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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

११७. तित्तिर जातक (२)

तित्तिर ] ३१
११७. तित्तिर जातक (२)
"अच्चुग्गता अतिबलता "यह (गाथा) शास्ता ने जेतवन मे विहार
करते समय कोकालिक¹ के बारे मे कही थी।
क. वर्तमान कथा
उसकी वर्तमान कथा तेरहवे निपात की तक्कारिय जातक² म प्रगट होगी।
शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी कोकालिक अपनी वाणी के कारण
नष्ट हुआ है, पहले भी नष्ट हुआ है।
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व ने
उदीच्य ब्राह्मण कुल म जन्म ग्रहण कर बड़े होने पर तक्षशिला जा सब विद्याएँ
सीखीं। फिर काम-भोग के जीवन को छोड़ ऋषि प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित
हो पाँच अभिज्ञा तथा आठ समापत्तियो को प्राप्त किया । हिमवन्त प्रदेश के
सभी ऋषियो ने उन्ह अपना उपदेशक आचार्य बनाया और उनके आस-पास
रहने लगे। वे भी पाँच सौ ऋषियो के उपदेशक-आचार्य बन ध्यान मग्न हो
हिमवन्त मे रहते थे ।
उस समय पाण्डु रोग से पीडित एक तपस्वी कुल्हाडी लेकर लकडियाँ
फाड रहा था। उसके पास बैठे एक वाचाल तपस्वी ने 'यहाँ पर मारें, यहाँ
पर मारें' बार बार कहकर उस तपस्वी को क्रोधित कर दिया। उसने क्रोध
¹ कोकालिक देवदत्त के पक्ष का एक सघ-भेदक था।
² तक्कारिय जातक (४८१)

३२ [ १.१२.११७
में आकर कहा, 'तू मुझे अब लकडी चीरना सिखाना चाहता है', और अपनी
तेज कुल्हाड़ी उठा उसे एक ही प्रहार से मार डाला।
बोधिसत्व ने उसका शरीर-कृत्य किया।
उसी समय आश्रम से कुछ ही दूर वल्मीक पर एक तित्तिर रहता था। यह
सुबह शाम वल्मी के ऊपर खड़ा हो बडे जोर से आवाज लगाता। उसे सुन
एक शिकारी ने सोचा कि तित्तिर होगा और शब्द के पीछे पीछे जा, उसे मार
घर ले गया।
बोधिसत्व ने उसकी आवाज न सुनाई देती देख तपस्वियों से पूछा-
उस जगह एक तित्तिर रहता था। उसकी आवाज नहीं सुनाई देती ? उन्होंने
बोधिसत्त्व को सब हाल कहा। बोधिसत्त्व ने ऊपर की दोनों बातों को मिला
ऋषियों के सामने यह गाथा कही—
अच्चुग्गता अतिबलता अतिवेलं पभासिता,
वाचा हनति दुम्मेधं तित्तिरं वातिवस्सितं ॥
[ अति-ऊँची, अति जोर से अत्यधिक देर तक बोली गई वाणी मूर्ख आदमी
को वैसे ही मार डालती है जैसे जोर से चिल्लाने से तित्तिर मारा गया।]
अच्चुग्गता, अति उद्गता। अतिबलता, बार बार बोलने से बहुत
बलशाली हो गई। अतिवेलं पभासिता उचित से बहुत ज्यादा देर तक
भाषित। तित्तिरं वातिवस्सितं, जैसे बहुत बोलने से तित्तिर मारा गया, वैसे
ही इस प्रकार की वाणी मूर्ख आदमी को मार गिराती है।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ऋषियों को उपदेश दे चारो ब्रह्म-विहारों की
भावना कर ब्रह्म-लोक गामी हुए।
शास्ता ने 'भिक्षुओ, न केवल अभी कोकालिक अपनी वाणी के कारण
विनष्ट हुआ, किन्तु पहले भी नष्ट हुआ' कहा, और यह धर्मदेशना ला जातक का
मेल बैठाया।
उस समय दुर्वचन बोलनेवाला तपस्वी कोकालिक हुआ। ऋषिगण
बुद्ध-परिषद। और ऋषिगण का शास्ता तो मैं था ही।