कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
दशम लम्बक ९६५
दशम लम्बक ९६५
यह सुनकर उस राजकुमार न तपस्विनी से क्षमा-प्रार्थनापूर्वक पूछा कि भगवति वह
कौन-सी मृगाङ्कलेखा है? कृपया बताइए' ॥२२० ॥
तब वह तपस्विनी उससे कहने लगी—पर्वतराज हिमालय पर शशिशेखर नाम का
विद्याधरों का राजा है। मृगाङ्कलेखा उसी राजा की सुन्दरी कन्या है जो अपने सौन्दर्य से रात
में विद्याधरों को सोने नहीं देती (अर्थात्, सभी उसकी चिन्ता में सो नहीं पाते) ॥२२१ २२२॥
'वह तेरे योग्य पत्नी है और तू उसके योग्य पति है'। सिद्ध तापसी के इस प्रकार कहने
पर हिरण्याक्ष उससे बोला—'भगवति तब मुझे यह भी बताइए कि वह मुझे कैसे मिल सकती है ?
यह सुनकर योगेश्वरी हिरण्याक्ष से बोली—'मैं उसके पास जाकर तेरी चर्चा करके उसका आशय
(अभिप्राय) समझूँगी। और फिर, मैं ही यहाँ आकर तुझे वहाँ ले जाऊँगी ॥२२३—२२५॥
यहाँ अमरनाथ नाम का जो शिव-मन्दिर है वहीं मैं प्रातःकाल तुझे मिलूँगी। मैं वहाँ
नित्य पूजन के लिए उपस्थित होती हूँ' ॥२२६॥
ऐसा कहकर वह तपस्विनी अपनी सिद्धि के योग से उस मृगाङ्कलेखा के पास हिमालय
पर गई ॥२२७॥
वहाँ जाकर उसने हिरण्याक्ष के गुणों का ऐसा वर्णन किया कि वह मृगाङ्कलेखा अत्यन्त
उत्कण्ठित होकर उससे बोली—॥२२८॥
'भगवति यदि वैसे पति को मैंने न पाया तो इस निष्फल जीवन से मुझे क्या काम है?
इस प्रकार के भावावेश से आक्रान्त मृगाङ्कलेखा ने हिरण्याक्ष की चर्चा में दिन व्यतीत कर उसी
तपस्विनी के साथ रात भी बिताई ॥२२९-२३० ॥
इधर हिरण्याक्ष भी मृगांकलेखा की चिन्ता में दिन व्यतीत करके रात्रि में किसी प्रकार
सोया और पार्वती ने उसे स्वप्न में कहा—तू पहले जन्म में विद्याधर था। मुनि के शाप से मनुष्य
हो गया। इसी तापसी के हाथ का सम्पर्क होने से तू शापमुक्त हो जायगा ॥२३१ २३२॥
तब तू उस मृगाङ्कलेखा से विवाह करेगा। उसकी चिन्ता तुझे न करनी चाहिए। वह तेरी
पूर्वजन्म की पत्नी है' ॥२३३॥
तच्छ्रुत्वा क्षमयित्वा तां राजपुत्र च पृष्टवान्।
कषा मृगाङ्कलेखास्या भगवत्युच्यतामिति ॥२२०॥
ततस्त साद्रवीदस्ति क्षितितेजा इति श्रुतः।
विद्याधरेन्द्रो हिमवत्यचलेन्द्रे महायशाः ॥२२१॥
मृगाङ्कलेखा तस्यास्ति तनया वरकन्यका।
रूपेण द्युचरेन्द्राणां निशासूनिद्रकप्रभा ॥२२२॥
सा चानुरूपा भार्या ते तस्यास्त्वमुचितः पतिः।
इत्युक्तः सिद्धतापस्या हिरण्याक्षा जगाद ताम् ॥२२३॥
कथं भगवति प्राप्या मया सा तर्हि कथ्यताम्।
तच्छ्रुत्वा सा हिरण्याक्षं च योगेश्वर्यभाषत ॥२२४॥
गत्वाहं त्वत्कथाख्यानावुपलप्स्ये तदाशयम्।
आगत्य चाहमत्र त्वां तत्र नेष्याम्यतः परम् ॥२२५॥
इहास्ति योऽमरेखाख्यो देवस्तत्केतने त्वया।
प्रात प्राप्तास्मि नित्यं हि तमर्चितुमुपम्यहम् ॥२२६॥
इत्युक्त्वा नमसा प्रायात्तापसी सा स्वसिद्धितः।
तस्या मृगाङ्कलेखाया निकटं तुहिनाचलम् ॥२२७॥
तत्र तस्यै हिरण्याक्षगुणान्युक्त्वा क्षणेन सा।
तथा यथा दिव्यकन्या सात्युत्कण्ठमुवाच ताम् ॥२२८॥
तादृशं अद्य भर्तारं प्राप्नुयां भगवत्यहम्।
तन्निष्फलेन किं कार्यममुना जीवितेन मे ॥२२९॥
इत्यारूढस्मरावेशा नीत्वा तत्कथया दिनम्।
मृगाङ्कलेखा तापस्या सहोवास तया निशाम् ॥२३०॥
तावत्सोऽपि हिरण्याक्षस्तच्चिन्तानीतवासरः।
सुप्तः कपञ्चिज्जगदे गौर्या स्वप्ने निशाक्षये ॥२३१॥
विद्याधरः सन् प्राप्तस्त्वं मुनिशापेन मर्त्यताम्।
तापस्याः करसंस्पर्शात्तस्या मोक्षमथ ततः ॥२३२॥
मृगाङ्कलेखां च तवस्तामाशु परिणेष्यसि।
तच्चिन्ता नात्र कार्या ते पूर्वभार्या हि सा तव ॥२३३॥
१ काश्मीरेषु 'अमरनाथ' इति प्रसिद्धः।