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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

नवम लम्बक ४४५

नवम लम्बक ४४५
सिंहल-द्वीपवासियों से उसने सुना कि कनकवर्मा अपने देश चित्रकूट को चला गया।
तब चन्द्रस्वामी कोटीश्वर नामक वैश्य के साथ सिंहल से समुद्र पार करके चित्रकूट को
आया ॥६३-६४॥
और, यहाँ आकर उसने कनकवर्मा वैश्य को ढूँढ़ लिया। उसके पास जाकर बच्चों के
लिए उत्सुक उसने अपना सारा वृत्तान्त सुना दिया ॥६५॥
उसकी बेचैनी का अनुभव करके कनकवर्मा ने उन दोनों बालकों को उसे दिखा दिया
जिन्हें वह जंगल से लाया था ॥६६॥
चन्द्रस्वामी ने उन दोनों बच्चों को देखा तो वे उसके बच्चे नहीं थे बल्कि दूसरे ही
कोई थे ॥६७॥
तब शोक-सन्तप्त और निराश चन्द्रस्वामी रो पड़ा और विलाप करने लगा—हाय!
मैं इतना घूमने पर भी न लड़का पाया न लड़की ॥६८॥
दुष्ट स्वामी के समान भाग्य ने आशा दी किन्तु पूरी न की। इस दुराशा ने व्यर्थ ही दूर
से दूर भटकाया ॥६९॥
इस प्रकार सोचते हुए चन्द्रस्वामी को कनकवर्मा ने धीरे-धीरे धीरज बँधाया। तब
चन्द्रस्वामी शोक से बोला—॥७०॥
सारी पृथ्वी पर घूमते-भटकते हुए मैंने यदि एक वर्ष के भीतर उन दोनों बच्चों को
नहीं पाया तो मैं गंगा-तीर पर तपस्या करके शरीर त्याग दूँगा' ॥७१॥
इस प्रकार कहते हुए चन्द्रस्वामी से वहाँ बैठे हुए किसी ज्ञानी ने कहा—'नारायणी की
कृपा से तू बच्चों को प्राप्त करेगा जा' ॥७२॥
यह सुनकर प्रसन्नचित्त चन्द्रस्वामी सूर्य भगवान् की कृपा का स्मरण करता हुआ
कनकवर्मा द्वारा सत्कार किये जाने पर चित्रकूट नगर से चला ॥७३॥
वह चन्द्रस्वामी अग्रहारों ग्रामों और नगरों में भटकता-मचलता सायंकाल बहुत ऊँचे
ऊँचे और घने वृक्षोंवाले एक जंगल में पहुँचा ॥७४॥
वहाँ रात बिताने के लिए, फल और जल से तृप्ति पाकर सिंह बाघ आदि पशुओं के
भय से वह एक वृक्ष पर चढ़कर बैठ गया ॥७५॥
उसे नींद नहीं आई और जागते ही जागते उसने आधी रात के समय उस वृक्ष के नीचे
देखा कि नारायणी की प्रसन्नता से एक मातृचक्र वहाँ आया ॥७६॥
वह मातृचक्र नाना प्रकार के अपने योग्य आहार लाकर भैरव देव की प्रतीक्षा करने
लगा ॥७७॥