जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
ख. अतीत कथा
राध ] ११७
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
तोते की योनि में पैदा हुए। काशी देश के एक ब्राह्मण ने बोधिसत्त्व और उसके
छोटे भाई को पुत्र की तरह पाला। उन दोनो में से बोधिसत्त्व का नाम
हुआ पोट्ठपाद, दूसरे का राध।
हाँ, उस ब्राह्मण की ब्राह्मणी अनाचारिणी थी, दुःशीला। वह व्यापार
के लिए जाने लगा तो दोनो भाइयो से बोला—तात ! यदि माता ब्राह्मणी
अनाचार करे, तो उसे रोकना। बोधिसत्त्व ने उत्तर दिया—तात !
अच्छा ! यदि रोक सकेगे रोकेगे नही रोक सकेगे तो चुप रहेंगे।
इस प्रकार ब्राह्मण ब्राह्मणी को तोतों को सौंपकर व्यापार करने गया।
उसके जाने के दिन से ब्राह्मणी ने अनाचार करना आरम्भ किया।
(घर में) प्रवेश करनेवालो की और बाहर निकलने वालो की गिनती नहीं रही।
उसकी करतूत देख राध ने बोधिसत्त्व से कहा—"भाई ! हमारा पिता हमें
कह गया था कि यदि माता अनाचार करे तो उसे रोकना। अब वह अनाचार
कर रही है। हम उसे रोकें।" बोधिसत्त्व ने कहा—तात ! तू अपनी बे-
समझी के कारण, मूर्खता के कारण, ऐसा कह रहा है। स्त्रियो को उठाए लेकर
फिरा जाए, तब भी उनकी देखभाल नही हो सकती। जो काम किया नहीं जा
सकता, उसे न करना चाहिए। इतना कह यह गाथा कही—
न त्व राध ! विजानासि अड्ढरत्ते अनागते,
अव्यायतं विलपसि विरत्ता कोसियायने ॥
[राध ! तू नहीं जानता। अभी आधी रात भी नहीं हुई। न जानने
के कारण ही तू बकवास करता है। उसका (अपने पति की ओर से) मुँह
मुड़ा है।]
न त्व राध ! विजानासि अड्ढरत्ते अनागते, तात ! राध ! तू नहीं
जानता, आधी रात न होने पर ही पहले पहर में ही इतने आदमी आए। अब
कौन जानता है कि और कितने आदमी आएँगे ? अव्यायतं विलपसि, तू व्यर्थ
बकवास करता है। विरत्ता कोसियायने, माता कोसियायनि ब्राह्मणी का दिल
विरक्त है। हमारे पिता के प्रति प्रेम नहीं है। यदि उसका उसमें प्रेम या स्नेह
होता तो इस प्रकार अनाचार न करती। इन शब्दो से इस बात को प्रकट
किया।
इस प्रकार कह राध को ब्राह्मणी के साथ बोलने नहीं दिया।
यह भी जब तक ब्राह्मण नहीं आया तब तक यथारुचि अनाचार करती रही।
ब्राह्मण ने लौटकर पोट्ठपाद से पूछा—तात ! तेरी माँ कैसी है ? बोधिसत्त्व
ने ब्राह्मण को जो जो हुआ सब कह दिया। फिर कहा—"तात ! इस प्रकार
की दुश्चरिता से तुम्हें क्या प्रयोजन ? माता का दोष प्रकट करने के बाद से
अब हम यहाँ नहीं रह सकते।" वह ब्राह्मण के पाँव में गिरकर राध के सहित
उड़कर जगल चला गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला चार आर्य-सत्य प्रकाशित किए। सत्यों
का प्रकाशन समाप्त होने पर उद्विग्न भिक्षु श्रोतापत्ति फल म प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय ब्राह्मण और ब्राह्मणी यही दो जने थे। राध आनन्द था। पोट्ठपाद
मैं ही था।
१४६. काक जातक
"अपि नु हनूका सन्ता..." यह शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय
बहुत से वृद्ध भिक्षुओं के बारे म कही।
क. वर्तमान कथा
वे गृहस्थ होने के समय श्रावस्ती के धनी परिवार के थे। एक दूसरे के
मित्र थे। परस्पर मिलकर पुण्य करते थे। बुद्ध का उपदेश सुनकर उन्होंने
काक ] ११६
सोचा कि हम बूढे हुए। हमें गृहस्थी से क्या लाभ ? शास्ता के पास रमणीय
बुद्ध-शासन में प्रव्रजित हो हम दुख का अन्त करें ।
वे अपनी सारी जायदाद लडके लडकियो को दे, रोते हुए रिश्तेदारो को
छोड शास्ता से प्रव्रज्या की याचना कर प्रव्रजित हुए। लेकिन प्रव्रजित होने
पर प्रव्रज्या के अनुकूल श्रमण धर्म की पूर्ति नही की। बूढे होने से धर्म भी नही
सीख सके। गृहस्थ रहने के समय की तरह प्रव्रजित होने पर भी विहार के
एक कोने मे पर्ण-शाला बनवाकर उसमें इकट्ठे ही रहते थे। भिक्षा माँगने के
लिए भी प्राय और कही न जाकर अपने लडके लडकियो के घर जाकर
वही खाते थे।
उनमे से एक की पहली भार्या सभी वृद्ध भिक्षुओ का उपकार करनेवाली
थी। इसलिए बाकी जनो को जो भिक्षा मिलती उसे लेकर भी उसी के
घर जा बैठकर खाते। वह भी उनको जो सूप व्यञ्जन तैयार होता देती ।
किसी बीमारी से वह मर गई।
वह वृद्ध स्थविर विहार जाकर एक दूसरे के गले मिल विहार के आसपास
यह कहते हुए रोने लगे—"जिसके हाथो मे मधुर-रस था, वह उपासिका
मर गई।" उनकी आवाज सुनकर इधर-उधर से भिक्षुओ ने आकर
पूछा—"आयुष्मानो ! क्यो रो रहे हो ?" वे बोले—"हमारे मित्र की पहली
भार्या मर गई है। उसके हाथ में मधुर रस था। वह हमारा बहुत उप-
कार करने वाली थी। अब वैसी स्त्री कहाँ मिलेगी ? इसी वजह से रो
रहे है।"
उनको विलाप करते देख भिक्षुओ ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—
"आयुष्मानो ! इस कारण से वृद्ध स्थविर एक दूसरे के गले में हाथ डाल
रोते हुए घूम रहे हैं।"
शास्ता ने आकर पूछा—'भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?"
"अमुक बातचीत" कहने पर शास्ता ने कहा—' भिक्षुओ, यह केवल अभी उसके
मरने पर रोते हुए नही घूम रहे हैं। पहले भी इन्होने इसके कौए की योनि में
पैदा हो समुद्र में मरने पर सोचा कि समुद्र का पानी उलीचकर इसे निकाल
लाएंगे । ये परिश्रम करते हुए (कठिनाई से) पण्डितो द्वारा जीवित बचाए
गए।"—इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।