जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
क. वर्तमान कथा
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क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती नगर निवासी एक गृहस्थ जनपदनिवासी एक गृहस्थ के साथ
लेन-देन करता था। वह अपनी भार्या को लेकर अपने करजदार के पास गया।
उसने 'दे नहीं सकता हूँ' कह, कुछ न दिया। वह क्रुद्ध हो बिना कुछ खाए ही
चल दिया।
रास्ते में उसे भूख से पीड़ित देख, रास्ता चलने वाले आदमियो ने भात
की पोटली दी—भार्या को भी देकर खाओ। उसने वह ले उसे न देने की
इच्छा से कहा—भद्रे, यह चोरो के ठहरने का स्थान है। तू आगे आगे जा।
फिर सब भात खा चुकने पर उसे खाली पोटली दिखा कहा—भद्रे, उन्होने
भात-रहित खाली पोटली ही दी। यह जान कि यह अकेला ही खा गया, उसे
दुःख हुआ।
वे दोनो जेतवन विहार की पिछली तरफ से जाते हुए पानी पीने के लिए
जेतवन मे प्रविष्ट हुए। शास्ता भी उनके आने की प्रतीक्षा करते हुए गन्धकुटी
की छाया मे वैसे ही बैठे जैसे रास्ता घेर कर कोई शिकारी बैठा हो। वे दोनो
शास्ता को देख, पास जा, प्रणाम कर बैठे।
शास्ता ने उनका कुशल समाचार पूछ स्त्री से प्रश्न किया—भद्रे ! क्या
यह तेरा स्वामी तेरा हितैषी है, क्या तेरे प्रति स्नेह रखता है ?
“भन्ते, मेरा तो इसके प्रति स्नेह है, किन्तु यह मेरे प्रति स्नेह-रहित है।
और दिनो की बात रहने दे आज ही इसे रास्ते म भात की पोटली मिली।
यह बिना मुझे दिए ही स्वयं खा गया।”
“उपासिका, तू नित्य इसकी हितैषिणी तथा इसके प्रति स्नेह रखती
रही है। यह स्नेह रहित ही रहा है। लेकिन जब इसे पण्डितों की जबानी
तेरे गुण मालूम होते हैं, तो यह तुझे सारा ऐश्वर्य दे देता है।”
उसके प्रार्थना करने पर (भगवान् ने) पूर्व जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल म वाराणसी म ब्रह्मदत्त के राज्य करन के समय बोधिसत्त्व आमात्य
कुल में पैदा हो बड़े होने पर उसके अर्थधर्मानुशासक हुए।
पुटभत्त ] ३८३
राजा ने अपने पुत्र पर षड्यन्त्र का सन्देह पर उसे निकाल दिया। वह
अपनी भार्य्या सहित नगर से निकल काशी मे एक गामडे म रहने लगा।
आगे चलकर जब उसने पिता के मरने का समाचार सुना तो कुताशा
राज्य को लने के लिए वापिस बनारस आया। रास्ते म उस भार्य्या को भी
देकर खान के लिए भात की पोटली मिली। उसने भार्य्या को न दे अकेले ही
खाया। भार्य्या कठोर-हृदय जान बडी दुखी हुई।
यह बाराणसी का राजा हो उसे पटरानी बना 'इतना ही इसके लिए
पर्याप्त है' समझ उसका और कोई सत्कार सम्मान न करता। कैसे दिन
कटते है ? तब न पूछता। बोधिसत्त्व ने सोचा—यह देवी राजा का बहुत
उपकार करने वाली है, उसके प्रति स्नेह रखती है, लेकिन राजा इसे कुछ
नही मानता। इसका सत्कार-सम्मान करवाऊँगा।
बोधिसत्त्व न पास जा आदर पूर्वक एक ओर खडे हो 'तात क्या है ?'
पूछने पर बातचीत चलाने के लिए कहा—देवी ! हम तुम्हारी सेवा करते हैं।
क्या बडे वडो को वस्त्र-खण्ड या भात नही देना चाहिए ?
"तात, में स्वय कुछ नही पाती। तुम्हे क्या दूँगी। जब मिलता था
दिया। अब राजा मुझे कुछ नही देता। दूसरी किसी चीज की बात जाने द।
राज्य ग्रहण करने के लिए आन के समय रास्ते म भात की पोटली पा मुझे भात
तक न दे अपने ही खाया।"
'अम्म ! क्या राजा के सामने ऐसा कह सकेगी ?'
"तात ! कह सकूँगी।"
"तो आज ही जब में राजा के सामने खडा होकर पूछूँ तो ऐसा कहना।
में आज ही तेरे गुण प्रकट करूँगा।"
ऐसा कहँ बोधिसत्त्व पहले से जाकर राजा के सामने खडा हुआ। वह
भी जाकर राजा के सामने खडी हुई।
बोधिसत्त्व ने उसे कहा—अम्म ! तुम अति कठोर-हृदया हो। क्या
वडे बूडो को वस्त्र या भात नही देना चाहिए ?
"तात ! मुझे ही राजा से कुछ नही मिलता। तुम्हें क्या दूँगी।"
"क्या पटरानी नही हो ?"
'तात ! कुछ सम्मान न मिलने पर पटरानी होने से क्या होगा ? अब
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मुझे तुम्हारा राजा क्या देगा। उसने रास्ते में भात की पोटली पा, उसमें से
कुछ भी न दे स्वयं खाया।"
बोधिसत्त्व ने पूछा—
“महाराज, क्या ऐसी बात है ?”
राजा ने स्वीकार किया। बोधिसत्त्व ने राजा 'स्वीकार करता है' जान
देवी को कहा—
“देवी ! राजा को अप्रिय होने पर तुम्हे यहाँ रहने से क्या लाभ ? संसार
में अप्रिय का साथ दुखदायी होता है। तुम्हारे यहाँ रहने से राजा को अप्रिय
के साथ रहने का दुख होगा। 'प्राणी मिलने वाले के साथ मिलते हैं, न मिलने
वाले के साथ नहीं मिलते' जान दूसरी जगह चला जाना चाहिए। दुनिया
बहुत बड़ी है।”
इतना कह यह गाथाएँ कही—
नमे नमन्तस्स भजे भजन्त
किच्चानुकुब्बस्स करेय्य किच्च,
नानत्थकामस्स करेय्य अत्थ
असम्भजन्तम्पि न सम्भजेय्य ॥१॥
चजे चजन्तं घणयं न कयिरा
अपेताचित्तेन न सम्भजेय्य,
द्विजो दुमं खीरणफलं ति अत्वा
अञ्ञं समवेक्खेय्य महा हि लोको ॥२॥
[ झुकने वाले के सामने झुके। संगति करना चाहने वाले के साथ संगति
करे। जो अपने काम आता हो उसका काम करे। अनर्थ चाहने वाले का अर्थ
न करे। जो संगति करना न चाहता हो, उससे संगति न करे ॥१॥
छोड़ने वाले को छोड़ दे। ऐसे से स्नेह न करे। जिसका दिल विमुख हो
गया हो, उससे संगति न करे। जिस तरह पक्षी वृक्ष को फलरहित जानकर
दूसरे (वृक्ष) को ढूँढते हैं, उसी तरह दूसरे को ढूँढे। संसार बड़ा है ॥२॥ ]
कुम्भील ] ३८५
नमे नमन्तस्स भजे भजन्त जो अपने सामने झुके उसी के सामने झुके।
जो संगति करता है उसी से संगति करे। किच्चानुकुब्बस्स करेय्य किच्चं,
काम पड़ने पर जो अपने काम आये, काम पड़ने पर उसका भी काम करे।
चजे चजन्तं वणयं न कयिरा अपने को छोड़ने वाले को छोड़ ही दे।
उससे तृष्णा नामक स्नेह न करे। अपेतचित्तेन विगन चित्त से वा बदलं हुए
चित्त (वाले) के साथ। न सम्भजेय्य वैसे के साथ न मिले जुले। द्विजो दुमं
जैसे पक्षी पहले फले होने पर भी जब वृक्ष के फल नहीं रहते तो क्षीणफल
हुआ जान उसे छोड़ दूसरे को देखता है, खोजता है उसी तरह अञ्ञं समवेक्खेय्य
महा हि यहु लोको। तुम्हें स्नेह करने वाला एक न एक आदमी मिल जायगा।
यह सुन बाराणसी राजा ने देवी को सब ऐश्वर्य दिये। तब से लगाकर
मिल जुलकर प्रसन्नता पूर्वक रहने लगे।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर दोनो पति पत्नी स्रोतापत्तिफल
में प्रतिष्ठित हुए।
उस समय पति पत्नी यह दोनो पति पत्नी थे। पण्डित ग्रामात्य तो
मैं ही था।
२२४. कुम्भार जातक¹
“यस्सेते चतुरो धम्मा...” यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
देवदत्त के बारे में कही।
¹देखें वानरिंद जातक (५७)। कथा समान है। केवल एक गाथा
अधिक है।
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