जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
हैं उन सबका भलीभाँति विवेचन प्रकाशित करके जातक का मेल बैठाया।
६६ [ १-१३-१२७
शास्ता ने इस धर्मोपदेश द्वारा लोक में जो बहुधा भी अच्छी बुरी भावनाएं
हैं उन सबका भलीभाँति विवेचन प्रकाशित करके जातक का मेल बैठाया।
उस समय का तलवार से लक्षण पढ़नेवाला तो यह अब का तलवार के
लक्षण पढ़नेवाला ही था। मैं भानन्द-राजा में ही था।
१२७. कलण्डुक जातक
"से ऐसा सानि थल्पूनि..." यह (धर्मदेशना) शास्ता ने जेतवन म
रहने समय एक थरवादी भिक्षु के बारे में कही। दोनो कथाएँ (अतीत कथा
तथा वर्तमान कथा) कटाहक जातक¹ की कथा की तरह ही हैं।
हाँ, इस जातक में वाराणसी के सेठ का नाम कलण्डुक था। उसने भाग
कर प्रत्यन्त सेठ की लडकी से विवाह कर बडे ठाट-बाट के साथ रहने के
समय, वाराणसी के सेठ के उसे ढुंढवाने पर भी उसके न मिलने पर, वाराणसी
सेठ ने अपना पाला-पोसा एक तोते का बच्चा भेजा कि जा कलण्डुक को खोज।
तोते का बच्चा इधर-उधर घूमता हुआ उस नगर में पहुँचा।
उस समय कलण्डुक जल-क्रीडा करने की इच्छा से बहुत सारे माला-गन्ध-
विलेपन तथा खाद्य-भोज्य ले नदी पर जा सेठ कन्या के साथ एक नौका पर बैठ
पानी म खेलता था। उस देश में ऐश्वर्य्यशाली लोग जब जल-क्रीडा करते
तो कोई तेज औषध मिला हुआ दूध पीते थे। उससे उनके सारा दिन भी
जल म क्रीडा करते रहने पर उन्हें शीत नही लगता था। यह कलण्डुक उस दूध
से मुंह भर उससे कुरला कर उसे थूक देता, लेकिन उसे जल में न थूककर उस
सेठ-कन्या के सिर पर थूकता था।
¹ कटाहक जातक (१२५) ।
कलण्डुक ] ६७
उस तोते के बच्चे ने भी नदी के किनारे एक गूलर की शाखा पर बैठ
कलण्डुक को पहचान लिया और देखा कि वह सेठ-कन्या के सिर पर थूक रहा
है। उसने कहा—"अरे ! कलण्डुक ! दास ! अपनी जाति और (पूर्व)
निवास-स्थान को याद कर। दूध से मुंह भर, उसका कुरला कर ऊँची जाति-
वाली कुल में पली हुई सेठ की कन्या के सिर पर मत थूक। तू अपनी हैसियत
को नहीं देखता ?" फिर यह गाथा कही—
ते देसा तानि वत्थूनि अहञ्च वनगोचरो,
अनुविच्च खो त गण्हेय्यु पिव खीर कलण्डुक ॥
[ वह देश और वस्तुएँ (=कोख) । मैं वनचर पक्षी । तुझे पहचान
कर पकड़ लगे । कलण्डुक दूध पी ।]
ते देसा तानि वत्थूनि, यह माता की कोख के बारे मे कहा है। भावार्थ
यह है—जहाँ तू रहा है वह क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है, अथवा
जहाँ तू प्रतिष्ठित रहा है वह भी क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है।
तू दासी की कोख मे रहा और प्रतिष्ठित हुआ। अहञ्च वन गोचरो—में
तिरश्चीन योनि में पैदा होकर भी यह सब जानता हूँ, यह प्रकट करता है।
अनुविच्च खो त गण्हेय्यु, इस प्रकार अनाचार करते हुए को देख जब मैं
जाकर कहूँगा तो पहचानकर वह तेरे स्वामी आकर तुझे ताड़कर और दाग
देकर पकड़ कर ले जायेंगे। इसलिए अपनी हैसियत देखकर सेठ की लड़की
के सिर पर बिना थूके हुए पिव खीर कलण्डुक; नाम से सम्बोधन करता है
कि (हे कलण्डुक दूध पी) ।
कलण्डुक ने भी तोते के बच्चे को पहचानकर 'यह मुझे प्रकट कर रहा है'
सोच भयभीत हो कहा—आइए ! स्वामी ! कब आए ? तोते के बच्चे
ने सोचा यह मेरा हित चिन्तक होकर नही बुला रहा है। यह मेरी गरदन
मरोड़कर मार डालना चाहता है। यह समझकर कहा कि मुझे तुझसे काम
नही है।
तब वह उड़कर बाराणसी गया और जैसे जैसे देखा था सेठ को विस्तार-
पूर्वक सब कहा।