जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
हिम्मत हारता है ?" इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही—
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नही लेकर दिया था ? अब इस प्रकार के शासन में प्रव्रजित होकर क्यो
हिम्मत हारता है ?" इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय वाराणसी के
समीप ही बढ़ई-ग्राम था । वहाँ पाँच सौ बढ़ई रहते थे ।
यह नौका से नदी के स्रोत के ऊपर की तरफ जाते । यहाँ जगल में घर
बनाने की लकडी पाटकर वही एक तल्ले तथा दो तल्ले के मकान बना, खम्भे
से आरम्भ करके सभी लकडियो पर चिह्न लगाते । फिर उन्हें नदी के किनारे
ले जा, नौका पर चढा, स्रोत के अनुसार चल नगर में आते । वहाँ जो जैसे घर
चाहता, उसे वैसे बना देकर कार्षापण ले फिर वैसे ही जा घर के सामान लाते ।
उनके इस प्रकार जीविका चलाते हुए एक बार पडाव डालकर लकडी
काटते समय, उनके पास ही एक हाथी का पांव खैर की लकडी के खूंटे पर पडा ।
उस खूंटे से उसका पांव बिध कर उसमें बडी पीडा होने लगी । पैर सूज गया ।
उसमें से पीप बहने लगा ।
पीडा से पीडित हो उसने लकडी काटने का शब्द सुनकर सोचा कि इन
बढ़इयो से मेरा कल्याण होगा । ऐसा समझ कर वह तीन पैरो से चलकर
उनके पास पहुँचा और वही नजदीक ही पड रहा ।
बढइयो ने उसका सूजा हुआ पैर देखा तो पास गए । उन्हें उसमें खूंटा
दिखाई दिया । उन्होने तेज कुल्हाडी से खूंटे के चारो ओर गहरा निशान कर,
उसमें रस्सी बाँधकर उसे खींचकर निकाला। फिर पीप निचोडकर, निकालकर गर्म
पानी से धोया। उसके अनुकूल दवाई करने से थोडे ही समय में घाव ठीक हो गया।
हाथी ने निरोग होकर सोचा—इन बढइयो ने मेरी जान बचाई । मुझे
इनकी कुछ सेवा करनी चाहिए । उस दिन से वह बढइयो के साथ वृक्ष लाने
लगा । छीलने के समय वह उन्हे उलट उलट कर सामने करता । कुल्हाडी
आदि औजार ले आता । सूण्ड से लपेटकर काले धागे के सिरे को पकड लता ।
बढई भी भोजन के समय इसे एक एक पिण्ड देते तो पाँच सौ पिण्ड हो जाते ।
उस हाथी का एक बच्चा था, जो एक दम श्वेत वर्ण का था और था मगल
हाथी । हाथी ने सोचा कि मै बूढा हो गया । अब मुझे अपने लडके को इन बढइयो
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को काम करने के लिए देकर स्वयं जाना चाहिए । वह बिना बढ़इयों को सूचित
किए ही जंगल में गया । वहाँ से लड़के को ले आकर बढ़इयों से बोला—"यह
मेरा लड़का है। तुमने मुझे जीवन दान दिया है। मैं डाक्टर की फीस के बदले
में इसे देता हूँ। अब से यह तुम्हारी सेवा किया करेगा।" इतना कह, पुत्र
को आदेश दे कि पुत्र ! जो कुछ मेरा काम है, वह सब अब से तू करना, उसे
बढ़इयों को सौंप स्वयं जंगल में प्रवेश किया ।
उस समय से यह हाथी बच्चा बढ़इयों के कहने के अनुसार सब काम करने
लगा । ये भी उसे पाँच सौ पिण्ड देकर पोसते। वह काम समाप्त कर नदी में
उतर खेलकर आया करता। बढ़इयों के बच्चे भी उसे सूण्ड आदि से पकड़
जल और स्थल में सभी जगह उसके खेलते। श्रेष्ठ हाथी हो, घोड़े हों, अथवा
मनुष्य हो, कोई भी पानी में मल-मूत्र नहीं त्यागते। वह भी पानी में मल-मूत्र
न कर बाहर नदी के किनारे पर ही करता था।
एक दिन नदी के ऊपर के हिस्से में वर्षा हुई। हाथी की आधी सूखी लेण्डी
पानी से बहकर नदी के रास्ते जा वाराणसी नगर के पत्तन पर एक झाड़ी
में जा अटकी ।
राजा के हाथी-सेवक पाँच सौ हाथियों को नहलाने के लिए ले गए। श्रेष्ठ
हाथी की लेण्डी की गन्ध सूँघकर एक भी हाथी ने पानी में उतरने की हिम्मत न
की। सभी पूँछ उठाकर भागने लगे। हाथी-सेवकों ने हथवानों को खबर की ।
उन्होंने सोचा पानी में कुछ खतरा होगा। पानी खोज करने पर जब उन्होंने झाड़ी
में श्रेष्ठ हाथी की लेण्डी देखी तो समझ गए कि यही कारण रहा है। उन्होंने
चाटी मँगवाई और उसे पानी से भर, उसमें उसे घोल हाथियों के शरीर पर छिड़-
कवा दिया। शरीर सुगन्धित हो गए तब वह हाथी नदी में उतरकर नहाए ।
हथवानों ने राजा को यह समाचार सुना सलाह दी कि देव ! वह हाथी
खोजवाकर मँगवाया जाना चाहिए । राजा नौकाओं के बेड़े से नदी में उतर
ऊपर जानेवाले बेड़े से बढ़इयों के निवासस्थान पर पहुँचा। वह हाथी-बच्चा
नदी में खेल रहा था। जब उसने भेरी शब्द सुना तो जाकर बढ़इयों के पास
खड़ा हो गया। बढ़इयों ने राजा की अगवानी करते हुए कहा—देव ! यदि
लकड़ी की आवश्यकता थी, तो कष्ट क्यों किया ? क्या भेजकर मँगाना उचित
न होता ?
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आज से सातवें दिन राज्य न देकर युद्ध करगे। इतने दिन प्रतीक्षा करें।"
राजा ने 'अच्छा' कह स्वीकार किया।
देवी ने सातवें दिन पुत्र को जन्म दिया। लोगो ने कहा यह हमारे उदा-
चित्त की उदासी को दूर करता हुआ पैदा हुआ है, और उसका नाम अलीनचित्त
कुमार रक्खा।
उसके पैदा होने के ही दिन से नगर-निवासी कोसल-नरेश के साथ युद्ध
करने लगे। युद्ध का नेता न होने से बडी सेना भी युद्ध करती हुई थोडी थोडी
पीछे हटने लगी।
आमात्यों ने रानी से यह समाचार कह पूछा—
"आर्ये ! इस प्रकार सेना के पीछे हटने से हमें डर लगता है कि हम
हार न जाएँ। राजा का मित्र मगल हाथी न राजा के मरने की बात को जानता
है, न पुत्र उत्पन्न होने की बात जानता है और न कोसल-नरेश के आकर युद्ध
करने की बात जानता है। हम इसे यह सब कह दें ?"
उसने 'अच्छा' कह स्वीकार किया। फिर पुत्र को अलंकृत कर कोमल
वस्त्र की गद्दी पर लिटा महल से उतर आमात्यों को साथ ले हस्ति शाला में गई।
यहाँ बोधिसत्त्व को हाथी के पैरो पर रख कर बोली—
'स्वामी ! तुम्हारा मित्र तो मर गया। हमने तुम्हारे हृदय के फट जाने
के डर से तुमसे नहीं कहा। यह तुम्हारे मित्र का पुत्र है। कोसल-राजा आकर
नगर को घेरे हुए तेरे पुत्र से युद्ध कर रहा है। सेना पीछे हट रही है। या तो
तू अपने पुत्र को स्वय ही मार डाल अथवा राज्य जीतकर इसे दे।"
उसी समय हाथी ने बोधिसत्त्व को सूण्ड में ले उठा कर सिर पर रक्खा।
रोया पीटा। फिर बोधिसत्व को उतार कर देवी के हाथ में लिटाया और
कोसल-नरेश को पकडने के लिए हस्ति-शाला से निकल पडा।
मन्त्री-गण कवच उतार, सज सजाकर दरवाजे खोल उसके पीछे पीछे
हो लिए। हाथी ने नगर से निकल क्रौंच-नाद किया। लोगो को डरा कर
भगा दिया। सेना की पाँत को तोड कोसल-राजा को पाँवो मे पकड लाकर
बोधिसत्व के पैरो मे डाल दिया। वह मारने के लिए उठा, तो उसे रोका।
अब से सावधान रह। यह मत समझ कि कुमार बालक है। इस प्रकार
उपदेश दे उसे उत्साहित किया।
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उस समय से सारे जम्बू द्वीप का राज्य एक प्रकार से बोधिसत्त्व के ही
हाथ में आ गया। कोई भी शत्रु विरोध न कर सका।
सात वर्ष की अवस्था होने पर बोधिसत्त्व का अभिषेक हुआ। वह अलीन
चित्त राजा के नाम से धर्मानुकूल राज्य करते रह कर मरने पर स्वर्ग सिधारा।
शास्ता ने यह पूर्व जन्म की कथा ला सम्यक् सम्बुद्ध होने की अवस्था में यह दो
गाथाएँ कही--
अलीनचित्तं निस्साय पहट्ठा महतो चमू
कोसलं सेना-सन्तुट्ठं जीवगाहं अग्राहयी
एवं निस्सयसम्पन्नो भिक्खु आरद्धवीरियो
भावयं कुसलं धम्मं योगक्खेमस्स पत्तिया
पापुणे अनुपुब्बेन सब्ब संयोजनक्खयं ॥
[अलीन चित्त के कारण बड़ी सेना प्रसन्न हुई। अपने राज्य से असन्तुष्ट
कोशल नरेश को जिन्दा पकड़वा लिया। इसी प्रकार यदि भिक्षु प्रयत्न-शील
हो और उसका सहायक हो तो वह निर्वाण-प्राप्ति के लिए कुशल-धर्मों का
अभ्यास कर क्रम से संम्योजनों का क्षय कर सकता है।]
अलीनचित्तं निस्साय, अलीनचित्त राजकुमार के कारण पहट्ठा महती
चमू, हम लोगो को राज्य-परम्परा देखनी मिली, इसलिए बड़ी सेना प्रसन्न हुई।
कोसलं सेनासन्तुट्ठं, कोशल नरेश को, जो अपने राज्य से असन्तुष्ट हो पराया
राज्य लेने को आया। जीवगाहं अग़ाहयी बिना मारे ही उस सेना ने उस हाथी
से राजा को जीवित पकड़वाया। एवं निस्सय सम्पन्नो जैसे यह सेना उसी प्रकार
कोई कुल-पुत्र बुद्ध अथवा बुद्ध-श्रावक सदृश किसी हितैषी को या उसके आश्रय
से युक्त। भिक्खु, जो शुद्ध है, उसी का यह नाम है। आरद्धवीरियो,
प्रयत्न-शील; चार प्रकार के दोषों से रहित प्रयत्न से युक्त। भावयं कुसलं
धम्मं, कुशल, निर्दोष सैंतीस बोधि-पाक्षिक धर्मों की भावना करता हुआ।
योगक्खेमस्स पत्तिया चारो प्रकार के योग से क्षेम अथवा निर्वाण की प्राप्ति
के लिए उस धर्म का अभ्यास करते हुए। पापुणे अनुपुब्बेन सब्ब संयोजन
क्खयं इस प्रकार विपश्यना से इस कुशल-धर्म का अभ्यास करते हुए वह किसी
हितैषी का आश्रय-प्राप्त भिक्षु क्रम से विपश्यना ज्ञान और पहले मार्ग-ज्ञान