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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

नवम लम्बक ५५१

नवम लम्बक ५५१
इस प्रकार, जबतक पाप का अन्त नहीं होता तबतक लाखों यत्न करने पर भी स्वामी
की कृपा प्राप्त नहीं हो सकती ॥७४॥
इस प्रकार, इस कथा को सुनाकर मन्त्रिश्रेष्ठ गोमुख ने अपने स्वामी नरवाहनदत्त से
कहा- महाराज मैं समझता हूँ कि इस कार्पटिक का भी अभी पाप नष्ट नहीं हुआ है। इसीलिए,
आप इस पर कृपा नहीं कर रहे हैं ॥७५-७६॥
गोमुख के यह वचन सुनकर और 'हां ठीक है'- ऐसा कहकर उस अपने कार्पटिक को
वत्सराज के पुत्र नरवाहनदत्त ने बहुत-से ग्राम, हाथी, घोड़े, हजारों मन सोना, कपड़े और आभूषण
प्रदान किये ॥७७-७८॥
जिससे वह दरिद्र भिखारी कार्पटिक राजा के समान हो गया। सच है, कृतज्ञ और अच्छे
परिवारवाले स्वामी की सेवा निष्फल कैसे हो सकती है ? ॥७९॥
वीर ब्राह्मण प्रलम्बबाहु की कथा
इस प्रकार, कौशाम्बी में रहते हुए नरवाहनदत्त के समीप सेवा के लिए दक्षिणदेशवासी
एक युवक आया, जिसका नाम प्रलम्बबाहु था। उस वीर ने राजा से निवेदन किया- 'स्वामी मैं
आप के यश से आकृष्ट होकर यहाँ आया हूँ। मैं पृथ्वी पर रथ, हाथी और घोड़े पर जाते हुए
आपके पीछे-पीछे पैदल चलूँगा, किन्तु आकाश में गमन करते हुए आपके पीछे नहीं चल
सकता ॥८०-८२॥
क्योकि भविष्यत् काल में आप विद्याधरों के सम्राट् होंगे ऐसा सुना जाता है। मेरे
जीवन-निर्वाह के लिए प्रतिदिन आप एक सौ दीनार (सोने का सिक्का) दीजिए ॥८३॥
नरवाहनदत्त ने ऐसा कहते हुए उस अनुपम तेजस्वी ब्राह्मण के लिए प्रतिदिन एक
सौ मुहरों की जीविका प्रदान की ॥८४॥
उसके प्रसंग में गोमुख ने राजा से कहा-'स्वामिन्, इस प्रकार के (अत्यधिक वेतनवाले)
राजाओं के जो सेवक होते हैं, उनके सम्बन्ध में एक कथा सुनो ॥८५॥
वीरवर ब्राह्मण की कथा
इस भूभाग में विक्रमपुर नाम का एक महान् नगर है। उसमें प्राचीन समय में विक्रमर्तुग
नाम का राजा था ॥८६॥

तैक्ष्यं कृपाणे यस्याभून्न दण्डे नयशालिनः ।
धर्मे च सततासक्तिर्न तु स्त्रीमृगयादिषु ॥८७॥
तस्मिश्च राज्ञि तुल्यो रजःसु गुणविभ्रुतिः ।
मायक्यविचारश्च गोप्तृषु पङ्कुरक्षिणाम् ॥८८॥
तस्य वीरवरो नाम शूरो मालवदेशजः ।
स्वाकृतिच्छाययो राज्ञो विप्र सेवार्थमेकदा ॥८९॥
यस्य धर्मवती नाम भार्या वीरवती सुता।
पुत्र सत्त्ववरश्चेति त्रयः परिकरा गृहे ॥९०॥
सेवापरिकरश्चान्यस्तस्य कट्यां कृपाणिका।
पाणौ करवालैकस्मिन्नचर्मान्यस्मिन्सुदर्पणम् ॥९१॥
द्वयमात्र परिकरे वृत्य्यर्थयते स्म सः।
प्रत्यहं भूपतेस्तस्माद्दीनारशतपञ्चकम् ॥९२॥
राजा च स ददौ तस्म वृत्तिं तां रक्षितौजसे।
पश्यामि तावन्तस्य प्रकर्षमिति चिन्तयन् ॥९३॥
ददौ च तस्य चारान्स पश्चाज्जिज्ञासितुं नृपः।
कुर्वन्नियद्भिर्दीनारैः किं ब्रियाद्दूरसाविति ॥९४॥
स च वीरवरस्त्वेषां दीनाराणां दिने दिने।
शतं हस्ते स्वभार्याया भोजनादिकृते ददौ ॥९५॥
शतेन वस्त्रमाल्यादि क्रीणाति स्म शतं पुनः।
स्नात्वा हरिरुद्रादीनामर्चनार्थमकल्पयत् ॥९६॥
द्विजातिकृपणादिभ्यो ददाव यच्छतद्वयम् ।
एव स विनियुङ्क्ते स्म नित्यं पञ्चशतीमपि ॥९७॥
तस्थौ च पूर्वमभ्यासे सिंहद्वारेऽस्य भूपतेः ।
कृत्वाह्निकादि चागत्य तत्रैवासीन्निशां पुनः ॥९८॥
एतां तद्दिनचर्यां च नित्यं चारा न्यवेदयन्।
राज्ञे तस्मै ततस्तुष्टः स तांश्चारान् न्यवर्तयत् ॥९९॥
सोऽपि वीरवरस्तस्य राज्ञस्तस्थौ दिवामिशम्।
स्नानादिसमयं मुक्त्वा सिंहद्वारे धृतायुधः ॥१ ॥
अथामं च वीरवर जेतुमिच्छन्प्रियाययौ।
सूरप्रतापासहनो गर्जितोग्रो बलागमः ॥१ १॥