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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

अष्टम लम्बक १७३

अष्टम लम्बक १७३
इस प्रकार, प्रभास ने शत्रु को अपने हाथ की आश्चर्यजनक सफाई दिखलाई। मानों
प्रभास ने पहिले दिन मारे गये अपने पक्ष के अनेक वीरों को मारने का क्रोध-पूर्ण बदला
ले लिया ॥३९-४०॥
इस प्रकार, मनुष्य और असुरों द्वारा विद्याधरराज के मारे जाने से सारे विद्याधर-दल में
शोक और हाहाकार-मच गया ॥४१॥
तब कालकंजर का राजा विद्युत्प्रभ कोप से प्रभास की ओर झपटा ॥४२॥
प्रभास ने लड़ते हुए विद्युत्प्रभ की महान् ध्वजा को बाण से काटकर और बार-बार
नये-नये उठाये धनुष को भी काटना प्रारम्भ किया ॥४३॥
तब विवश होकर विद्युत्प्रभा माया से आकाश में उड़कर छिप गया और रुष्ट होकर
आकाश से प्रभास पर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करने लगा ॥४४॥
प्रभास ने भी उसके शस्त्रास्त्रों को दूर करके प्रकाशानास्त्र के प्रभाव से छिपे हुए उसको
दृश्य किया और आग्नेयास्त्र के प्रयोग से उसे जलाकर भूमि पर गिरा दिया ॥४५-४६॥
यह देखकर श्रुतशर्मा ने अपने महारथियों से कहा—देखो इस प्रभास ने हमारे दो
महारथियों के सरदारों को मार गिराया ॥४७॥
तो तुमलोग कैसे सहन कर रहे हो सब मिलकर उसे मार डालो। यह सुनकर विद्याधरों
के आठ महारथी उसके सामने आये ॥४८॥
इन आठों में एक कर्कटक पर्वत का निवासी विद्याधरराज था जो ऊर्ध्वरोमा के नाम से
विख्यात था ॥४९॥
दूसरा महारथी करवीरपुर या पर्वतशिरोति विकटाक्ष नाम का था। तीसरा लीला-पर्वत
पर रहनेवाला अतिरुचिया का बेटा इन्दुमाली नामक विद्याधर का राजा था ॥५०-५१॥
चौथा गव्हरा में श्रेष्ठ कन्दर-पर्वत का निवासी रतिदंडी का बेटा काकाहक था ॥५२॥
पाँचवाँ त्रिशृङ्ग-पर्वत का राजा दंष्ट्राह्व था। छठा अंजनगिरि का राजा धूर्त
मद्दल था ॥५३॥

विद्याधराविमौ चातिरथमूयपती उभौ।
सप्तमो गर्दभाक्षा राजा कुमुदपर्वते ॥५४॥
नाम्ना वराहस्वामीति यो महारथयूथप ।
सद्भूषो दुन्दुभिक्षमाभृद्रथो मेधावरोऽष्टम ॥५५॥
एभिरष्टभिरागत्य मुक्तान् बाणान् विधूय सः।
प्रभासा युगपत् सर्वान् सायकेर्विध्यति स्म तान् ॥५६॥
जघान कस्यचिच्चाश्वान् कस्यचित् सारथि तथा।
चक्रत कस्यचित् कर्तुं कस्यचिच्चाच्छिनद्धनु ॥५७॥
मधावर चतुभिस्तु शरैर्विद्धवा सम हृदि।
अपातय महीपृष्ठे सद्योऽपहृतजीवितम् ॥५८॥
ततश्च योधयन्नन्यान्कुष्ठितोऽप्यकुन्तरम्।
शरेणाञ्जलिकेनारादूर्ध्वरोम्ण शिरोऽच्छिनत् ॥५९॥
शेषांश्च षट् तानेकैकभल्लनिर्कृन्तकन्धरान्।
हताश्वसारथीन् कृत्वा स प्रभासो न्यपातयत् ॥६०॥
पपात पुष्पवृष्टिश्च तस्य मूर्ध्नि ततो दिवः।
उत्तेजितासुरनृपा विच्छामीकृतखेचरा ॥६१॥
ततोऽन्ये तत्र चत्वार प्रपिता श्रुतशर्मणा।
महारथा प्रभास त रुन्धन्ति स्म धनुर्धरा ॥६२॥
एक काजरको नाम कुरण्डकगिरेः पतिः।
द्वितीयो डिण्डिमाक्षी च पञ्चकाद्रिसमाश्रयः ॥६३॥
विभावसुस्तृतीयश्च राजा जयपुरारुले।
चतुर्थो धबलो नाम भूमितुण्डकशासिता ॥६४॥
ते महारथयूथाधिपतय खचरोत्तमा।
प्रभासे पञ्च पञ्चेषुशतानि मुमुचु समम् ॥६५॥
प्रभासश्च क्रमात्तेषामेकैकस्यावहेलया।
एकेन ध्वजमेकेन धनुरेकेन सारथिम् ॥६६॥
चतुर्भिश्चतुरोऽश्वान्विपुणा त्वेकेनापासयच्छिरः।
शरैरष्टभिरकैक समाप्यथ ननाद सः॥६७॥
अथ विद्याधरा भूय श्रुतशर्माज्ञया युधि।
अन्ये चत्वार एवास्य प्रभासस्य समागमन् ॥६८॥

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