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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का

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सेठ बोला—उसने अनुचित किया। और आज्ञा दे उसे वाराणसी मँगवा
दास बनाकर रक्खा।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का
कटण्डुक यह भिक्षु था। वाराणसी सेठ तो मैं ही था।
१२८. बिळारवत जातक
“यो चे धम्मं धजं कत्वा ..” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक
ढोंगी भिक्षु के बारे म कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय शास्ता ने उसके ढोंग की चर्चा चलने पर 'भिक्षुओ, केवल अब
ही नहीं, पहल भी यह ढोगी ही रहा है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करन के समय बोधिसत्त्व ने
चूहे का जन्म ग्रहण किया। बड़े होने पर वह बढ़कर सूअर के बच्चे की तरह
हो अनेक सौ चूहों के साथ जंगल म रहने लगा।
इधर उधर घूमते हुए एक शृगाल ने उस चूहों के समूह को देखकर सोचा
कि इन चूहों को ठगकर खाऊँगा। यह सोच वह चूहों के बिल से थोड़ी ही दूर
पर सूर्याभिमुख हो, मुंह खोल हवा पीते हुए की तरह एक ही पाँव से खड़ा
हुआ।
इधर उधर भोजन के लिए ढूंढ़ते हुए बोधिसत्त्व ने उसे देख सोचा यह
सदाचारी होगा और उसके पास आकर पूछा—

बिळारवत ] ६६
"आपका, भन्ते ! क्या नाम है ?"
"मेरा नाम है धार्मिक ।"
"चारो पैर पृथ्वी पर न रख, एक ही पैर से क्या खड़े हैं ?"
"मेरे चारो पैर पृथ्वी पर रखने से पृथ्वी के लिए दूभर होगा, इस लिए
एक ही पैर से खडा होता हूँ।"
"मुँह खोले क्यो खड़े हैं ?"
"हम हवा के अतिरिक्त और कुछ नही खाते ?"
"सूर्य की ओर मुंह करके क्यो खडे है ?"
'सूर्य को नमस्कार कर रहा हूँ।"
बोधिसत्त्व ने सोचा, यह सदाचारी है । उसके बाद से चूहों के समूह के
साथ प्रात साय उसकी सेवा में जाने लगे ।
उसकी सेवा कर लौटने के समय शृगाल सबसे पिछले चूहे को पकड़कर
मास खा, निगल कर, मुंह पोछ खडा हो जाता । क्रम से चूहों का दल कम
पड गया । चूहे सोचने लगे कि पहले हम यह बिल पर्याप्त नही होता था, सट
सट कर खड़े होते थे, अब खुलकर खड़े होते हैं तब भी बिल नही भरता ।
क्या मामला है ? उन्होने बोधिसत्त्व से सारा हाल कहा ।
बोधिसत्त्व ने 'चूहे किस कारण कम हो गए' सोचते हुए शृगाल पर शक
किया । फिर जांच करने के लिए (शृगाल की) सेवा (से लौटने) के समय
बाकी चूहों को आगे कर स्वय पीछे रहा । शृगाल उस पर उछला । अपने
को पकडने के लिए शृगाल को उछलता देख बोधिसत्त्व ने रुककर कहा—
भो शृगाल ! तेरा यह व्रत धार्मिक नहीं है । तू दूसरो की हिंसा करने
के लिए ही धर्म को आगे करके रहता है । इतना कह यह गाथा कही—
यो वे धम्मं धजं कत्वा निगूळ्हो पापमाचरे,
विस्सासयित्वा भूतानि बिळार नाम तं वतं ॥
[जो धर्म की ध्वजा बनाकर, प्राणियो में विश्वास उत्पादन कर छिप
कर पाप करता है, उसका व्रत बिलाल-व्रत है ।]
यो वे, क्षत्रिय आदियों में कोई भी । धम्मं धजं कत्वा, दस कुशल धर्मों की
ध्वजा बनाकर, उन्ह करता हुआ उठाकर दिखाता हुआ, विस्सासयित्वा, यह

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सदाचारी है, ऐसा विश्वास पैदा करके विडार नाम त व्रत, इस प्रकार धर्म की
ध्वजा बनाकर छिपकर पाप करनेवाले का व्रत ढोंग कहलाता है।
चूहों के राजा ने इस प्रकार कहते ही कहते उछलकर उसकी गरदन पर
चढ, ठोडी के नीचे की अन्दर की गले की नाली को डसकर गले की नली
को फाड मार डाला। चूहों के दल ने रुक कर शृगाल को मुर मुर करके
खा डाला। पहले आए हुओ को ही शृगाल का मांस मिला, पीछे आए हुओ को
नही मिला। उसके बाद से चूहों का दल निर्भय हो गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का
शृगाल यह ढोगी भिक्षु था। चूहों का राजा तो मै ही था।
१२६. अग्गिक जातक
“नाय सिखा पुञ्जहेतु .” यह (गाथा) भी शास्ता ने जेतवन में रहते
समय एक ढोगी भिक्षु के ही बारे में कही—
ख. अतीत कथा
पुराने समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
चूहों के राजा हो जगल में रहते थे।
एक शृगाल जगल में आग लगने पर जब भागने में असमर्थ रहा, तो एक
वृक्ष से सिर टिकाकर खडा हो गया। उसके सारे शरीर के बाल जल गए।
वृक्ष से लगे हुए सिर पर शिखा की तरह से कुछ बाल बच गए। उसने एक
दिन एक पर्वतीय तालाब में पानी पीते हुए अपनी छाया के साथ शिखा को
देखकर सोचा अब मुझे पूंजी मिल गई। फिर जगल में घूमते हुए चूहों के बिल