जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
शिक्षित किया है।' इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
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शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?
'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ ! मैने इसे केवल अब
ही एक ही उपदेश से शिक्षित नही किया है, पहले भी एक ही उपदेश से
शिक्षित किया है।' इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय म वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व ने
उदीच्य ब्राह्मण कुल में पैदा हो, बडे होने पर तक्षशिला मे तीनो वेद और सभी
शिल्प सीखे । फिर कुछ समय घर म रहकर माता पिता के मरने पर ऋषियो
की प्रव्रज्या के ढंग से प्रव्रजित हो अभिज्ञा और समापत्तियाँ प्राप्त कर हिमालय
में प्रवेश किया । चिरकाल तक वहाँ रहन के बाद नमक और खटाई खाने
के लिए जनपद म आकर वाराणसी पहुँच राजा के उद्यान म रहा । फिर एक
दिन अच्छी तरह से वस्त्र पहन, आच्छादित हो, तपस्वी के रूपरग मे भिक्षा
माँगने के लिए नगर में प्रविष्ट हो राजा के आँगन में पहुँचा ।
राजा ने झरोखे से देखा तो उसकी चाल-ढाल से मन प्रसन्न हुआ । उसने
देखा कि यह तपस्वी शान्त इन्द्रिय तथा धान्त मनवाला है । चलता है तो नीची
नजर करके युग मात्र१ देखता हुआ चलता है । मालूम होता है कि कदम कदम
पर एक एक हजार की थैली रखता हुआ सिंह की तरह चला आ रहा है।
'यदि कही पर शान्त धर्म नाम की कोई चीज है तो वह इसके अन्दर अवश्य होगी'
सोच एक आमात्य की ओर देखा ।
'देव ! क्या आज्ञा है ?'
'इस तपस्वी को ले आयो ।'
वह 'देव ! अच्छा' कह बोधिसत्व के पास गया । वहाँ पहुँचकर बोधि-
सत्त्व को प्रणाम कर उनके हाथ से भिक्षा-पात्र लिया । बोधिसत्त्व ने पूछा—
“महापुण्यवान् ! क्या बात है ?”
“भन्ते ! महाराज आपको याद कर रहे हैं।”
१युग, दो हाथ तक ।
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“हम राजकुल में आने जाने वाले नहीं हैं, हम हिमवन्त निवासी हैं।”
आमात्य ने जाकर राजा से यह बात कही। राजा बोला—हमारे यहाँ
आने जाने वाला कोई भिक्षु नहीं है। उन्हें जाकर ले आओ।
आमात्य ने जा बोधिसत्त्व को प्रणाम कर, प्रार्थना कर, साथ लिवा राज-
भवन में पहुँचाया।
राजा ने बोधिसत्त्व को प्रणाम कर, श्वेत छत्र लगे हुए सोने के सिंहासन
पर बिठा, अपने लिए तैयार किए गए नाना प्रकार के भोजन खिलाकर
पूछा—'भन्ते ! कहाँ रहते हैं?'
'महाराज ! हम हिमवन्त-निवासी हैं।'
'अब कहाँ जा रहे हैं।'
'महाराज ! वर्षा-ऋतु के अनुकूल निवास स्थान की खोज है।'
'तो भन्ते ! हमारे ही उद्यान में रहें।'
उनसे स्वीकृति ले अपना भी भोजन समाप्त कर राजा बोधिसत्त्व के साथ
उद्यान गया। वहाँ पर्णशाला बनवा, उसमें रात के रहने योग्य तथा दिन में रहने
योग्य स्थान तैयार करवा, प्रव्रजितों की आवश्यकताएँ दे, उनकी सेवा आदि के
लिए उद्यानपाल को भार सौंप स्वयं नगर को लौटा। उस समय से बोधिसत्त्व
उद्यान में रहने लगे। राजा भी दिन में दो तीन बार उनकी सेवा में जाता।
उस राजा का दुष्ट कुमार नाम का पुत्र था। वह क्रोधी था, कठोर था।
न उसे राजा ही विनीत बना सका, न बाकी रिश्तेदार। आमात्यों और ब्राह्मण
गृहपतियों ने क्रुद्ध होकर इतना कहा कि 'हे स्वामी ! ऐसा न करें। ऐसा न कर
सकेंगे।' इतने से भी वह उसे कुछ न समझा सके।
राजा ने सोचा मेरे शीलवान् तपस्वी के अतिरिक्त कोई दूसरा इस कुमार
को विनीत नहीं बना सकता।
वह कुमार को बोधिसत्त्व के पास ले गया और उन्हें सौंपते हुए कहने लगा
—भन्ते ! यह कुमार क्रोधी है, कठोर स्वभाव का है। हम इसे विनीत नहीं
कर सकते। आप इसे किसी ढंग से शिक्षा दें। इतना कह चला गया।
बोधिसत्त्व ने कुमार के साथ उद्यान में घूमते हुए नीम का एक पौधा देखा
जिसके एक ओर एक पत्ता, दूसरी ओर दूसरा पत्ता—इस प्रकार कुल दो पत्ते
थे। बोधिसत्त्व ने कुमार से कहा—कुमार ! इस पौधे के पत्ते खाकर इसका
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रस चखो। उसने उसका एक पत्ता मुंह में रखने ही उसका रस चख "थू"
करके जमीन पर थूका। "कुमार यह क्या ?" "भन्ते ! यह पौधा अभी
हलाहल विष के समान है, बड़े होने पर तो यह बहुत मनुष्यों की जान लेगा।"
इतना कहते हुए उसने नीम के पौधे को उखाड़कर हाथों से मल डाला और यह
गाथा कही—
एकपण्णो अय रुक्खो न भुम्या चतुरङ्गलो,
फलेन विस कप्पेन महाय किं भविस्सति ॥
[ इस पौधे का केवल एक पत्ता है और यह भूमि से चार अंगुल ऊँचा नहीं।
विष जैसे पत्तेवाला यह बड़ा होकर क्या होगा । ]
एक पण्णो, दोनों ओर एक एक पत्ता है। न भुम्या चतुरङ्गुलो, भूमि से
चार अंगुल भी ऊँचा नहीं बढ़ा है। फलेन, अर्थात् पत्ते से। विसकप्पेन, हलाहल
विष जैसे से। इतना छोटा होता हुआ भी ऐसे कड़वे फल वाला है। महायं
किं भविस्सति, जब यह वृद्धि पाकर बड़ा होगा तब कैसा होगा ? निश्चय से
मनुष्य की जान लेने वाला होगा। इसी से उखाड़ कर हाथ से मलकर फेंक
दिया—यह कहा।
तब बोधिसत्त्व ने उसे कहा—'कुमार ! तूने इस पौधे को यह सोचकर कि
यह अभी से इतना तीता है, बड़े होने पर इससे किसी की क्या उन्नति होगी,
तोड़ कर, मरोड़ कर फेंक दिया। जैसे तूने इसके प्रति बरताव किया, ठीक इसी
तरह तेरे राष्ट्र के बासी भी यह सोचेंगे कि यह कुमार क्रोधी है, कठोर स्वभाव
का है, बड़ा होने पर राज्य प्राप्त करके क्या करेगा ? इससे हमारी उन्नति कहाँ
होगी ? वह तुझे राज्य न दे, नीम के पौधे की तरह उखाड़कर तुझे राष्ट्र से
निकाल देंगे। इसलिए नीम के पौधे के स्वभाव को छोड़ अब से शान्ति, मैत्री
तथा दया से युक्त हो।
उस समय से उसने अभिमान छोड़ दिया। नम्र हो गया। शान्ति, मैत्री
और दया से युक्त हो बोधिसत्त्व के उपदेशानुसार आचरण कर पिता के मरने पर
राज्य प्राप्त किया। फिर दान आदि पुण्य कर्म करता हुआ यथाकर्म (परलोक)
सिधारा।