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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

क. वर्तमान कथा

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क. वर्तमान कथा

श्रावस्ती में एक कुल में प्लेग¹ पैदा हुई। माता पिता ने पुत्र से कहा—
तात ! इस घर में मत रह। दीवार तोड कर भाग जा। जहाँ कही जाकर
जान बचा। पीछे आना। इस जगह पर बहुत सा खजाना गडा है। उसे
निकाल, परिवार के साथ सुख से रहना।
पुत्र उनकी बात स्वीकार कर दीवार तोड भाग गया। फिर अपना रोग
शान्त होने पर उसने आकर खजाना निकाल घर बसाया।
एक दिन वह घी तेल आदि तथा वस्त्र-ओड़न आदि लिवाकर जेतवन
गया। वहाँ शास्ता को प्रणाम कर बैठा। शास्ता ने उसका कुशल क्षेम
जान कर पूछा—"सुना तुम्हारे घर में प्लेग रोग घुस गया था। तुम उससे
कैसे बचे ?"
उसने अपना हाल कहा। शास्ता बोले—"उपासक ! पूर्व समय में भी
ऐसे लोगो ने जो खतरा आने पर आसक्ति के कारण अपने घर को छोड़कर
अन्यत्र नही चले गए जान गँवाई। आसक्ति न कर दूसरी जगह जाने वालो
ने जान बचा ली।"
उसके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही—

ख. अतीत कथा

पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
एक गाँव में कुम्हार का काम करके स्त्री-बच्चों को पालते थे।
उस समय बाराणसी की महानदी के साथ मिला हुआ एक बडा तालाब
था। अधिक पानी होने पर वह नदी के साथ मिल जाता। कम होने पर
पृथक हो जाता। मछलियाँ और कछुवे पहले से जान जाते थे कि इस वर्ष
अच्छी वर्षा होगी, इस वर्ष कम होगी। एक वर्ष तालाब में पैदा हुई मछलियाँ
और कछुवे यह जानकर कि इस वर्ष अच्छी वर्षा न होगी, जिस समय अभी


¹ अहिवातकरोग।

कच्छप ] २३५

तालाब और नदी एक थे, उसी समय उस तालाब से निकल नदी में चले गए।
एक कछुवे ने कहा—यहाँ में पैदा हुआ हूँ। यहीं बड़ा हुआ हूँ। यहीं
मेरे मातापिता रहे हैं। में इसे नहीं छोड़ सकता। वह नदी में नहीं गया।
गरमी पड़ने पर उस तालाब का पानी सूख गया। यह कछुवा जिस जगह
बोधिसत्व मिट्टी खोदते थे, उसी जगह ज़मीन खोदकर उसमें घुसा था। बोधि-
सत्त्व ने मिट्टी लेने के लिए वहाँ जाकर, बड़ी कुदाल से ज़मीन खोदते हुए उसकी
पीठ तोड कर, मिट्टी के ढेर की ही तरह उसे भी कुदाल से उठाकर स्थल पर
गिराया।
उसने वेदना से पीडित हो कहा कि मैं घर के प्रति आसक्ति को त्याग, उसे
छोड़ न सका, इसीलिए विनाश को प्राप्त हुआ। और रोते हुए यह गाथाएँ
कहीं—
जनित्तम्मे भवित्तम्मे इति पङ्के अवस्सरिं
तं मं पङ्को अज्झभवि यथा दुब्बलकं तया
तं तं वदामि भग्गव ! सुणोहि वचनं मम ॥
गामे वा यदि वा रञ्ञे सुखं यत्राधिगच्छति
त जनित्तं भवित्तं च पुरिसस्स पजानतो
यम्हि जीवे तम्हि गच्छे न निकेतहतो सिया ॥
[ में यहाँ पैदा हुआ। में इसीमे वढा। यह सोच कर में पङ्क में ही रहा।
लेकिन मुझ दुर्बल को जैसे पङ्क ने परास्त किया, हे कुम्हार ! में वैसे वैसे तुझे
कहता हूँ सुन—
ग्राम या अरण्य में जहाँ आदमी को सुख प्राप्त हो, वही बुद्धिमान आदमी
की जन्म-भूमि हैं, वही पलने की जगह है। जहाँ रहकर जी सकता हो, वही
जाए। घर में रहकर मरने वाला न बने । ]
जनित्तम्मे भवित्तम्मे यह मेरे पैदा होने की जगह है, यह बढ़ने की जगह
है। इति पङ्के अवस्सरिं इस हेतु से मैंने इस कीचड में आश्रय लिया, पड़ा
रहा, रहने लगा। अज्झभवि, पराभूत हुआ, विनाश को प्राप्त हुआ। भग्गव
कुम्हार को बुलाता है। कुम्हारो का यही नाम गोत्र तथा प्रज्ञप्ति है—यह

२३६ [ २३.१७८
भाग्यवान् ।¹ सुखं, शारीरिक तथा मानसिक आनन्द। तं जनित्त भवित्तञ्च
वह पैदा होने का तथा पलने का स्थान है। जनित भावित दीर्घाकार भी
पाठ है, अर्थ यही है। पजानतो, जो अर्थ अनर्थ तथा कारण अकारण को जानता
हैं। न निकेतहतो सिया, घर में आसक्ति कर, किसी दूसरी जगह न जा, घर
में मरा। इस प्रकार मरण रूपी दुख को प्राप्त करने वाला न बने।
इस प्रकार वह बोधिसत्त्व से बोलते ही बोलते मर गया। बोधिसत्त्व
ने उसे ले ग्राम के सारे निवासियो को इकट्ठा कर उन्हे उपदेश देते हुए कहा—
"इस कछुए को देखते हैं ? जब दूसरी मछलियां तथा कछुए महानदी में चले
गए तो यह अपने निवास स्थान में आसक्ति न छोड़ सकने के कारण उनके
साथ नही गया। जहाँ से मिट्टी ली जाती है, वही पडा रहा। मैने मिट्टी खोदते
हुए, महाकुदाल से इसकी पीठ तोड कर इस मिट्टी के ढेले की तरह इसे जमीन
पर गिरा दिया। इसे अपना किया याद आया। दो गाथाएँ कह यह रोता
हुआ मर गया। इस प्रकार यह अपने निवास स्थान के प्रति आसक्ति कर
मर गया। तुम भी इस कछुए की तरह न होना। अब से तृष्णा के वश होकर
उपयोग करते हुए यह मत समझो कि यह रूप मेरा है, यह शब्द मेरा है, यह
सुगन्ध मेरी है, यह रस मेरा है, यह स्पर्शितव्य मेरा है, यह पुत्र मेरा है, यह
लडकी मेरी है, यह दास-दासियाँ तथा यह सोना मेरा है। यह प्राणी अकेला
ही तीनो भवों में चक्कर काटता है।"
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने बुद्ध-लीला से जनता को उपदेश दिया। वह
उपदेश सारे जम्बूद्वीप में फैल कर सात सो वर्ष² रहा। जनता बोधिसत्त्व
के उपदेश के अनुसार चल दान आदि पुण्य कर्म कर स्वर्ग को गई।
बोधिसत्त्व ने भी उसी तरह पुण्य कर्म करते हुए स्वर्ग का रास्ता लिया।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला (आर्य-)सत्यो को प्रकाशित कर जातक
¹ आजकल कुम्हारों को कहीं कहीं 'प्रजापति' कहते है।
² फोसबोल की प्रति में 'वस्स सहस्सानि' पाठ है।