कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
अष्टम लम्बक २६३
अष्टम लम्बक २६३
'तुम्हें इन्द्र से या श्रुतशर्मा से तनिक भी भय नहीं करना चाहिए। हमारी शत्रुता के कारण
यदि श्रुतशर्मा अपनी ओर से युद्ध में देवताओं को लायेगा तो महाराज प्रह्लाद की अध्यक्षता में हम
असंख्य दानव तुम्हारे पक्ष में तैयार हैं॥३४-३५॥
हम पर प्रसन्न शिवजी की कृपा के लिए तैयार रहने पर तीनों लोकों में किस बेचारे की
शक्ति है कि वह हमारा सामना कर सके ॥३५॥
इसलिए, हे वीरो इस कार्य के लिए उद्योग करो। मय द्वारा इस प्रकार कहे गये वे सभी
प्रसन्न होकर उनकी बातों को मान गये ॥३६॥
तदनन्तर दूत द्वारा भेजे गये सन्देश के अनुसार वीरभट आदि सभी मित्र बन्धु
यथा योग्य नगर में आने लगे ॥३७॥
राजा चन्द्रप्रभ द्वारा उनका स्वागत-सत्कार और अभ्यागत सत्कार कर लेने पर मयासुर ने
राजा चन्द्रप्रभ से फिर कहा—॥३८॥
'हे राजन्! आज रात्रि को रुद्र की महाबलि की तैयारी करो। तदनन्तर मैं जैसा कहूँगा
वैसा करना' ॥३९॥
मय के वचन सुनकर राजा चन्द्रप्रभ ने रुद्रबलि की सामग्री तैयार करा दी और
[L16: रात को श्मशान में जाकर मय के उपदेशानुसार चन्द्रप्रभ ने स्वयं भक्तिपूर्वक बलि-दान
किया॥४०-४१॥
राजा उस बलि-दान के अद्भुत हवन कार्य में निमग्न होकर लगा हुआ था तभी अग्नि
से जय-जय का अत्यन्त भारी आकाश-गूंजने शब्द हुआ ॥४२॥
राजा द्वारा विधिवत् पूजन कर लेने पर प्रसन्न शूली ने कहा—'राजन्! इस द्रव्यवान्
दान से मैं तुम से बड़ा आनन्दित हुआ हूँ। विमुह्य मेरी कृपा के कारण चक्रव्यूहाङ्ग में भी भय न होता
चक्रवर्ती सूर्यप्रभ आकाशचारी विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा अवश्य होगा' ॥४३-४४॥
इस प्रकार ईश्वर की आज्ञा सुनकर और बलि को स्वीकार करते प्रत्यक्षतः देखकर सभी
आनन्दित हो गये ॥४५॥
तब राजा चन्द्रप्रभ अपने पुत्र के उदय से पूर्ण विश्वास पाकर और कृत-कृत्य-सा मानकर
धीरे-धीरे सब अपने नगर को लौट आये॥४६॥
प्रातश्च देव्या पुत्रेण राजभिः सचिवैर्वृतम्।
एकान्तस्थं च तं चन्द्रप्रभभूपं मयोऽभ्यधात् ॥४७॥
शृणु राजन् रहस्यं ते वक्ष्येऽद्य चिररक्षितम्।
त्वं दानवः सुनीथाख्यो मम पुत्रो महाबलः ॥४८॥
सूर्यप्रभः सुमुण्डीकसमकश्च तवानुजः।
देवाहवे हतौ जातौ पितापुत्रौ युवामिह ॥४९॥
तद्दानवशरीरं ते संरक्ष्य स्थापितं मया।
आलिप्य युक्त्या दिव्याभिरोषधीभिर्घृतेन च ॥५०॥
तस्मात् प्रविश्य विवरं पातालमुपगम्य च।
प्रविश स्वं शरीरं तद्युक्त्या मदुपदिष्टया ॥५१॥
तच्छरीरप्रविष्टश्च तेजोवीर्यबलाधिकः।
तथा भविष्यसि यथा जेष्यसि त्रिदशान् रणे ॥५२॥
सूर्यप्रभस्त्वनेनैव कान्तेन वपुषा चिरम्।
सुमुण्डीकावतारोऽयं भवता खचरेश्वरः ॥५३॥
एतन्मयासुरान्मूत्वा सर्वैरङ्गीचकार सः।
राजा चन्द्रप्रभो हृष्टः सिद्धार्थस्त्विदमब्रवीत् ॥५४॥
अयंदहप्रविष्टः किं किमयं पञ्चतां गतः।
इति भ्रान्तो तदस्माकं का धृतिर्वदतां वर ॥५५॥
किं चैष विस्मरेदस्मांस्तदा देहान्तराश्रितः।
परलोकगतो यद्वत्तत् कोऽयं वय च के ॥५६॥
एतत् सिद्धार्थतः श्रुत्वा स जगाद मयासुरः।
प्रविशन्तममुं तस्मिञ्छरीरे योगयुक्तितः ॥५७॥
स्वतन्त्रं यूयमागत्य साक्षात् तत्रैव पश्यत।
न चैव विस्मरेद्येष युष्माञ्छृणुत कारणम् ॥५८॥
अस्वप्नो मृतोऽन्यत्र गर्भे यो जायते न सः।
किञ्चित् स्मरत्यन्तरितः क्लेशैस्तैर्गर्भादिभिः ॥५९॥
स्वातन्त्र्येण तु योऽन्यस्मिञ्छरीरे योगयुक्तितः।
अन्तःकरणमाविश्य प्रविशन्दिन्द्रियाणि च ॥६०॥
अविप्लुतमनोबुद्धिर्गुहादिव गृहान्तरम्।
सहसा स स्मरत्येव ज्ञानी योगेश्वरोऽखिलम् ॥६१॥