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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।

नङ्गलीस ] ५१
राजा बोला—'तात ! यहाँ आकर तूने अच्छा किया।' फिर प्रसन्न
हो नगर सजवा हाथी को मगल-हाथी घोषित किया। सारे नगर के तीन हिस्से
कर, एक हिस्सा बोधिसत्त्व को दिया, एक हथवान् को और एक स्वयं लिया।
बोधिसत्त्व के आने के समय से ही सारे जम्बूद्वीप का राज्य राजा को हस्त-
गत हो गया। वह जम्बूद्वीप का महाराज हो दान आदि पुण्य कर्म कर धर्मानुसार
परलोक सिधारा।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय मगध नरेश देवदत्त था। वाराणसी का राजा सारिपुत्र था।
हथवान आनन्द था। और हाथी तो मैं ही था।
✓ १२३. नङ्गलीस जातक
“असब्बत्यगामिं वाच” यह (धर्म देशना) शास्ता ने जेतवन में विहार
करते समय लालुदायि स्थविर के बारे में कही—
क. वर्तमान कथा
वह धर्मोपदेश देते समय यहाँ यह कहना चाहिए, यहाँ यह न कहना चाहिए,
योग्य अयोग्य नही जानता था। मङ्गल (बात) कहने की जगह अमङ्गल
बात कहकर (दान-) अनुमोदन करता था, जैसे तिरोकुड्डेसु तिट्ठन्ति सन्धि-
सिङ्घाटकेसु च¹। अमङ्गल अनुमोदन करने की जगह बहू देवा मनुस्सा च
¹ तिरोकुड्ड सुत्त, खुद्दकपाठ (खुद्दक निकाय) की पहली पंक्ति जिसका
मतलब है कि प्रेत लोग आकर दीवारों के बाहर, खिडकियो में और चौरस्तो
में खडे होते हैं।

नङ्गलीश ] ५३
क्यों बैठा है ?" "आचार्य्य ! चारपाई के पाये का सहारा न मिलने से,
जांघ में धरके बैठा हूँ ।"
बोधिसत्व का दिल भर आया । वे सोचने लगे यह मेरी बहुत सेवा
करता है । लेकिन इतने विद्यार्थियों में यही मन्दमति है, शिल्प नहीं सीख
सकता । मैं इसे कैसे पण्डित बनाऊँ ? तब उन्हें सूझा—एक उपाय है ।
मैं इस विद्यार्थी को लकड़ियां और पत्ते लेने के लिए भेजकर, आने पर पूछूँगा—
आज तूने क्या देखा ? क्या किया ? तब यह मुझे बताएगा कि आज यह देखा,
यह किया । तब मैं इसे पूछूँगा कि जो तूने आज देखा किया, वह कैसा है ?
वह 'ऐसा है' मुझे उपमा देकर, बातों से समझाएगा । इस प्रकार इससे नई नई
उपमाएं और बातें कहलवाकर मैं इसे इस उपाय से पण्डित बना दूंगा ।
तब उन्होंने उसे बुलवाकर कहा—तात ! माणवक ! अब से तू जहाँ
लकड़ी लेने या पत्ते लेने जाए वहाँ जो देखे, जो सुने, जो खाए, पीए, वह
आकर मुझे कहा कर । उसने 'अच्छा' कह स्वीकार किया ।
एक दिन वह विद्यार्थियों के साथ लकड़ी लाने जंगल गया । वहाँ उसने
एक साँप देखा । आकर आचार्य्य से कहा—आचार्य्य, मैंने साँप देखा ।
"तात ! साँप कैसा होता है ?"
"हल की फाल की तरह ।"
'तात ! बहुत अच्छा । तूने सुन्दर उपमा दी । साँप हल की फाल
की ही तरह होते हैं।"
बोधिसत्व ने सोचा—विद्यार्थी को अच्छी उपमा सूझी है । मैं इसे पण्डित
बना सकूँगा ।
विद्यार्थी ने फिर एक दिन जंगल में हाथी देख आकर कहा—आचार्य्य,
मैंने हाथी देखा ।
"तात ! हाथी कैसा होता है ?"
"हल की फाल की तरह ।"
बोधिसत्त्व सोचने लगे—हाथी की सुण्ड तो हल की फाल की तरह होती
है, लेकिन उसके दाँत आदि तो ऐसे ऐसे होते हैं । मालूम होता है यह अपनी
मूर्खता के कारण पृथक पृथक करके वर्णन नहीं कर सकता । वे चुप रहे ।
एक दिन निमन्त्रण में खीर पाकर कहा—

५४ [ १.१३ १२३
"आचार्य्य ! आज हमने ऊस खाया।"
"ऊस कैसा होता है ?"
"हल की फाल की तरह।"
थोड़ी सीधी बात कहता है, सोच आचार्य्य चुप रहे। फिर एक दिन
निमन्त्रण में कुछ विद्यार्थियो ने दही के साथ गुड़ खाया, कुछ ने दूध के
साथ। उसने आकर कहा—'आज' हमने दही दूध के साथ खाया।
"दूध दही कैसा होता है ?"
"हल की फाल की तरह।"
आचार्य्य ने सोचा—इस विद्यार्थी ने साँप की हल की फाल से उपमा दी,
सो तो ठीक रहा। हाथी की हल की फाल से उपमा दी, वह भी सुण्ड का
ख्याल करके कहा, इससे कुछ ठीक रहा। ऊस को हल की फाल के सदृश कहा,
उसमे भी खैर कुछ ठीक है। लेकिन दूध दही तो सफेद होते हे, जैसा बरतन
होता है वैसा ही उनका आकार हो जाता है। यहाँ तो उपमा सर्वथा गलत है।
इस मूर्ख को न सिखा सकूँगा। यह कह, यह गाथा कही—
असव्वत्थगामि वाच
बालो सव्वत्थ भासति,
नायं दधिं वेदि न नङ्गलीसं
दधिम्पय मञ्जति नङ्गलीसं ॥
[ मूर्ख सब जगह ठीक न बैठनेवाली बात सब जगह कहता है। न यह
दही को जानता है, न हल के फाल को। यह दही को भी हल की फाल
समझता है।]
———
सक्षिप्तार्थ यूं है—जो वाणी उपमारूप स सर्वत्र लागू नहीं होती, वह
असव्यत्थ गामिं वाच बालो जड आदमी सव्वत्थ भासति । दधि कैसा होता है
पूछने पर कहता है जैसे हल की फाल। इस प्रकार कहता हुआ नायं दधिं वेदि
न नङ्गलीसं । क्या ? क्योकि दधिम्पय मञ्जति नङ्गलीसं, यह दही को भी
हल की फाल मानता है। अथवा दधि कहते हं दही को। पय कहते हैं दूध को।
दधि ओर पय दधिप्पय, यह दही और दूध को भी हल की फाल मानता है,