जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
भी भागा है। इतना कह, पूर्व-जन्म की कथा कही—।
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सिंहनाद करते हुए, सिंह-पञ्जरे के समान धर्म्म-देशना कर रहे थे। परिव्राजक
दशबलधारी के ब्रह्म-शरीर जैसे रूप, पूर्ण चन्द्र जैसी शोभा वाले मुंह तथा
स्वर्णपट जैसे ललाट को देख कर, 'इस प्रकार के उत्तम पुरुष को कौन जीत
सकेगा ?' सोच रुका और दूसरी मण्डली में घुसकर भाग गया। जनता ने
उसका पीछा कर, पकड़, शास्ता से यह वृत्तान्त कहा। शास्ता बोले—"न केवल
अभी यह परिव्राजक मेरे स्वर्ण-वर्ण मुख को देख कर भाग गया है, यह पहले
भी भागा है। इतना कह, पूर्व-जन्म की कथा कही—।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बोधिसत्त्व वाराणशी में राज्य करते थे। तक्षशिला में एक
गन्धार राजा था। उसने वाराणशी जीतने की इच्छा से चतुरङ्गिनी सेना के
साथ आकर, नगर घेर लिया। फिर नगर-द्वार पर खड़े हो अपनी सेना को
देखते हुए, 'इतनी सेना को कौन जीत सकेगा' सोच अपनी सेना की प्रशंसा
करते हुए पहली गाथा कही—
धजमपरिमित अनन्तपारं
दुप्पसह धङ्केहि सागरमिव;
गिरिमिव अनिलेन दुप्पसहो
दुप्पसहो अह्मज्ज तादिसेन ॥
[ मेरी असीम ध्वजाएँ हैं, अनन्त सेना है। जिस प्रकार कौवों के द्वारा
सागर दुर्लङ्घ्य होता है (अथवा) हवा के द्वारा पर्वत दुर्जेय होता है, उसी प्रकार
मैं आज वैसे शत्रु द्वारा दुर्जेय हूँ।]
धजमपरिमित यह मेरे रथ में मोरपङ्खों में लगाकर ऊंची की हुई ध्वजाएँ
अपरिमित हैं, बहुत हैं, सैकड़ो हैं। अनन्तपारं मेरी सेना भी, इतने हाथी हैं
तथा इतने घोडे हैं इस प्रकार गिनी नहीं जा सकती।
दुप्पसह शत्रुओ द्वारा जीती नहीं जा सकती। जैसे क्या ? धङ्केहि
सागरमिव जैसे सागर बहुत कौवा द्वारा भी अतिक्रमण नही किया जा सकता,
उसी प्रकार दुर्धर्ष। गिरिमिव अनिलेन दुप्पसहो यह मेरी सेना, दूसरी सेना
दुतियपलासी ] ४०३
के सामने उसी तरह स्थिर रहती है जैसे हवा के सामने पर्वत। दुप्पसहो अह्ममज्ज
तादिसेन इस सेना के साथ में आज वैसे (शत्रु) से दुर्जेय हूँ। महल पर खडे
योधिसत्त्व के बारे मे कहता है।
उसने उसे अपना पूर्ण चन्द्र की सी शोभा वाला मुख दिखला कर धम-
काया—मूर्ख, बकवास मत कर, जिस प्रकार मस्त हाथी सरकण्डे के वन को
नष्ट कर देता है उसी प्रकार अभी तेरी सेना को विध्वंस करूँगा। और
दूसरी गाथा कही—
मा बालियं विप्पल्लपि न हिस्स तादिसं
विळम्हसे नहि लभसे निसेधकं;
आसज्जसि गजमिव एकचारिनं
यो तं पदा नळमिव पोथयिस्सति ॥
[ मूर्खता की बात मत बक । ऐसा नही हो सकता; 'मुझे रोकने वाला
नही मिलेगा' सोच उछलता है। तू एकचारी हाथी के सामने आया है जो
तुझे वैसे ही पांव से कुचल देगा जैसे सरकण्डे को ।]
मा बालियं विप्पलपि अपनी मूर्खता मत बक। न हिस्स तादिसं अथवा
न हिस्स तादिसो पाठ है। मेरी सेना अनन्त है, इस प्रकार विचार कर राज्य
जीत सकने वाला तेरे जैसा न होवे या नही होता है। विळम्हसे तू केवल राग,
द्वेष, मोह तथा मान से जलकर उबल रहा है। नहिलभसे निसेधक मेरे जैसे
को जीत कर फिर और रुकावट डालने वाला तुझे न मिलेगा। जिस रास्ते से
तू आया है उसीसे भगाऊँगा। आसज्जसि प्राप्त हुआ है। गजमिव एकचारिनं
एकचारी मस्त हाथी की तरह। यो तं पदा नळमिव पोथयिस्सति जो तुझे
उसी तरह कुचल देगा जिस तरह मस्त हाथी पाँवो से सरकण्डे को कुचलता
है, अच्छी तरह पीस डालता है। तू उसे प्राप्त हुआ, यह अपने बारे मे
कहा।