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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

अष्टम लम्बक ४३१

अष्टम लम्बक ४३१
किन्तु, जब पाशुपतास्त्र उन सब अस्त्रों को हटाकर धृतधर्मा को मारने के लिए प्रवृत्त
हुआ तब सूर्यप्रभ ने उस अस्त्र की स्तुति करके उससे प्रार्थना की कि वह धृतधर्मा का वमन करे।
उसे बाँधकर वह मुझे सौंप दे ॥६९-७०॥
यह देखकर सभी देवता क्रोध से युद्ध करने के लिए उद्यत हो गये और इधर उन्हें
जीतने के लिए असुर भी तैयार हो गये ॥७१॥
उसी समय शंकर द्वारा प्रेरित वीरभद्र नामक गण उत्पन्न हुआ और उसने इन्द्र आदि
देवताओं को शंकर की आज्ञा सुनाई—॥७२॥
'तुमलोग युद्ध देखने के लिए आये हो तो युद्ध करने का यह कौन-सा तुक है।
इस प्रकार, मर्यादा का भंग करने से और भी बुराई उत्पन्न होगी' ॥७३॥
यह सुनकर देवता कहने लगे कि 'इस युद्ध में हम सभी के पुत्र मारे गये और मारे
जा रहे हैं। इसलिए, हमलोग क्यों न लड़ें ? ॥७४॥
पुत्र का स्नेह छोड़ा नहीं जा सकता। अतः मारनेवालों पर प्रतिक्रिया अवश्य ही
करनी होगी। इसमें क्या बेतुकापन है ॥७५॥
देवताओं के इस प्रकार कहने पर और वीरभद्र के अन्तर्धान होने पर देवासुरों का भी
भीषण युद्ध प्रारम्भ हुआ ॥७६॥
सुनीथ अश्विनीकुमारों के साथ प्रज्ञाढ्य चन्द्रमा के साथ स्थिरबुद्धि अष्ट वसुओं के
साथ कालचक्र वायु के साथ प्रकम्पन अग्नि के साथ सिंहदंष्ट्र निर्ऋति के साथ प्रमथन वरुण
के साथ धूमकेतु यम के साथ और महामाय धनाधिप कुबेर के साथ द्वन्द्व-युद्ध करने लगे।
इसी प्रकार, अन्य असुर भी शस्त्रास्त्रों द्वारा देवताओं से युद्ध करने लगे ॥७७-७९॥
अन्त में देवता अपने जो-जो परम अस्त्र का प्रयोग करते थे शिवजी उस-उस अस्त्र को
हुङ्कार मात्र से व्यर्थ कर देते थे ॥८०॥
गदा उठाये हुए अपने मित्र को शिव ने शान्तिपूर्वक मना किया। अस्त्रों के विफल हो
जाने के कारण विवश देवता युद्ध से विरत हो गये ॥८१॥
तब इन्द्र क्रोध से भरकर स्वयं सूर्यप्रभ से युद्ध करने लगा और उस पर बाणों तथा
अन्यान्य शस्त्रास्त्रों की वर्षा करने लगा ॥८२॥
सूर्यप्रभ ने उसकी शस्त्र-वर्षा को साधारण समझा और स्वयं शान्त रह खींचे हुए धनुष से
इन्द्र को एक सौ बाणों से मारा ॥८३॥

ततः क्रुद्धः स कुलिशं जग्राह च सुराधिपः।
हुङ्कारं चाकरोद्बुद्धः कुलिशं च ननाश तत् ॥८४॥
ततः पराङ्मुखे याते शक्रे नारायणः स्वयं ।
प्रभासं योधयामास क्रोधात्कोटीमुखैः शरैः ॥८५॥
अस्त्राण्यन्यानि चाप्यस्त्रैर्निष्कम्यो युयुधे समम्।
हताश्वो विरथीभूतोऽप्यारुह्याग्यं रथं च सः ॥८६॥
तेन दैत्यारिणा सार्धं निर्विशेषमयुध्यत।
ततः प्रकुपितो देवो ज्वलच्चक्रं मुमोच सः ॥८७॥
प्रभासोऽप्यभिमन्त्र्यैव दिव्यं खड्गं प्रमुक्तवान्।
तयोरायुधयोर्युध्यमानयोर्वीक्ष्य धन्वराट् ॥८८॥
हीयमानं रणे खड्गं हुङ्कारं कृतवान्हरः।
तेन ते खड्गचक्रे द्वे अन्तर्धानमुपेयतुः ॥८९॥
ततो ननन्दुरसुरा विषीदन्ति स्म चामराः।
सूर्यप्रभे लब्धजये बद्धे च श्रुतशर्मणि ॥९०॥
संस्तुत्याराभयामासुरथ देवा वृषध्वजम्।
ततस्तुष्टः सुरानिदमादिवेशाम्बिकापतिः ॥९१॥
सूर्यप्रभप्रतिज्ञातं वर्जयित्वार्थ्यतां वरः।
दैव यत्ते प्रतिज्ञातं कः शक्तः कर्तुमन्यथा ॥९२॥
किं त्वस्माभिः प्रतिज्ञातं यदस्य श्रुतशर्मणः।
सत्यं तदप्यस्तु विभो मा भूद्वक्षक्षयश्च नः ॥९३॥
इत्युक्त्वा विरतान्देवा भगवानसमादिशत्।
संधौ कृते मवस्येतत्सन्धिधैवमिहास्तु वः ॥९४॥
सूर्यप्रभं प्रणमतु श्रुतशर्मा सहानुगः।
ततस्तथा विधास्यामो यथोभयहितं भवेत् ॥९५॥
इतीदवरवचो देवाः प्रतिपद्य समेति च।
सूर्यप्रभस्य विदधुः श्रुतशर्माणमानतम् ॥९६॥
ततस्तयोमिथस्त्यक्तवैरयोः कृष्ठमन्वयोः।
सन्धिं देवासुराश्चक्रुः शान्तवैराः परस्परम् ॥९७॥
अथ शृण्वत्सु निर्जितेष्वसुरेषु सुरेषु च।
उवाच भगवाञ्छम्भुः सूर्यप्रभमिदं वचः ॥९८॥