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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

नवम लम्बक ५१

नवम लम्बक ५१
यह सुनकर और गणक ने उन चारों के नक्षत्र पूछकर और कुछ समय तक विचार कर
लेने के उपरान्त राजा से कहा—॥१४२॥
महाराज यदि आप क्रोध न करें तो स्पष्ट ही कहता हूँ कि इन चारों में एक के साथ भी
तुम्हारी कन्या की कुंडली नहीं मिलती। और, इस कन्या का विवाह भी इस लोक में न होगा।
क्योंकि यह शाप के कारण मनुष्य-जन्म में उत्पन्न हुई विद्याधरी है। आगामी तीन महीनों में
इसका वह शाप दूर होगा ॥१४३—१४४॥
इसलिए, ये लोग तीन मास तक यहाँ रहकर प्रतीक्षा करें तदनन्तर यह कन्या यदि अपने
विद्याधर-लोक में न गई, तो इसका इस लोक में विवाह हो सकेगा' ॥१४५॥
इस प्रकार, वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने ज्योतिषी की बातों में विश्वास प्रकट किया और
वे चारों वीर तीन मास तक वहीं रहे ॥१४६॥
तीन महीने बीतने पर राजा ने उन चारों वीरों ज्योतिषी और अनंगरति को फिर
बुलवाया। ज्योतिषी ने उस समय कन्या को अधिक सुन्दर देखकर उसका अन्तिम समय निकट
आया जान लिया ॥१४७-१४८॥
अब कहो तीन मास बीत गये। इस प्रकार जैसे ही राजा ने ज्योतिषी से पूछा
तबतक अनंगरति ने अपनी साड़ी के आंचल से अपना मुंह ढक लिया और उस मानव शरीर का
परित्याग कर दिया ॥१४९-१५०॥
यह इस प्रकार मुँह ढककर क्यों बैठी है? ऐसा सोचकर राजा ने जब उसका मुंह स्वयं
खोलकर देखा तब उसे मरी हुई पाया ॥१५१॥
वह हिम से मारी हुई कमलिनी के समान हो गई थी उसके नेत्र-रूपी भ्रमर उड़ते
हुए थे मुख-कमल तेजोहीन था और अब उसके मुख में हंस के समान मधुर वाणी न थी ॥१५२॥
उसे मृत देखकर शोक-रूपी वज्र से मारा हुआ-सा और अपने पक्ष (पक्ष) के कटने से
मूर्च्छित वह राजा (पर्वत) भूमि पर गिर पड़ा ॥१५३॥
उसकी माता पद्ममति भी हाथी से उखाड़ फेंकी गई लता के समान और अपने आभूषण
रूपी पुष्पों के गिर जाने पर शून्य-सी होकर मूर्च्छित हो गई ॥१५४॥
अन्य भी परिजन सब लोग और वे चारों वीर भी अत्यन्त दुःखी हो गये। इतने में ही
राजा ने स्वस्थ होश में आकर जीवदत्त से कहा ॥१५५॥

मात्रैषां शक्तिरन्येषामधुनावसरोऽस्ति ते।
प्रतिज्ञातं त्वया नारीं जीवयामि मृतामिति॥१५६॥
यदि विद्याबलं तद्‌स्ति तज्जीवय सुतां मम।
दास्यामि तुभ्यमेवैतां विप्राय प्राप्तजीविताम्॥१५७॥
इति राज्ञो वचः श्रुत्वा जीवदत्तोऽभिमन्त्रितैः।
अभ्युक्ष्य तोयैस्तां राजपुत्रीमार्यामिमां जगौ॥१५८॥
'अट्टाट्टहासहसिते करङ्कमालाकुले दुरालोके।
चामुण्डे विकराले साहाय्यं मे कुरु त्वरितम्'॥१५९॥
एव तेन कृते यत्ने जीवदत्तेन सा यदा।
धान्ना न जीवितं प्राप विषण्णः सोऽवदत्तदा॥१६०॥
यत्सापि विन्ध्यवासिन्या विद्या मे निष्फला गता।
तदेतेनोपहास्येन किं कार्यं जीवितेन मे॥१६१॥
इत्युक्त्वा जीवदत्तः स्वं शिरश्छेत्तुं महासिना।
यावत् प्रवर्त्तते तावदुद्‌गाद् भारती दिवः॥१६२॥
भो जीवदत्त मा कार्षीः साहसं शृणु सम्प्रति।
एषानङ्गरतिर्नाम सा विद्याधरकन्यका॥१६३॥
पित्रोः शापेन मानुष्यमियन्तं कालमागता।
त्यक्त्वाद्यैतां तनुं याता स्वलोकं स्वतनौ स्थिता॥१६४॥
तद्विन्ध्यवासिनीमद्य गत्वाराधय तां पुनः।
तत्प्रसादादिमां प्राप्स्यस्यपि विद्याधरीं सतीम्॥१६५॥
न चैषा दिव्यभोगस्था शोच्या राज्ञो न चापि ते।
इत्युदीर्य यथातत्त्वं दिव्या वाग्विरराम सा॥१६६॥
ततः सुतायाः सस्कारं कृत्वा राजा जहौ शुचम्।
सदारोऽपि ययुस्तज्ज्ये ष्ठयो भीरा यथागतम्॥१६७॥
जीवदत्तस्तु जातास्थो गत्वा तां विन्ध्यवासिनीम्।
तपसाराधयामास स्वप्ने साप्यादिदेश तम्॥१६८॥
अनङ्गप्रभायाः कथा
सुप्ता तवाहमूत्तिष्ठ शृणु चेदं ब्रवीमि ते।
अस्ति वीरपुरं नाम नगरं तुहिमाचले॥१६९॥
विद्याधराधिराजोऽस्ति समरो नाम तत्र च।
तस्यानङ्गवतीदेव्यां सुतानङ्गप्रभाजनि॥१७०॥