जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
⸱ १२२. दुम्मेध जातक
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⸱ १२२. दुम्मेध जातक
"यसं लद्धान दुम्मेधो" यह (धर्म-देशना) बुद्ध ने वेळुवन में रहते समय
देवदत्त के बारे में की।
क. वर्तमान कथा
धर्म-सभा में बैठे भिक्षु देवदत्त को दोष दे रहे थे— "आयुष्मानो ! तथा-
गत का पूर्ण-चन्द्र सदृश शोभा वाला मुख है। वे अस्सी अनु-व्यञ्जनों
तथा बत्तिस महापुरुष लक्षणो से युक्त हैं। उनके चारो ओर व्याम-भर प्रभा
है। उनके शरीर से घूम घूमकर दो दो करके घनी बुद्ध-रश्मियां निकलती
हैं। उनका शरीर अत्यन्त शोभा सम्पन्न है। ऐसे सुन्दर रूप को देखकर, देव-
दत्त चित्त को प्रसन्न नहीं कर सकता, ईर्ष्या ही करता है। 'बुद्ध का ऐसा शील
है, ऐसी समाधि है, ऐसी प्रज्ञा है, ऐसी विमुक्ति है, ऐसा विमोक्ष-ज्ञान-दर्शन
है' इस प्रकार प्रशंसा करने पर देवदत्त उनकी प्रशंसा नहीं सह सकता, ईर्ष्या
ही करता है।"
शास्ता ने आकर पूछा— "भिक्षुओ ! यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे
हो ?" अमुक बातचीत कहने पर "भिक्षुओ ! न केवल अभी मेरी प्रशंसा
होने पर देवदत्त ईर्ष्या करता है, वह पहले भी करता रहा है" कह पूर्व-जन्म
की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में मगध देश के राजगृह नगर में एक मगध-नरेश के राज्य करते
समय बोधिसत्त्व हाथी की योनि में पैदा हुए। उनका सारा शरीर एक दम
श्वेत था और उनकी शोभा ऊपर वर्णन की गई शोभा की ही तरह थी। 'यह
लक्षणो से युक्त है' देख उस राजा ने बोधिसत्त्व को मंगल हाथी बनाया।
दुम्मेध ] ४६
एक दिन किसी उत्सव के अवसर पर राजा सारे नगर को देवनगर की
तरह अलंकृत करा, सब अलंकारों से सजे हुए मंगल हाथी पर चढ़, बड़ी
राजकीय शान के साथ नगर मे घूमने के लिए निकला । लोग जहाँ तहाँ खड़े
होकर मंगल हाथी के अति सुन्दर शरीर को देख मंगल हाथी की ही प्रशंसा
करने लगे—“ओह् ! क्या रूप है ! ओह ! क्या चाल है ! ओह ! कैसा ढंग
है ! ओह ! कैसे लक्षण हैं ! इस प्रकार का सर्वश्रेष्ठ हाथी चक्रवर्ती राजा
के योग्य है ।”
राजा ने मंगल हाथी की प्रशंसा सुन उसे न सह सकने के कारण, ईर्ष्या के
वशीभूत हो सोचा, “आज ही इसे पर्वत-प्रपात से गिरवा कर मरवा डालूँगा ।”
फिर हथवान को बुलवाकर पूछा—
“तूने इस हाथी को क्या (खाक) सिखाया है ?”
‘देव ! अच्छी तरह से सिखाया है ।”
“नही, अच्छी तरह से नही सिखाया, खराब सिखाया है ।”
‘देव ! अच्छी तरह से सिखाया है ।”
“यदि अच्छी तरह से सीखा, तो क्या तू इसे वेपुल्ल पर्वत के ऊपर चढ़ा
ले जा सकता है ?”
“देव ! हाँ ।”
“अच्छा, तो आ” कह अपने उतर हथवान् को हाथी पर चढ़ा पर्वत के पास
जा, हथवान् के हाथी की पीठ पर बैठे ही हाथी को पर्वत के ऊपर चढ़ा ले
जाने पर, आमात्यो के साथ स्वयं भी पर्वत के शिखर पर चढ़, हाथी का
मुंह प्रपात की ओर करवा कहा—“तू कहता है कि मैंने इसे अच्छी तरह
सिखाया है । इसे तीन ही पैरों से खड़ा कर ।”
हथवान् ने पीठ पर बैठे ही बैठे हाथी को अंकुश द्वारा इशारा किया, ‘भो !
तीन पैरो से खड़े हो जाओ ।” वह तीन पैरों से खड़ा हो गया । तब राजा
बोला—“आगे के दो पैरों के भार खड़ा करा ।” बोधिसत्व पिछले दोनों
पैर उठाकर अगले पैरों पर खड़े हुए । ‘पिछले ही पैरो पर’ कहने पर आगे के
दोनों पैर उठाकर पिछले ही पैरों पर खड़े हो गए । ‘एक ही पैर से’ भी कहने
पर तीनों पैर उठा एक ही पैर से खड़े हो गए । उसे न गिरता देख राजा ने
कहा—‘यदि कर सको, तो इसे आकाश में खड़ा करो ।’
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हथवान् ने सोचा सारे जम्बूद्वीप मे इसे हाथी के समान सुशिक्षित हाथी
नही है। निस्सशय यह राजा इसे प्रपात में गिरवाकर मरवाना चाहता है।
उसने हाथी के कान में कहा—"तात ! यह राजा तुझे प्रपात में गिराकर मार
डालना चाहता है। तू इसके योग्य नही है। यदि तुझमें आकाश-मार्ग से जाने
का बल हैं, तो जैसे में बैठा हूँ वैसे ही मुझे ले आकाश मे उड वाराणसी चल।"
पुण्य-ऋद्धि से युक्त वह हाथी उसी समय आकाश में सडा हो गया।
हथवान् ने कहा—'महाराज ! यह हाथी पुण्य-ऋद्धि से युक्त है। यह तेरे
जैसे पुण्य-रहित दुर्बुद्धि के योग्य नही है। यह (किसी) पुण्यवान् पण्डित
राजा के योग्य है। तेरे सदृश अपुण्यवान् इस प्रकार का वाहन पा उसके गुणो
को न पहचान उस वाहन को तथा सारी सम्पत्ति को नष्ट ही कर डालते है।'
इतना कह हाथी के कन्धे पर बैठे ही बैठे यह गाथा कही—
यस लद्धान दुम्मेधो अनत्थं चरति अत्तनो,
अत्तनो च परेसं च हिंसाय पटिपज्जति ॥
[ मूर्ख आदमी सम्पत्ति को प्राप्त हो अपनी हानि करता है। वह अपनी
और दूसरो की हिंसा करता है।]
यह सक्षिप्तार्थ है—महाराज ! उस प्रकार का दुम्मेधो, प्रज्ञाहीन आदमी
परिवार-सम्पत्ति पाकर अत्तनो अनत्थं चरति । क्यो ? वह सम्पत्ति के मद में
बेहोश हो, कुछ न जानने के कारण अत्तनो च परेसं च हिंसाय पटिपज्जति,
हिंसा का अर्थ है क्लेश, दुख देना, वही करता है।
इस प्रकार इस गाथा से राजा को धर्मोपदेश दे 'अब तू यहाँ रह' वह आकाश
में उडकर वाराणसी जाकर राजा के आँगन में आकाश मे रहा। सारे नगर
में एक हल्ला हो गया—हमारे राजा के पास आकाश से एक श्वेत-श्रेष्ठ हाथी
आकर राजा के आँगन पर ठहरा है। जल्दी से राजा को भी खबर दी गई।
राजा ने निकलकर कहा—यदि मेरे उपयोग के लिए आया है, तो जमीन पर
उतर । बोधिसत्त्व जमीन पर उतरे। हथवान् ने उतरकर राजा को प्रणाम
किया। राजा ने पूछा—"तात ! कहाँ से आया है ?" "राजगृह से" कह
सब समाचार सुनाया ।