जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
१३८. गोध जातक
६६ [ १.१४.१३८
१३८. गोध जातक
“किं ते जटाहि दुम्मेध...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय एक ढोंगी के बारे में कही।
वर्तमान-कथा जैसी कथा पहले आई है,१ वैसी ही है।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व गोह
के रूप में पैदा हुए।
उस समय पाँच-अभिञ्ज्ञा प्राप्त (एक) उग्र तपस्वी एक गाँव के समीप
जंगल में पर्ण-कुटी में रहता था। ग्रामवासी तपस्वी की अच्छी तरह सेवा करते
थे। बोधिसत्त्व उसके चङ्क्रमण करने की जगह के पास एक बिल में रहते थे।
प्रतिदिन दो तीन बार तपस्वी के पास आकर धर्म तथा अर्थपूर्ण बातें सुन तपस्वी
को प्रणाम कर अपने निवासस्थान को लौट जाते। आगे चलकर तपस्वी ग्राम-
वासियों को पूछकर वहाँ से चला गया। उस शीलव्रतसम्पन्न तपस्वी के चले
जाने पर एक दूसरा कुटिल तपस्वी आकर उसी आश्रम में रहने लगा। बोधि-
सत्त्व उसे भी पहले ही तपस्वी की तरह सदाचारी समझ उसके पास गए।
एक दिन ग्रीष्मऋतु में अकाल वर्षा बरसने पर बिलों में से मक्खियाँ
निकलीं। उन्हें खाने के लिए गोह घूमने लगीं। ग्रामवासियों ने बाहर निकल
बहुत सी गोहें पकड़ चिकनी भोजन सामग्री के साथ खट्टा-मीठा गोह-मांस
तैयारकर उस तपस्वी को दिया।
१भीमसेन जातक (८०)
गोध ] ६७
तपस्वी ने गोह का मांस खाया तो उसे बहुत स्वादिष्ट लगा । उसने पूछा
—यह मांस बड़ा मीठा है। किसका मांस है ? जब उसे पता लगा कि किसका
मांस है, तो वह सोचने लगा कि मेरे पास बड़ी गोह आती है । उसे मारकर
उसका मांस खाऊँगा । उसने पकाने के बरतन और उनके साथ घी, नमक
आदि मँगवा कर एक ओर रख लिए। स्वयं मुद्गर ले काषाय वस्त्र से ढँक
पर्ण-कुटी के सामने शान्त-चित्त की तरह बैठ बोधिसत्त्व की प्रतीक्षा करने
लगा।
बोधिसत्त्व शाम को तपस्वी के पास जाने के लिए निकले। समीप पहुँचते
ही उसकी इन्द्रियों में विकार देखकर सोचने लगे—यह तपस्वी उस तरह नहीं
बैठा है जैसे और दिनों बैठा रहता था। आज यह मेरी ओर द्रूषित दृष्टि
से देख रहा है। इसकी परीक्षा करूँगा । वे जिधर से तपस्वी की देह को छूकर
हवा आ रही थी उधर खड़े हुए । गोह के मांस की गन्ध आई । उसे सूंघकर
बोधिसत्त्व ने सोचा—इस कुटिल तपस्वी ने आज गोह मांस खाया होगा ।
इसी से यह रस-तृष्णा में आसक्त हो गया । आज मेरे समीप पहुँचने पर मुझे
मुद्गर से मार मांस पकाकर खाना चाहता होगा । वह उसके पास न जा
वापिस लौटकर घूमने लगे ।
तपस्वी ने बोधिसत्त्व को न आता देख समझा कि यह जान गया होगा कि
मैं इसे मारना चाहता हूँ । इसी से नहीं आता है । न आने पर भी यह कहाँ
बचकर जाएगा । उसने मुद्गर निकाल फेंककर मारा । वह उसकी पूँछ के
सिरे में ही लगा ।
बोधिसत्त्व जल्दी से बिल में प्रविष्ट हो दूसरे छेद से सीस निकालकर बोले
—'कुटिल जटिल ! मैं तुझे सदाचारी समझ कर तेरे पास आया । लेकिन
अब मैंने तेरा कुटिल स्वभाव जान लिया । तेरे जैसे महाचोर को इस प्रव्रजित
भेष से क्या ?'' इस प्रकार उसकी निन्दा करते हुए यह गाथा कही—
किं ते जटाहि दुम्मेध किं ते अजिन साटिया,
अब्भन्तरं ते गहनं बाहिरं परिमज्जसि ॥१
१ धम्मपद (२६।२२)
७
३८ [ १.१४ १३६
[हे दुर्बुद्धि ! जटाओ से तुझे क्या (लाभ) ? और मृगचर्म के पहनने
से क्या ? अन्दर से तो तू मैला है, बाहर से धोता है।]
किं ते जटाहि दुम्मेध, भो, दुर्बुद्धि ! मूर्ख ! यह जटाएँ प्रव्रजित को
धारण करनी चाहिएँ। प्रव्रज्या गुण से तू रहित है। तुझे इन जटाओ से क्या
लाभ ? किं ते प्रजिन साटिया, मृग-चर्म के अनुकूल सयम का अभाव है, तब
इस मृग-चर्म से क्या ? अब्भन्तर ते गहन—तेरा भीतर राग, द्वेष तथा
मोह से मलिन है, ढका हुआ है। बाहिर परिमज्जसि, सो तू अभ्यन्तर को
मैला ही रख स्नान आदि से तथा (श्रमण-) चिह्न धारण करके बाहर को साफ
करता है। तू वैसा ही है जैसे वाञ्जी से भरा हुआ तूम्बा हो, विष से भरा घडा
हो, साँप से भरी हुई वाँवी हो अथवा गूढ़ से भरा हुआ चित्रित घडा हो। तुझ
चोर के यहाँ रहन से क्या ? शीघ्र भाग । यदि नही जाएगा तो ग्रामवासियो
को कहकर तेरा निग्रह करवाऊँगा।
इस प्रकार बोधिसत्त्व उस कुटिल तपस्वी को धमकाकर बिल में चले गए।
कुटिल तपस्वी भी वहाँ से चला गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय कुटिल
तपस्वी यह ढोंगी था। पहला शीलवान् तपस्वी सारिपुत्र था। गोधपण्डित
तो मैं ही था।
१३६. उभतोभट्ठ जातक
"अवस्सो भित्तो पटो नष्टो . ." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते
समय देवदत्त के बारे म कही।
वह पीडा से पगला हो हाथ से आंखो को दबाए हुए पानी से बाहर निकल
कांपता हुआ कपडे खोजने लगा।
उसकी भार्या ने भी सोचा कि मे झगडा करके ऐसा कर दूं कि कोई कुछ
आशा न रक्खे। उसने एक कान में ताड का पत्ता पहना, एक आंख में हांडी का
काजल लगाया और गोद में कुत्ता ले पडोसी के घर गई। उसकी एक पडोसन
बोली—"तूने एक ही कान में ताड का पत्ता डाला है, एक ही आंख में कज्जल
लगाया है और गोद में कुत्ते को ऐसे लेकर जैसे यह तेरा प्यारा पुत्र हो एक
घर से दूसरे घर घूम रही है। क्या तू पगली हो गई है ?"
"मै पगली नही हूँ ? तू मुझे व्यर्थ ही गाली देती है, मजाक करती है। अब
में मुखिया¹ के पास जाकर तुझपर आठ कार्षापण जुर्माना करवाऊँगी।"
इस प्रकार परस्पर झगडकर दोनो मुखिया के पास गईं। दोषी का पता
लगाने से वही दण्डित हुई।
लोग उसे बांधकर पीटने लगे कि जुर्माना दे।
वृक्षदेवता ने गांव मे उसका यह हाल और जगल में उसके पति की विपत्ति
को देख एक टहने पर खडे होकर कहा—भो ! पुरुष ! जल में भी तेरा
काम बिगडा, स्थल पर भी। तू दोनो ओर से भ्रष्ट होगया। इतना कह यह
गाथा कही—
अक्खी भिन्ना पटो नट्ठो सखीगेहे च भण्डन,
उभतो पदुट्ठकम्मन्तो उदकम्हि थलम्हि च ॥
[ आंख फूट गई। वस्त्र खोया गया। सखी के घर में झगडा हुआ।
जल और स्थल दोनो ही में तेरा काम बिगड गया।]
सखीगेहे च भण्डन, सखी का मतलब है सहायिका, उसके घर में तेरी भार्या
न झगडा किया। झगडा करके बांधी गई, पीटी गई और दण्डित हुई।
उभतो पदुट्ठ कम्मन्तो, इस प्रकार दोनो जगह में तेरा काम बिगडा ही।
कौन से दो स्थानो में ? उदकम्हि थलम्हि च, आँख फूटने से और वस्त्र नष्ट
¹ ग्रामभोजकं ।