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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

४३६ कथासरित्सागर

४३६ कथासरित्सागर

तया सह स राज्यं स्वं शासन्नृपतिरेकदा।
निष्कासितोऽभूद्बलिविद्देशात् सम्भूय गोत्रजैः॥११०॥
देवीद्वितीयः प्रच्छन्नं सायुधोऽल्पपरिच्छदः।
स प्रतस्थे ततो राजा मालवं श्वशुरास्पदम्॥१११॥
गच्छन् पथि च सोऽटव्यां सिंहमाधावितं पुरः।
शरैः खड्गप्रहारेण द्विधा चक्रेऽवहेलया॥११२॥
वनद्विपं च गर्जन्तमायान्तं मण्डलाग्रभाक्।
खड्गच्छिन्नकराङ्गुलिकं मुक्ताटटिमपातयत्॥११३॥
एकाकी तस्करचमूर्विदलयन्नवपङ्कजाः।
गमाधारव्यविक्रान्तः करी कमलिनीमिव॥११४॥
एवं मार्गमतिव्रज्य दृष्टारब्धभूतविक्रमाम्।
मालवं प्राप्य देवीं स्वां सोऽब्रवीत् सत्त्वसागरः॥११५॥
न मार्गवृत्तमेतन्मे वाच्यं पितृगृहे त्वया।
लज्जया देवि का श्लाघा क्षत्रियस्य हि विक्रमे॥११६॥
इत्युक्त्वा च तया सार्धं प्राविशत्पितृगेहम् ।
सम्भ्रमात्तेन पृष्टश्च निजं वृत्तान्तमुक्तवान्॥११७॥
सम्भाव्य दत्तहस्त्यश्वस्तत्त्वेन श्वशुरेण सः।
शतानीकाभिधस्यागाद्राज्ञोऽतियशिनोऽन्तिकम् ॥११८॥
देवीं तु कल्याणवतीं भार्यां तां पितृवेश्मनि।
तत्रैव स्थापयामास विपक्षविजयोद्यतः॥११९॥
तस्मिन्प्रयाते मातुस्तु दिवसप्रकटात्र सा।
देवी वातायनाधस्था कञ्चित्पुरुषमददात्॥१२०॥
स दृष्ट एव रूपेण तस्याश्चित्तमपाहरत्।
स्मरणाङ्कुप्यमाणा च तत्क्षणं सा व्यचिन्तयत्॥१२१॥
जानेऽहं नार्यपुत्राद्यत्सुलक्ष्णाङ्गो न शोयपाम्।
धावत्येव तथाप्यस्मिन् पुरुषे यत मे मनः॥१२२॥
तद्यथ भजाम्येनमिति सञ्चिन्त्य सा ततः।
गय्र्यं रहस्यधारिण्यै स्वाभिप्रायं शशंस तम्॥१२३॥
शयनानाय्य भक्तं च बानायनरथेन सा।
अन्त पुरं तं पुरुषं रञ्जलिखं न्यवेशयत्॥१२४॥

रानी के साथ राज्य के ग्राहक उस राजा को एकबार उसके प्रबल कुटुम्बी बन्धुओं
ने मिलकर राज्य से निकाल दिया ॥११॥
तब वह राजा रानी और कुछ सेवकों के साथ गुप्त रूप से वहाँ से चला और अपनी
ससुराल आ गया ॥१११॥
मार्ग में जाते हुए जंगल में उसने अपने ऊपर आक्रमण करते हुए एक सिंह को अनायास
तलवार के प्रहार से दो टुकड़े करके मार डाला ॥११२॥
और, उन्नत पैंतर के साथ घूमते हुए तथा आक्रमण करते एवं चिल्लाड़ते हुए हाथी के
पैर और सूँड़ काटकर उसे गिरा दिया ॥११३॥
आगे चलकर मिले हुए चोरों के दल को उसने इस प्रकार काटकर गिरा दिया जैसे
जंगली हाथी कमल के जंगल को रौंद डालता है॥११४॥
इस प्रकार, रानी के द्वारा देखा गया पराक्रमवाला वह राजा मार्ग तय करके मालव देश
पहुँचा। तब बल का समुद्र वह राजा रानी से कहने लगा—॥११५॥
मार्ग का यह समाचार तुम अपने पिता के घर मत कहना। यह तो एक लज्जा की
बात है। पराक्रम करने में क्षत्रिय की क्या प्रशंसा ? ॥११६॥
ऐसा रानी से कहकर वह राजा उसके साथ उसके पिता के भवन में गया। और,
घबराकर समाचार पूछने पर उसने अपना समाचार (बन्धुओं द्वारा राज्य छीने जाने का) सुना
दिया ॥११७॥
तब श्वशुर द्वारा सत्कृत होकर और हाथी घोड़े आदि सेना की सहायता प्राप्त कर वह
अत्यन्त बलवान् राजा यज्ञावलोक के समीप गया ॥११८॥
और, शत्रुओं को जीतने में प्रयत्नशील राजा ने रानी कल्याणवती को वही पिता के ही
घर पर रख दिया ॥११९॥
उस राजा के चले जाने पर और कुछ दिन बीतने पर एक बार, भवन की खिड़की में बैठी
हुई रानी ने किसी पुरुष को देखा ॥१२० ॥
उस पुरुष ने देखते ही रानी के मन को मोह लिया और काम-वासना से प्रेरित रानी उस
समय सोचने लगी—॥१२१॥
मैं भली भाँति यह जानती हूँ कि मेरे पतिदेव के समान सुन्दर और पराक्रमी दूसरा
पुरुष नहीं है। फिर भी इस पुरुष की ओर मेरा मन खिंच रहा है। यह खेद है ॥१२२॥
अब जो भी हो, मैं इसे भोगूंगी ही। इस प्रकार सोचकर उसने अपना गुप्त भेद जाननेवाली
सहेली से अपने मन का भाव प्रकट किया ॥१२३॥
और उसी के द्वारा उस रात्रि के समय खिड़की के मार्ग से रस्से के सहारे ऊपर चढ़ा
कर अपने घर में बुला लिया ॥१२४॥
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