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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

२४०. महापिङ्गल जातक

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२४०. महापिङ्गल जातक
“सब्बो जनो ..” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय देवदत्त
के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
देवदत्त के शास्ता के प्रति बैर बांध लेने के नौ महीने बाद जेतवन के
द्वार-कोठे पर (उसके) पृथ्वी द्वारा निगल लिए जाने पर जेतवनवासी तथा
सकल नगर के निवासी यह सोच कि बुद्ध के मार्ग का कण्टक देवदत्त पृथ्वी
के द्वारा निगल लिया गया और अब सम्यक सम्बुद्ध का शत्रु मर गया बड़े
सन्तुष्ट हुए। उनसे परम्परा-घोष¹ से सुनकर सारे जम्बूद्वीपवासी तथा यक्ष
भूत और देवगण भी बड़े हर्षित हुए।
एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो, देवदत्त
के पृथ्वी द्वारा निगल लिए जाने पर महा-जन-समूह यह सोचकर कि बुद्ध का
विरोधी देवदत्त पृथ्वी द्वारा निगल लिया गया हर्षित हुआ। शास्ता ने आकर
पूछा—भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो? 'अमुक बातचीत'
कहने पर शास्ता ने कहा—'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त के मरने पर जन-
समूह हर्षित होता है और प्रसन्न होता है, पहले भी हर्षित हुआ है और प्रसन्न
हुआ है।" इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में महापिङ्गल नाम का राजा अधर्म से, अनुचित
¹एक से दूसरा और फिर उससे तीसरा सुने।

महापिङ्गल ] ४२६
तौर पर राज्य करता था। छन्द आदि के वशीभूत हो पापकर्म करता हुआ
दण्डबलि जङ्घ-कार्षापण आदि ले जनता को ऐसे पीडता था जैसे ऊख-यन्त्र ऊख
को। वह रौद्र स्वभाव का था, कठोर था और दुस्साहसी था। उसमें दूसरो के
लिए तनिक भी दया नही थी। घर मे स्त्रियो या, लडके लडकियो का, अमात्य
ब्राह्मणो का तथा गृहपति आदि का भी अप्रिय था। वह ऐसा था मानो आँख में
धल हो, भात के कौर मे ककर हो अथवा ऐडी को बीध कर काँटा घुस गया हो।
उस समय बोधिसत्त्व महापिङ्गल का पुत्र होकर पैदा हुए। महापिङ्गल
चिरकाल तक राज्य करके मर गया। उसके मरने पर सभी वाराणसी वासियो
ने हर्षित हो, सन्तुष्ट हो, खूब प्रसन्न हो एक हजार गाडी लकडी से महापिङ्गल
को जलाकर अनेक सहस्र घडो से आग बुझाई। फिर बोधिसत्त्व को राज्य पर
अभिषिक्त कर 'हमे धार्मिक राजा मिला' सोच (वे) प्रसन्न हो नगर मे
उत्सव-भेरी बजवा, ऊँची ध्वजाओ तथा पताकाओ से नगर को अलङ्कृत
कर, दरवाजे दरवाजे पर मण्डप बनवा, लाज-पुष्प बिखरे सजे हुए मण्डपो
मे बैठ कर खाने पीने लगे।
बोधिसत्त्व भी अलङ्कृत महान् तल पर (बिछे) श्रेष्ठ आसन के बीच
मे, जिस पर श्वेत छत्र छाया हुआ था बैठे। अमात्य, ब्राह्मण, गृहपति, राष्ट्रिक
तथा द्वारपाल आदि राजा को घेर कर खडे थे। एक द्वारपाल थोडी ही दूर
पर खडा हो आस्वास-प्रश्वास लेता हुआ रोने लगा। बोधिसत्त्व ने उसे
देख पूछा—सोम्य ! मेरे पिता के मरने पर सभी प्रसन्न हो उत्सव मना रहे
है। लेकिन तू खडा रो रहा है। क्या मेरा पिता तुम्हे ही प्रिय था ? यह पूछते
हुए पहली गाथा कही—
सब्बो जनो हिंसितो पिङ्गलेन
तस्मि गते पच्चयं वेदयन्ति,
पियो नु ते आसि अकण्हनेत्तो
कस्मा नु त्वं रोदसि द्वारपाल ॥
[ पिङ्गल ने सब जना को कष्ट दिया । उसके मरने पर सभी
आनन्द का अनुभव करते है। हे द्वारपाल ! क्या वह तेरा ही प्रिय था ? तू
क्यो रोता है ? ]