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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

१७१. कल्याणधम्म जातक

दूसरा परिच्छेद
३. कल्याणधम्म वर्ग
१७१. कल्याणधम्म जातक
"कल्याण धम्मो " यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक बहरी
सास के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में एक कुटुम्बिक रहता था। वह श्रद्धावान् था। वह प्रसन्न-
चित्त था। वह त्रिशरण ग्रहण किए था और पञ्चशील भी।
एक दिन वह घी आदि बहुत सी औषधियाँ,¹ पुष्प, सुगन्धियाँ तथा वस्त्र
ले शास्ता से धर्म सुनने की इच्छा से जेतवन गया।
उसके वहाँ गए रहने पर सास खाद्य-भोजन ले लडकी को देखने की इच्छा
से लडकी के घर आई। वह थोडी बहरी थी। जब लडकी के साथ खाना खा
चुकी, तो भोजनोपरान्त आराम करते हुए उसने लडकी से पूछा—'अम्म !
क्या तेरा पति तुझसे प्रसन्न है ? क्या वह विवाद न करता हुआ, प्रेमपूर्वक
रहता है ?"
'अम्म ! क्या कहना ! जैसा तुम्हारा जँवाई है, वैसा शीलवान् तथा
सदाचारी प्रव्रजित भी मिलना दुर्लभ है।"
उस उपासिका ने लडकी की सारी बात पर भली प्रकार ध्यान न दे


¹ घी, मक्खन आदि औषध रूप से भिक्षु अपराह्न में भी ग्रहण कर सकता
है।

कल्याणधम्म ] २१५
केवल 'प्रव्रजित' शब्द को सुन चिल्लाना शुरू किया—'धम्म ! तेरा स्वामी
प्रव्रजित क्यों हो गया ?'
उसकी बात सुन सारे घर वाले रोने लगे—'हमारा घर का मालिक
प्रव्रजित हो गया ।'
उनका रोना सुन दरवाजे से गुजरने वाले लोग पूछने लगे कि रो क्यों
रहे हैं ? "इस घर का मालिक प्रव्रजित हो गया है ।'
यह कुटुम्बिक भी बुद्ध का उपदेश सुन, विहार से निकल नगर में प्रविष्ट
हुआ । एक आदमी ने उसे रास्ते में ही देख कर कहा—'सौम्य ! तेरे घर पर
तेरे लड़के, स्त्री आदि सम्बन्धी रो रहे हैं कि तू प्रव्रजित हो गया है।'
उसने सोचा—मैं प्रव्रजित नहीं हूँ, तो भी मुझे लोग प्रव्रजित समझ रहे
हैं। मेरी प्रशंसा होने लगी है। इसे गँवाना नहीं चाहिए। आज ही मुझे
प्रव्रज्या ग्रहण करनी चाहिए।
वह वहीं से वापिस लौट कर शास्ता के पास गया। शास्ता ने पूछा—
"उपासक ! अभी तू बुद्ध की सेवा म आकर लौटा, और तुरन्त फिर
आया है ?"
उसने वह बात कह निवेदन किया—"भन्ते ! मेरी प्रशंसा होने लगी।
है। उस शुभ-नाम को गँवाना नहीं चाहिए। इसलिए मैं प्रव्रजित होने की
इच्छा से आया हूँ।"
प्रव्रज्या और उपसम्पदा प्राप्त कर वह अच्छी तरह से जीवन व्यतीत
करता हुआ थोड़ी ही देर में अर्हत् हुआ ।
यह बात भिक्षुसंघ में प्रकट हुई। एक दिन धर्म-सभा में भिक्षुओ ने बात-
चीत चलाई—"आयुष्मानो ! अमुक कुटुम्बिक ने सोचा कि उसकी जो प्रशंसा
होने लगी है, उस शुभ-नाम का लोप नहीं होना चाहिए। वह प्रव्रजित होकर
अर्हत् हो गया ।"
शास्ता ने आकर पूछा—' भिक्षुओ ! बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?"
"अमुक बातचीत" कहने पर, शास्ता ने कहा—'भिक्षुओ, पुराने समय में
पण्डित जन भी यही सोच कर कि जो प्रशंसा होने लगे उस शुभ-नाम का लोप
नहीं होने देना चाहिए प्रव्रजित ही हुए ।'
इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।