जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
१४४. नङ्गुट्ठ जातक
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१४४. नङ्गुट्ठ जातक
"बहुम्पेत घसद्धि जातवेद..." इसे शास्ता ने जेतवन मे विहार करते
समय आजीवको¹ के मिथ्या-व्रत के बारे में कहा।
क. वर्तमान कथा
उस समय जेतवन की पिछली तरफ आजीवक नाना प्रकार की मिथ्या-
तपस्याएँ करते थे । बहुत से भिक्षुओ ने उनके उकडूं-बैठना, चिमगादड़-व्रत,
काँटो पर सोना, तथा पञ्चाग्नि ताप आदि मिथ्या तपो के भेदो को देखकर भग-
वान से पूछा—भन्ते ! इस मिथ्या तप से कुछ भी उन्नति होती है ?
शास्ता ने उत्तर दिया—"भिक्षुओ, इस प्रकार के मिथ्या तप से न कल्याण
ही होता है, न उन्नति ही होती है। पूर्व समय मे पण्डितो ने यह समझा कि
इस प्रकार के तप से कल्याण होगा या उन्नति होगी। वे जन्म दिन पर रखी
हुई अग्नि लेकर जगल गए। यहां अग्नि-पूजा आदि से कुछ भी लाभ न देख,
आग को पानी से बुझा वे कसिण अभ्यास कर अभिज्ञा तथा समापत्तियां
प्राप्त कर ब्रह्मलोक गामी हुए।" इतना कह पूर्वजन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उदीच्य ब्राह्मण-कुल में पैदा हुए। उनके पैदा होने के दिन माता पिता ने जन्म-
अग्नि लेकर रक्खी। सोलह वर्ष की आयु होने पर वे बोले—
'पुत्र ! तेरे जन्म के दिन हमने आग रक्खी है। यदि गृहस्थ होना चाहता
¹ नग्न-साधुओ का एक सम्प्रदाय।
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है तो तीनो वेद सीख। यदि ब्रह्मलोक जाना चाहता है तो आग लेकर जगल
चला जा, वहाँ अग्नि की पूजा करते हुए महाब्रह्मा को प्रसन्न कर ब्रह्मलोक गामी
होना।"
उसने कहा, मुझे गृहस्थी से काम नहीं। यह आग ले जगल में प्रवेश कर,
वहाँ आश्रम बना अग्नि-पूजा करता हुआ अरण्य में रहने लगा।
उसे एक दिन किसी प्रत्यन्त-ग्राम से दक्षिणा में एक बैल मिला। उस बैल..
को आश्रम पर लेजाकर उसने सोचा—अग्नि-भगवान को गो-मास खिलाऊँगा।
तभी उसे ख्याल आया—यहाँ नमक नहीं है। अग्नि भगवान् बिना नमक के
खा न सकेंगे। गाँव से नमक लाकर अग्नि-भगवान को नमक सहित खिलाऊँगा।
वह बैल को वैसे ही बांध नमक लेने के लिए गाँव गया। उसके जाने पर,
बहुत से शिकारी वहाँ आए। उन्होंने बैल को देख उसे मार डाला और उसका
मास पका खाकर उसकी पोछ, जाँघ तथा चर्म वही छोड़कर शेष मास लेकर
चले गए।
ब्राह्मण ने लौटकर जब केवल पूँछ आदि को देखा तो सोचने लगा—यह
अग्नि भगवान् अपनी चीज की भी रक्षा नहीं कर सके। मेरी तो क्या रक्षा
करेंगे ? यह अग्नि-पूजा निरर्थक है। इससे कल्याण या उन्नति नहीं है।
'उसका मन अग्नि-पूजा की ओर से उदासीन हो गया। वह बोला—'भो '
अग्नि-भगवान् ! तुम अपनी चीज की भी रक्षा नहीं कर सके। मेरी क्या.
रक्षा करोगे ? मास तो नही है, इतने से ही सन्तुष्ट होओ।' यह कह पूँछ
आदि को आग में फेंकते हुए यह गाथा कही—
बहुम्पेतं असब्भि ! जातवेद ! यं तं वालधिनाभिपूजयाम,
मंसारहस्स नत्थञ्ज मंसं नङ्गुट्ठम्पि भवं पटिग्गहातु ॥
[ हे असत्पुरुष ! अग्निदेव ! यह भी बहुत समझें कि हम पूँछ से तेरी
पूजा कर रहे हैं। तुझे मास मिलना योग्य था, लेकिन मास नही है। इसलिए
आप जनाब पोछ ग्रहण करे । ]
बहुम्पेतं, इतना भी बहुत है, असब्भि, असत्पुरुष ! असाधुजानिक ।
जातवेद, अग्नि को सम्बोधन करता है। अग्नि जात होने ही पैदा होते ही अनु-
भव होती है, ज्ञात होती है, प्रकट होती है—इसलिए जातवेद कहलाती है।
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यं तं वालधिनाभिपूजयाम, आज हम तुझे जो अपनी पास की चीज भी सु-
रक्षित नहीं रख सकता उसकी पूंछ से पूजा कर रहे हैं। यही प्रकट करता है
कि यह भी तेरे लिए बहुत कर रहे हैं। मसारहस्स, तुझे मांस चाहिए था।
आज तेरे लिए मांस यही है। सङ्गुट्ठम्पि भव परिग्गहातु, अपनी चीज को रख
सकने में असमर्थ आप यह खुरसहित जांघ का चर्म और पोंछ भी ग्रहण
कर।
इस प्रकार कह बोधिसत्व आग को पानी से बुझा ऋषि-प्रव्रज्या के अनु-
सार प्रव्रजित हो अभिज्ञा तथा समापत्तियां प्राप्त कर ब्रह्मलोक-परायण
हुआ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया।
आग को बुझानेवाला तपस्वी उस समय मैं ही था।
१४५. राध जातक
“न त्वं राध ! विजानासि...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
हुए पूर्व-भार्या के प्रति आसक्ति के बारे में कही। वर्तमान-कथा इन्द्रिय-जातक¹
में आएगी।
शास्ता ने उस भिक्षु को बुलाकर कहा—भिक्षु स्त्रिया को बचाया नहीं
जा सकता। पहरेदार रखने से भी उनकी देखभाल नहीं हो सकती। तू भी
पहले पहरेदार रखकर भी नहीं बचा सका। अब कैसे बचा सकेगा ? इतना
कह पूर्वजन्म की कथा कही--
¹ इन्द्रिय जातक (४२३)