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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

६१८ कथासरित्सागर

६१८ कथासरित्सागर
एकां चाताडयद्राज्ञीं हेमकुम्भद्वयोपमे।
कुचयुग्मे च विस्रस्तवसने करवारिणा ॥११९॥
तद्दृष्ट्वा सा चुकोपास्यै सेर्ष्या मदनसुन्दरी।
कियत्क्षोभ्या नदीयेव सोद्वेगेव जगाद च ॥१२०॥
उत्तीर्य चाम्भसः प्रायादासन्नवस्त्रान्तरा रुषा।
प्रियापराधं शंसन्ती तं सखीभ्यः स्वमन्दिरम् ॥१२१॥
ततो ज्ञाताक्षमस्तस्या जलक्रीडां विमुच्य सः।
राजा कनकवर्षोऽपि तद्वासगृहमभ्ययौ ॥१२२॥
वार्यमाणो रुषा तत्र पञ्जरस्थैः शुकैरपि।
प्रविश्य स ददर्शान्तर्देवीं तां मन्युपीडिताम् ॥१२३॥
वामहस्ततलन्यस्तविषण्णवदनाम्बुजाम् ।
स्वच्छमुक्ताफलनिभैः पतद्भिर्बाष्पबिन्दुभिः ॥१२४॥
'जइ विरहो ण सहिज्जइ माणो (सुहा वि) परिवज्जणीओ से।
विरहो हिअअ सहिज्जइ माणो (एव्व) परिवड्ढणीओ से ॥१२५॥
इअ आणिऊण णिउण चिट्ठसु ओलम्बिऊण इक्कवरम्।
उहयतडदिण्णपाओ मज्झणिबिडिओ धुव विणिस्सिहिसि ॥१२६॥
इतीमं द्विपदीखण्डं पठन्तीं साश्रुगद्गदम्।
निर्यद्दन्तांशुहारिण्या गिरापभ्रंशमुग्धया ॥१२७॥
विलोक्य च तथाभूतां तां कोपेऽपि मनोरमाम्।
उपाययौ सलज्जश्च सभयश्च स भूपतिः ॥१२८॥
पराङ्मुखीमवाश्लिष्य वचोभिः प्रीतिपेशलैः।
प्रवृत्तोऽभूत्सभिनयंस्तां प्रसादयितुं च सः ॥१२९॥
वक्रोक्तिसूचितार्थे परिहारे पपात च।
तस्याश्चरणयोर्निन्दन्नात्मानमपराधिनम् ॥१३०॥
१ यदि विरहो न सह्यते मानः (सुखादपि) परिवर्जनीयस्ते।
विरहो हृदय सह्यते मानः (एव) परिवर्धनीयस्ते॥
इति ज्ञात्वा निपुणं तिष्ठस्वावलम्ब्यैकतरम्।
उभयतटदत्तपादो मध्यनिपतितो ध्रुवं विनंक्ष्यसि इति च्छाया।

नवम स्तम्बक ६१९
इसी समय वह राजा एक रानी के दो स्वर्ण-कलशों के समान वस्त्ररहित उत्तुंग कुचों को
पानी के छींटा से मारने लगा ॥११९॥
यह देखकर मदनसुन्दरी के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई और वह कहने लगी 'तुम नदी का
कितना क्षोभ करोगे' इतना कहकर और जल से बाहर निकलकर, क्रोध के साथ वस्त्र बदलकर
अपनी सखियों से राजा की शिकायत करती हुई वह अपने भवन को चली गई॥ १२०-१२१॥
तब उसके भाव को समझकर राजा भी जलक्रीड़ा छोड़कर उसके (मदनसुन्दरी) निवास
भवन को गया ॥१२२॥
वहाँ पर पिंजराँ में टँगे हुए शुकौँ से भी रोके जाते हुए राजा ने भीतर जाकर क्रोधातुर
रानी को देखा ॥१२३॥
बायें हथेली पर खिन्न और म्लान मुख-कमल को रखी हुई, आँखों से बड़े-बड़े स्वच्छ मोतियों
के समान आँसुओं की बूँदों को गिराती हुई, बँधे हुए कण्ठ से अस्पष्ट उच्चारण करती हुई और
दाँतों की किरणों से मनोहर लगती हुई वह रानी अपभ्रंश भाषा में सुन्दर द्विपदी के इस टुकड़े
को गा रही थी-
यदि विरह नहीं सहा जाता तो तुम्हें मान छोड़ना चाहिए। हे हृदय ! यदि विरह सहा
जाय तो मान को बढ़ाओ। ऐसा जानकर दोनों में से एक का निश्चय कर लो। अन्यथा दोनों
किनारों पर पैर रखने से बीच में गिरकर अवश्य नष्ट हो जाओगे ॥१२४-१२७॥
इस प्रकार क्रोध में भी मनोहर लगती हुई मदनसुन्दरी के पास राजा कन्दर्प डरता
और लजाता हुआ गया ॥१२८॥
मुँह फेरकर बैठी हुई उसे वह राजा अपने आभिधान और मधुर वचनों द्वारा नम्रता के साथ
मनाने लगा ॥१२९॥
नवोत्कण्ठा से उसके अनुराग को बताती हुई सखियों के सामने ही मदनसुन्दरी के चरणों पर
वह राजा अपने अपराधी आत्मा की निन्दा करता हुआ गिर पड़ा ॥१३०॥