कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
अष्टम लम्बक ४४१
अष्टम लम्बक ४४१
वह प्रणाम करते हुए उन सब से कहने लगा-'शिवजी ने आप लोगों को आदेश दिया है
कि आप लोगों को सुमेरु के घर पर भोजन करना ही चाहिए, क्योंकि वह हमारा आत्मीय
व्यक्ति है ।।१४४।।
उसके तृप्त होने पर आप लोगों को शाश्वत तृप्ति होगी। नन्दी के मुख से यह सुनकर
सबने भोजन करना स्वीकार किया ।।१४५।।
तदनन्तर विनायक, महाकाल और वीरभद्र की प्रमुखता में अनन्त गण वहाँ आ
गये ।।१४६।।
उन सबों ने भोजन तैयार करके देव, दैत्य, विद्याधर और मनुष्य एवं अतिथियों को
सम्मान-सहित क्रम से बैठाया ।।१४७।।
और सुमेरु द्वारा विद्या-बल से तैयार किये गये तथा शिवजी के आदेश से कामधेनु
द्वारा उत्पन्न किये गये विविध प्रकार के भोजन उनके सामने परोसे गये ।।१४८।।
और, एक-एक अतिथि के लिए उनकी प्रतिष्ठा के अनुसार सेवा के निमित्त वीरभद्र,
महाकाल, भृङ्गी प्रभृति देवता संलग्न हो गये ।।१४९।।
बीच-बीच में प्रेम और सन्तोष से मिलते हुए आकाशचारियों के चारणों के गान और
विद्याधरियों के नृत्य उनका मनोरंजन करते रहे ।।१५०।।
भोजन के अनन्तर नन्दीश्वर आदि गणों ने उन्हें दिव्य मालाएँ, वस्त्र और आभूषण
आदि प्रदान किये ।।१५१।।
तब नन्दी आदि गणों ने सभी देवताओं का सम्मान किया। वे सभी अपने-अपने वाहनों
पर चढ़कर जहाँ से आये थे, वहीं लौट गये ।।१५२।।
और सभी असुर तथा विद्याधर भी सूर्यप्रभ से आज्ञा पाकर अपने-अपने स्थानों को
गये ।।१५३।।
सूर्यप्रभ भी अपने मित्रों तथा नववधू के साथ सुमेरु के प्राचीन आश्रम में लौट
आया ।।१५४।।
तदनन्तर, उसने अपने मित्र दृढ़ को राजाओं तथा अपने भाई रत्नप्रभ के पास अपनी
स्थिति का समाचार देने के लिए भेजा ।।१५५।।
और, सायंकाल के अनन्तर वह सूर्यप्रभ सुन्दर रत्नों के पर्यङ्क से सजे हुए और सुन्दर
बने हुए कामचूड़ामणि के वास भवन में प्रविष्ट हुआ ।।१५६।।
वहाँ पर गाढ़ आलिङ्गन, चुम्बन और मर्दन आदि से उसकी नई-नई लज्जा को क्रमशः
दूर कराकर उस नवोढ़ा काम-कला-वित् के साथ अनिर्वचनीय नवीन तथा दूसरी पत्नियों से
अनास्वादित आनन्द-उपभोग में उसने रात्रि व्यतीत की ।।१५७-१५८।।
५६
इदानीं बहिरन्यासां निवेशो हृदयेऽस्तु मे।
अन्तः पुनस्त्ववैकस्या इति तां चान्वरञ्जयत् ॥१५९॥
ततो रतान्तसुप्तस्य प्रियाश्लेषसुखावहा।
शनैः समाप्तिमगमन्निशा निद्रा च तस्य सा ॥१६०॥
प्रभाते च स उत्थाय गत्वा सूर्यप्रभस्ततः।
आद्यास्ता रञ्जयामास निजभार्याः सह स्थिताः ॥१६१॥
तास्तं नववधूरक्तं यावत्परिहसन्ति च।
सनर्मवक्रमधुरस्निग्धमुग्धैर्वचःक्रमैः ॥१६२॥
द्वाःस्थेनावेदितस्तावदागत्य प्रणिपत्य च।
विद्याधरः सुषेणाख्यः कृतिनः स व्यजिज्ञपत् ॥१६३॥
देव त्रिकूटनाथाद्यैः सर्वैर्विद्याधरेश्वरैः।
प्रेषितोऽस्मीहैवं च देव विज्ञापयन्ति ते ॥१६४॥
ऋष्यमाद्रौ तृतीयेऽह्नि ह्यभिषेकः शुभस्तव।
संपाद्यतां तत्सर्वेषामुद्यमोऽत्र विधीयताम् ॥१६५॥
तच्छ्रुत्वा प्रत्यवोचत्तं दूतं सूर्यप्रभस्तदा।
गच्छ त्रिकूटाधिपतिप्रभृतीन्ब्रूहि मद्गिरा ॥१६६॥
भवन्त एव कुर्वन्तु समारम्भं वदन्तु च।
आत्मनश्च परं सज्जा वयमत्र स्थिताः पुनः ॥१६७॥
संपादनं तु सर्वेषां करिष्यामो यथायथम्।
इत्यात्तप्रतिसन्देशः सुषेणः स ततो ययौ ॥१६८॥
सूर्यप्रभोऽपि चैकैकं प्रभासप्रभृतीन्सखीन्।
देवानां याज्ञवल्क्यादिमुनीनां भूभृतां तथा ॥१६९॥
विद्याधरासुराणां च विससर्ज पृथक्पृथक्।
निमन्त्रणाय सर्वेषां स्वाभिषेकमहोत्सवे ॥१७०॥
स्वयं जगाम चैकाकी कैलासं पर्वतोत्तमम्।
हरस्य चाम्बिकायाश्च निमन्त्रणकृतोद्यमः ॥१७१॥
आरोहंश्च तमद्राक्षीच्छुभ्रभूतिसितं गिरिम्।
सेव्यं श्वर्षिसिद्धानां द्वितीयमिव शङ्करम् ॥१७२॥
मर्यादधिश्वमार्गश्च दुरारोहं छत परम्।
स तं पश्यन्ददर्शाथ वैद्रुमं द्वारमेकतः ॥१७३॥