जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
ख. अतीत कथा
कुसनाळि ] ४५
सभी अपने सिर पर आ पडे भार का वहन करते हैं। अब तो तू अपने स्थिर-
मित्र के कारण धन का स्वामी हुआ। पुराने समय में पक्के-दोस्त के कारण
विमान के स्वामी हुए।"
इतना कह, पूछने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व राजा
के उद्यान में एक कुशा-घास के झुंड में के देवता हुए। उसी बाग में मगल-शिला
के सहारे सीधे तनेवाला और चारो तरफ शाखाओ तथा पत्तो से घिरा हुआ,
राजा द्वारा आदृत राजा का प्रिय-वृक्ष १ था। उसे मुक्खक भी कहते थे।
उसमे एक वडा प्रतापी देवराज पैदा हुआ। बोधिसत्त्व से उसकी दोस्ती हो गई।
उस समय राजा एक खम्भे वाले प्रासाद में रहता था। खम्भा फटने लगा।
राजा को इसकी सूचना दी गई। राजा ने बढइयो को बुलवाकर कहा "तात !
मेरे एक खम्भे वाले मगल प्रासाद का खम्भा जा रहा है। एक सारवान् खम्भा
ला कर उस खम्भे को स्थिर करे।" उन्होने 'देव ! अच्छा' कह राजा के
वचन को स्वीकार कर उसके अनुरूप वृक्ष ढूँढना आरम्भ किया। वृक्ष न पा,
राजा के उद्यान में जा उस मुक्खक वृक्ष को देख राजा के पास गए। राजा
ने पूछा—
"तात ! क्यो उसके अनुरूप वृक्ष देखा ?"
'देव ! देखा, लेकिन उसे काट नही सकते ?
"क्यो ?"
"और कही वृक्ष न दिखाई देने पर हम उद्यान में गए। वहाँ मगल-वृक्ष
को छोड और कोई वृक्ष नही दिखाई दिया। उसे मगल-वृक्ष होने के कारण
नही काट सकते।"
"जाओ, उसे काट कर प्रासाद को मजबूत करो। हम दूसरा मगल-
वृक्ष कर लेगे।"
१ 'रुचरुक्खो' कुछ अस्पष्ट है।
४६ [ १.१३.१२१
वे 'अच्छा' कह 'बलि' ले उद्यान गए और वहाँ अगले दिन काटने के लिए
'बलि' चढ़ाई। वृक्ष-देवता को जब यह पता लगा कि कल मेरा निवास-
स्थान¹ नष्ट कर देंगे, तो वह सोचने लगी कि बच्चों को लेकर कहाँ जाऊँगी ?
जब कोई जाने की जगह न दिखाई दी, तो पुत्रों को गले से लगाकर रोने लगी।
उसके देखे-सुने परिचित वृक्ष-देवता और वन-देवताओ ने आकर पूछा—
“क्या हुआ ?” समाचार जान स्वयं भी कोई ऐसा उपाय न कर सकने के कारण
जिससे बढ़ई वृक्ष को न काटे, उन्होंने गले मिलकर रोना प्रारम्भ किया।
उसी समय बोधिसत्त्व वृक्ष-देवता से मिलने आए। वह समाचार सुन
बोधिसत्त्व ने कहा— “होने दो। चिन्ता न करो। मैं बढ़इयों को वृक्ष काटने
न दूंगा। कल बढ़इयों के आने के समय मेरा करतब देखना।” उस देवता को
आश्वासन दे अगले दिन बोधिसत्त्व बढ़इयों के आने के समय गिरगिट का रूप
बना बढ़इयों के आगे से गुजर मङ्गल-वृक्ष की जड़ में प्रवेश कर, उसमें खोखले
वृक्ष की तरह ऊपर चढ़, स्कन्ध के बीच में से सिर निकाल उसे कँपाते हुए
पड़ रहे।
प्रधान बढ़ई ने उस गिरगिट को देख वृक्ष को हाथ से ठोक कर कहा—
“यह खोखला है। निस्सार है। कल बिना विचार किए ही 'बलि' चढ़ाई।”
इस प्रकार वे उस ठोस महावृक्ष की निन्दा करते हुए चले गए।
बोधिसत्त्व की सहायता से वृक्ष-देवता विमान की स्वामिनी हुई। उसके
देखे-सुने परिचित बहुत से देवता उसे मुबारकबाद देने के लिए इकट्ठे हुए।
वृक्ष-देवता ने 'मुझे विमान मिल गया' सोच प्रसन्न हो उन देवताओ के सम्मुख
बोधिसत्त्व की प्रशंसा करनी शुरू की—“हे देवताओ ! हम ऊँचे कुल वाले
होकर भी बुद्धि की कमी के कारण इस उपाय को न जानते थे। कुशा घास के
देवता ने अपने बुद्धिबल से हमें विमान का स्वामी बनाया। मित्रता अपने जैसे
से भी, छोटे से भी, श्रेष्ठ से भी करनी ही चाहिए। सभी अपनी अपनी सामर्थ्य
के अनुसार मित्रो पर आई आपत्ति दूर कर उन्हें सुखी बनाते हैं।” इस
प्रकार मित्र-धर्म की प्रशंसा करते हुए यह गाथा कही—
¹ विमान ।
कुरानाळ्ळि ] ४७
करे सरिक्खो अथवापि सेट्ठो
निहीनको चापि करेय्य एको,
करेय्यु ते व्यसने उत्तमत्थं
यथा अहं कुसनाळी रुचायं ॥
[ अपने समान, अपने से श्रेष्ठ अथवा अपने से कम (दर्जे वाले) से साथ
भी मित्रता करे। जैसे कुशा-घास (वाले) ने मुझ रुख-वृक्ष (के देवता)
का (उपकार किया), उसी प्रकार ये भी विपत्ति आ पड़ने पर उपकार
करते हैं।]
——
करे सरिक्खो—जाति आदि में जो अपने बराबर हो, उससे से भी
मित्रता करे। अथवापि सेट्ठो, जाति आदि म जो श्रेष्ठ हो, अधिक हो उससे भी
(मित्रता) करे। निहीनको चापि करेय्य एको, जाति आदि से नीच से भी
मित्र धर्म करे। इस प्रकार इन सभी को मित्र बनाना चाहिए, यह स्पष्ट करता
है। क्यों ? करेय्यु ते व्यसने उत्तमत्थं, यह सभी मित्र पर दुःख आ पड़ने पर
अपने अपने कर्तव्य भार को वहन करते हुए उपकारी होते हैं, अर्थात् उस मित्र
को शारीरिक तथा मानसिक दुःख से मुक्त करते हैं। इसलिए अपने से छोटे
से भी मित्रता करनी चाहिए, दूसरों की तो बात ही क्या ? यहाँ यह उपमा
है। यथा अह कुसनाळी रुचायं, जैसे मै रुख में पैदा हुआ देवता और यह कुशा-
घास का देवता, हममें भी मित्रता थी। उसमें में ऊँचे कुल वाला होकर भी
अपने पर आई विपत्ति को मूर्खता के कारण उपाय न जानने के कारण दूर
नहीं कर सका, इस छोटे दर्जे वाले पण्डित-देवता की सहायता से दुःख से मुक्त
हुआ। इसलिए और भी जो दुःख से मुक्त होना चाहे उन्हें भी चाहिए कि
बराबरी अथवा श्रेष्ठता का ख्याल न कर कम दर्जे वाले से भी मित्रता करें।
रुखदेवता देवता-समूह को इस गाथा द्वारा धर्मोपदेश कर आयुपर्यन्त,
जीवित रह कुशानाळी देवता के साथ कर्मानुसार परलोक सिधारा।
शास्ता ने यह धर्मदेशना सा जातक का सारांश निकाला। उस समय
रुख-देवता आनन्द था। कुसाळी-देवता तो मैं था ही।