जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मूसिल
वोतिच्छ ] ४४७
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मूसिल
देवदत्त था। शक्र अनुरूद्ध था। राजा आनन्द था। गुत्तिल गन्धवं तो मैं ही था।
२४४. वीतिच्छ जातक
“यं पस्सति न तं इच्छति...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय एक प्लासिक परिव्राजक के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उसे सारे जम्बूद्वीप मे कोई शास्त्रार्थ करने वाला न मिला। उसने
श्रावस्ती पहुँचकर पूछा—मेरे साथ कौन शास्त्रार्थ कर सकता है ? उत्तर
मिला—सम्यक् सम्बुद्ध। उसने बहुत से आदमियो के साथ जेतवन पहुँच
कर चारो प्रकार की परिषद को धर्मोपदेश देते हुए तथागत से प्रश्न पूछा।
शास्ता ने उसके प्रश्न का उत्तर दे उससे प्रश्न पूछा—एक (चीज) क्या है ?
वह उत्तर न दे सकने के कारण उठकर भाग गया। बैठी हुई परिषद बोली—
भन्ते ! एक ही शब्द से परिव्राजक को हरा दिया। शास्ता ने कहा—“उपा-
सको ! न केवल अभी मैने उसको एक ही पद से हराया है, पहले भी हराया है।”
यह कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
काशी राष्ट्र मे ब्राह्मण कुल मे पैदा हुआ। बड़े होने पर कामभोगो को छोड़
ऋषियो के प्रब्रज्या क्रम से प्रब्रजित हो दीर्घकाल तक हिमालय मे रहा। वह पर्वत
से उतर एक निगम-ग्राम के पास गङ्गा के मोड पर पर्णशाला में रहने लगा।
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एक परिव्राजक को सारे जम्बूद्वीप मे शास्त्रार्थ करने वाला न मिला।
उसने उस निगम में पहुँच पूछा—मेरे साथ शास्त्रार्थ कर सकने वाला कोई है ?
पता लगा—है। वह बोधिसत्व की प्रशसा सुन अनेक आदमियो के साथ
उसके निवासस्थान पर पहुँच, कुशल क्षेम पूछ कर बैठा। बोधिसत्व ने
पूछा—वनगन्ध से सुगन्धित गङ्गाजल पीएगा ? परिव्राजक ने शास्त्रार्थ
आरम्भ करते हुए कहा—कौनसी गङ्गा ? बालू गङ्गा है ? जल गङ्गा है ?
इधर का किनारा गङ्गा है ? अथवा उधर का किनारा गङ्गा है ? बोधिसत्व
ने उसे उत्तर दिया—परिव्राजक ! उदक, बालू, इधर के किनारे और उधर
के किनारे के अतिरिक्त और गङ्गा कहाँ है ? परिव्राजक को कुछ उत्तर न
सूझा। वह उठकर भाग गया। उसके भाग जाने पर बोधिसत्व ने बैठे हुए
लोगो को उपदेश देते हुए यह गाथाएँ कही—
यं पस्सति न त इच्छति
यञ्च न पस्सति तं किर इच्छति,
मञ्ञामि चिरं चरिस्सति
न हि तं लच्छति यं सो इच्छति ॥१॥
यं लभति न तेन तुस्सति
यं पत्थेति लद्धं हीळेति,
इच्छा हि अनन्तगोचरा
वीतिच्छानं नमो करोमसे ॥२॥
[ जिसे देखता है उसको इच्छा नही करता, जिसे नही देखता है उसकी
इच्छा करता है। मै समझता हूँ कि यह चिरकाल तक भटकेगा। जिसकी इच्छा
करता है वह इसे नही मिलेगा ॥१॥ जो मिलता है उससे सन्तुष्ट नही होता।
जिसकी इच्छा करता है वह मिलने पर उसका अनादर करता है। इच्छा की
गति अनन्त है। जो वीतिच्छा हैं, उन्हे हम नमस्कार करते हैं ॥२॥ ]
यं पस्सति जिस उदक आदि को देखता है, उसे गङ्गा नही मानता है।
यञ्च न पस्सति जिस उदक आदि से रहित गङ्गा को नही देखता उसकी
इच्छा करता है। मञ्ञामि चिरं चरिस्सति मै ऐसा मानता हूँ कि यह परि-
व्राजक इस प्रकार की गङ्गा को खोजत हुए चिरकाल तक भटकेगा, अथवा
मूलपरियाय ] ४४६
जैसे उदक आदि से रहित गङ्गा को उसी तरह रूप आदि से रहित आत्मा को भी
खोजते हुए ससार मे चिरकाल तक भटकेगा । न हि तं लच्छति चिरकाल तक
विचरते हुए भी वह जो इस प्रकार की गङ्गा या आत्मा की इच्छा करता है
उसे न प्राप्त कर सकेगा।
यं सम्भति जो उदक वा रूप आदि मिलता है उससे सन्तुष्ट नही होता ।
यं पत्येति लद्धं हीळेति इस प्रकार प्राप्त से असन्तुष्ट हो जिस जिस सम्पत्ति
को प्राप्त करता है, उस उस को प्राप्त करके 'इससे क्या' कहकर उसका अनादर
करता है, उसकी अवमानना करता है। इच्छा हि अनन्तगोचरा जो जो
प्राप्त हो उसका अनादर कर दूसरी दूसरी चीज की इच्छा करने के कारण
यह इच्छा, यह तृष्णा अनन्त गति वाली है। वीतिच्छान नमो करोमसे इसलिए
जो इच्छा रहित बुद्ध आदि हैं उनको हम नमस्कार करते हैं ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का
परिव्राजक ही इस समय का परिव्राजक है। तपस्वी तो मैं ही था।
२४५. मूलपरियाय जातक
"कालो घसति भूतानि .." यह शास्ता ने उक्कठ्ठा के पास सुभगवन में
विहार करते हुए मूलपरियाय सुत्त¹ के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय तीन वेदों में पारङ्गत पाँच सौ ब्राह्मणों ने (बुद्ध-) शासन में
प्रव्रजित हो तीनो पिटक सीख कर अभिमान में चूर हो सोचा-सम्यक् सम्बुद्ध
¹मज्झिम निकाय का प्रथम सुत्त।
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भी तीन पिटक ही जानते हैं। हम भी जानते हैं। तब हमारा उनका क्या
अन्तर है? उन्होने बुद्ध की सेवा मे जाना छोड़ दिया। शास्ता की बराबरी
के होकर घूमने लगे।
एक दिन शास्ता ने उनके आकर पास बैठे रहने के समय आठ भूमियों
से सजाकर मूलपरियाय सुत्त का उपदेश दिया। उनकी कुछ समझ में नहीं
आया। तब उनको विचार हुआ—हम अभिमान करते हैं कि हमारे समान
पण्डित नही। लेकिन अब कुछ नही समझे। बुद्ध के सदृश पण्डित नही हैं।
अहो बुद्ध गुण ! उस समय से वह नम्र बन गए, जैसे जैसे सर्प के दांत उखाड
दिए गए हो, विष जाता रहा हो। शास्ता ने उक्कठ्ठा मे यथामिरुचि रहकर
वैशाली जा वहाँ गोतमक चेतिय मे गोतमकसुत्त का उपदेश दिया। हजार
लोकधातु कांप गई। उसे सुनकर वह भिक्षु अर्हत्व को प्राप्त हुए। मूल
परियाय सुत्त के उपदेश के अन्त म, जिस समय शास्ता उक्कठ्ठा में ही बिहार
करते थे, भिक्षुओ ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! अहो बुद्धो
की शक्ति ! वे ब्राह्मण प्रव्रजित वैसे अभिमानी थे। उन्हे भगवान् ने मूल
परियाय सुत्त से मान-रहित कर दिया। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ,
बैठे क्या बातचीत कर रहे हो? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—
भिक्षुओ, न केवल अभी इन अभिमानी सिर वालो को मान रहित किया है,
पहले भी किया है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत, कथा
पूर्व समय म वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ब्राह्मण कुल मे पैदा हुआ। बडे होने पर तीनो वेदो में पारङ्गत हो प्रसिद्ध आचार्य्य
बन पाँच सौ माणवको को मन्त्र बँचवाता था। वे पाँच सौ (माणवक) शिल्प
सीखकर, उसका अभ्यास कर सोचने लगे—'जितना हम जानते है, आचार्य्य
भी उतना ही। उसमे कुछ विशेष नही।' यह सोच वह अभिमान से चूर
हो आचार्य्य के पास न जाते, उसकी सेवा शुश्रूषा न करते। एक दिन जब
आचार्य्य बेर के वृक्ष के नीचे बैठा था, उन्होने उसे ठगने की इच्छा से बेर
के वृक्ष को नाखून से खुरच कर कहा—यह वृक्ष निस्सार है। बोधिसत्त्व ने
यह जान कि यह मुझे ठग रहे हैं कहा—शिष्यो ! एक प्रश्न पूछता हूँ।
मूलपरियाय ] ४५१
उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक कहा—पूछें, उत्तर देंगे। प्राचार्य ने प्रश्न पूछते हुए
पहली गाथा कही—
कालो घसति भूतानि सब्बानेव सहत्तना,
यो च कालघसो भूतो स भूत पचनिं पचि ॥
[ काल सभी प्राणियो को खाता है, अपने को भी (खाता है) । जो काल
को खाने वाला प्राणी है वह सब प्राणियो को जलाने वाली को जलाता हैं।]
कालो पूर्वाह्ण समय तथा अपराह्ण समय आदि । भूतानि प्राणी । काल
प्राणियो का चर्म मास आदि नोच नोच कर उन्हे नही खाता किन्तु उनकी
आयु, वर्ण बल को नष्ट कर यौवन को मर्दन कर आरोग्य का विनाश करता
हुआ खाता है। इस प्रकार खाता हुआ किसी को नही छोड़ता। सब्बानेव
खाता है। केवल प्राणियो को ही नही किन्तु सहत्तना अपने को भी खाता
है। पूर्वाह्ण अपराह्ण तक नही रहता, इसी प्रकार अपराह्ण आदि भी ।
यो च कालघसो भूतो यह क्षीणास्रव के लिए कहा गया है। वह आर्य्यमार्ग
से भविष्य के प्रतिसन्धि-ग्रहण करने के समय को नष्ट करने वाला होने से
कालघसो भूतो कहलाता है। स भूत पचनिं पचि उसने इस तृष्णा को, जो
प्राणियो को अपाय मे जलाती है, ज्ञानाग्नि से जला दिया, भस्म कर दिया ।
इसीसे भूतपचनिं पचि कहा जाता है। पजनिं भी पाठ है। जननि पैदा करने
वाली अर्थ है।
इस प्रश्न को सुनकर माणवको मे एक भी न जान सका । तब बोधिसत्त्व
ने कहा—तुम यह मत समझो कि यह प्रश्न तीनो वेदो मे हैं। तुम यह समझ
कर कि जो मैं जानता हूँ वह सब तुम जानते हो मुझे बेर का वृक्ष बनाते हो।
तुम यह नही जानते कि ऐसा बहुत है जिसे तुम नही जानते और मैं जानता
हूँ। जाओ, सात दिन का समय देता हूँ। इतने समय मे इस प्रश्न पर
विचार करो ।
'वे बोधिसत्त्व को प्रणाम कर अपने अपने निवासस्थान पर गए। वहाँ
सप्ताह भर सोचने पर भी न उन्हे प्रश्न का आरम्भ मिला न अन्त। वे सातव
दिन प्राचार्य के पास गए। प्रणाम करके बैठे। प्राचार्य ने पूछा—भद्रमुखो !
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प्रश्न समझ में आया ? वे बोले—नही जानते । बोधिसत्त्व ने फिर उनकी
निन्दा करते हुए दूसरी गाथा कही—
बहूनि नरसीसानि लोमसानि बृहन्ति च,
गीवासु पटिमुक्कानि कोचिदेवेत्थ कण्णवा ॥
अर्थ—बहुत आदमियों के सिर दिखाई देते हैं। वे बालो वाले हैं। सभी
बड़े बड़े हैं। गर्दनों पर रखे हैं। ताड के फल की तरह हाथ में पकड़े हुए
नहीं हैं। इन बातो में किन्ही में आपस में भेद नहीं है। लेकिन यहाँ कोई ही
कानवाला है। (यह अपने बारे में कहा) कण्णवा प्रज्ञावान् । कान का छेद
तो किसको नहीं है ?
इस प्रकार उन माणवकों की निन्दा कर कि तुम लोगो को कानो का
छेद मात्र ही हैं, प्रज्ञा नहीं है प्रश्न समझाया। उन्होने सुनकर 'ओह ! आचार्य्य
महान् होते हैं' क्षमा मांग नम्र हो बोधिसत्त्व की सेवा की।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पांच
सौ माणवक यह भिक्षु थे। आचार्य्य मैं ही था ।
२४६. तेलोवाद जातक
“हन्त्वा भत्वा वधित्वा च ” यह शास्ता ने वैशाली के आश्रय कूटा-
गार शाला में विहार करते समय सिंह सेनापति के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उसने भगवान् (बुद्ध) की शरण जा, निमन्त्रण दे, अगले दिन मास सहित
भोजन कराया। निगण्ठों ने उसे सुन कुपित हो असन्तुष्ट हो तथागत को
१ निगण्ठ=निर्ग्रन्थ=जैन सम्प्रदाय वाले साधु ।