुनीयम्
| प्रतीक | स० | श्लो० | प्रतीक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| विपत्रलेखा निरक्तका | ८ | ४० | विहस्य पाणौ विधृते | ८ | ५० |
| विपदेति तावदवसाद | १८ | २३ | विहाय वाञ्छामुदिते | ४ | २५ |
| विपदोऽभिभवन्त्य | २ | १४ | विहाय शान्तिं नृप | १ | ४२ |
| विपाण्डुभिर्म्लानतया | ४ | २४ | विहारभूमेरभिघोष | ४ | ३० |
| विपाण्डु संध्यानमिव | ४ | २८ | विहितां प्रियया | २ | १ |
| विफलीकृतयत्नस्य | १३ | ४६ | वीक्ष्य रत्नचयके | ९ | ५२ |
| विद्रावितस्य ध्वनिना | १७ | ४६ | वीक्ष्य रन्तुमनसः | ९ | १ |
| विमिश्रपर्यन्तगभीर | ८ | ३० | वीतजन्मजरसं परं | ५ | २२ |
| विमिश्रपातिताश्वीय | १५ | २४ | वीतप्रभावतनुरुप्य | १६ | ६४ |
| विभेदमन्तः पदवी | १७ | २७ | वीतौजसः सन्निधि | ३ | ४९ |
| विमुक्तमाशंसित | १४ | ५१ | वीर्यप्रदानेषु कृता | ३ | ५३ |
| विमुच्यमानैरपि तस्य | ४ | १२ | वेत्रशाककुजे | १५ | १८ |
| वियद्वि वेगपरिप्लुत | १८ | १२ | व्यक्तोदितस्मितमयूख | २ | ५९ |
| विरचय्य काननविभाग | १२ | ४४ | व्यथितमपि भृशं मनो | १० | २२ |
| विरोधि सिद्धेरिति | १४ | ८ | व्यथितसिन्धुमनीरशनैः | ५ | ११ |
| विलङ्घ्य पत्रिणां | १५ | ४४ | व्यधत्त यस्मिन्पुरमुच्च | ५ | ३५ |
| विलम्बमानाकुलकेश | ८ | १८ | व्यपोहितुं लोचनतो | ८ | १९ |
| विवरेऽपि नैवमनिगूढ | १२ | ३७ | व्यानशे शशधरेण | ९ | १७ |
| विवस्वदंशुसंश्लेष | १५ | ९ | व्याहृत्य महतां पत्या | ११ | ६७ |
| विविक्तवर्णभरणा | १४ | ३ | व्रज जय रिपुलोक | १८ | ८८ |
| विविक्तेऽस्मिन्मगे | ११ | ३६ | व्रजति शुचि पदं त्वयि | १८ | २६ |
| विशङ्कमानो भवतः | १ | ७ | व्रजतोऽस्य बृहत्पतन | १३ | २१ |
| विशदभ्रूयुगच्छन्त | ११ | ४ | व्रजन्ति ते मूढधियः | १ | ३० |
| विषमोऽपि विगाह्यते | २ | ३ | व्रजाजिरेष्वम्बुदनाद | ४ | १६ |
| विस्तारिताश्ममणि | ८ | २३ | व्रणमुखच्युतशोणित | १८ | ४ |
| विस्फारिताङ्गस्य ततो | १७ | २४ | व्रीडानतैरासजनोप | ३ | ४२ |
| विस्मयः क इव वा | १३ | ४० | श | ||
| विशिखतः सपदि तेन | १८ | १३ | शक्तिरर्थपतिषु स्वयं | १३ | १६ |
श्लोकानुक्रमणिका
४४५
| श्लोक | स० | श्लो० | श्लोक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| शक्तिवैकल्यनम्रस्य | ११ | ५९ | श्रद्धेया विप्रलम्भारः | ११ | ६५ |
| शङ्किताय कृतबाष्प | ९ | ४६ | श्रियः कुरुणामधिपस्य | १ | १ |
| शतशो विशिखानवयते | १५ | ४८ | श्रियं विकल्पत्यपहस्त्य | ३ | ७ |
| शमयन्घृतेन्द्रियशमैक | ६ | २० | श्रिया हसद्भिः कमलानि | ८ | ४४ |
| शरणं भवन्तमति | १८ | २२ | श्रीमद्भिनियमितकन्धरा | ७ | ३७ |
| शरदम्बुधरच्छाया | ११ | १२ | श्रीमद्भिः प्ररयगजैः | ७ | १ |
| शरवृष्टि विषूयोर्वी | १५ | ४१ | श्रीमल्लताभवनमोषधयः | ५ | २८ |
| शरानवद्यन्ननवद्य | १७ | ५६ | श्रुतमप्यधिगम्य | २ | ४१ |
| शशधर इव लोचनाभि | १० | ११ | श्रुतिसुखमुपवीणितं | १० | ३८ |
| शाम्भोर्धनुर्मण्डलतः | १५ | ४९ | श्रेयसों तव सम्प्राप्ता | ११ | ११ |
| शाखावसक्तकमनीय | ७ | ४० | श्रेयसोऽप्यस्य ते तात | ११ | ४४ |
| शान्तता विनययोगि | १३ | ३७ | श्लिष्यतः प्रियवधूरूप | ९ | ६७ |
| शारतां गमितया शशि | ९ | २९ | श्वसनचलितपल्लवा | १० | ३४ |
| शिरसा हरिमणिप्रभः | ६ | २३ | श्वस्त्वया मुखसंवित्तिः | १० | ३४ |
| शिलाघनेनीकसदा | ८ | ३२ | स | ||
| शिवध्वजिन्यः प्रतियोध | १४ | ५८ | स किंसखा साधु न | १ | ५ |
| शिवप्रणुन्नेन शिली | १७ | ५८ | सक्ति जवानपनयत्य | ५ | ४६ |
| शिवभुजाहूतिभिन्न | १८ | ३ | स क्षत्रियस्त्राणसहः | ३ | ४८ |
| शिवमौपयिकं गरी | २ | ३५ | स खण्डनं प्राप्य पराद | १७ | ६० |
| शीधुपानविधुरासु | ९ | ४२ | सखा स युक्ताः कथितः | १४ | २१ |
| शीधुपानविधुरेष | ९ | ७३ | सखि दयितमिहानयेति | १० | ४७ |
| शुष्वितेर्मूलनिचयै | ५ | ४२ | सखीजनं प्रेम गुरुकृता | ८ | ११ |
| शुचि भूषयति श्रुतं | २ | ३२ | सखीनिव प्रीतियुजो | १ | १० |
| शुचिरप्सु विद्रुमलता | ६ | १३ | स गतः क्षितिमूष्ण | १३ | ३१ |
| शुचिवल्कवीततनुरम्य | ६ | ६१ | सचकितमिव विस्मया | १० | ७ |
| शुभाननाः साम्बुरुहेषु | ८ | ४२ | स जगाम विस्मयमुदीक्ष्य | ६ | १५ |
| शून्यामाकीर्णतामेति | ११ | २७ | सजलजलधरं नभो | १० | १९ |
| श्योतन्मयूखेऽपि हिम | ३ | ८ | सजनोऽसि विजहीहि | १३ | ६६ |
४४६ | किरातार्जुनीयम्
| पद / पाद | स० | श्लो० | पद / पाद | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| सज्यं धनुर्वहति यो | १३ | ७१ | समुज्झिता यावदराति | १४ | ५६ |
| स ततार संकटवतो | ६ | १६ | समुन्नतः काशदुकूल | ८ | ९ |
| स तदोजसा विजित | १२ | २९ | समुल्लसत्प्रासमहोभि | १६ | ४ |
| स तमालनिभे रिपो | १३ | २४ | स यौवराज्ये नवयौवन | १ | २२ |
| स तमाससाद घननील | १२ | ५३ | सरजसमपहाय | १० | २६ |
| सदृशमतनुमाकृतेः | १० | १३ | सरभसमवलम्ब्य | १० | ५४ |
| सद्मनां विरचनाहित | ९ | ३४ | सरोजपत्रे नु विलीन | ८ | ३५ |
| सद्भावितेवाभिनिविष्ट | १७ | ११ | सललितचलित | १० | ५२ |
| स धनुर्महेषुधि | १२ | २७ | सलोलयासक्तलता | ८ | १६ |
| स ध्वानं निपतितनिर्झरासु | ७ | २२ | सलेनमुल्लिङ्गितशात्रवे | १४ | २ |
| सनादक्वनितं नितम्ब | ५ | २७ | स वशस्यावदातस्य | ११ | ७५ |
| सपदि प्रियरूपमंवरखः | १३ | २५ | सविनयमपरानिसृत्य | १० | ५७ |
| सपदि हरिसखैवधू | ११ | १८ | सवृषध्वजसायकावभिन्नं | १३ | २८ |
| स पिङ्गलः श्रीमान् | १८ | ४५ | सव्यलीकमवधोरित | ९ | ४५ |
| स विशङ्कजटावलिः | १५ | ४७ | सव्यासव्यध्वनितो | १७ | २५ |
| स पुमानर्थवज्जन्मा | ११ | ६२ | सब्रीडमन्दैरिव | ३ | ४६ |
| स प्रच्छदनयाम्बुदनादि | १७ | १० | ससस्वरतिदे नित्यं | १५ | २७ |
| स प्रयुज्य तनये | १३ | ३६ | स समुद्धरता विचित्त्य | १३ | ३४ |
| स बभार रणापेता | १५ | ३३ | स सम्प्रधायैवमहार्य | १६ | २५ |
| सविभति भीषण | ६ | ३२ | स सायकान्साध्वस | १७ | २१ |
| स भवस्य भवक्षयैक | १३ | १९ | स सासिः सासुसूः | १५ | ५ |
| स भोगिसंघः शम | १६ | ४८ | ससुरचापमनेकमणि | ५ | १२ |
| समदशिखिरुतानि | १० | २५ | सहशरधि निजं तथा | १८ | १६ |
| स मन्थरावलित | ४ | १७ | सहसा विदधीत | २ | ३० |
| समवृत्तिरुपैति | २ | १८ | सहसोपगतः स | २ | ५६ |
| समस्य सम्पादयता | १४ | ६ | संक्रान्तचन्दनरसा | ८ | ५७ |
| समानकान्तीनि तुषार | ८ | २५ | सन्ततं निशमयन्त | १३ | ४७ |
| समुच्छ्वसत्पङ्कजकोश | ८ | २४ | सन्निबद्धमपहर्तुं | १८ | ३० |