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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

ख. अतीत कथा

३०४ [ २.५.२००
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ब्राह्मण-कुल में जन्म ग्रहण कर बड़े हो तक्षशिला गए। वहाँ शिल्प सीख लौट
कर वाराणसी में प्रसिद्ध आचार्य्य हुए।
एक ब्राह्मण की चार लड़कियाँ थीं। वह इसी प्रकार चार जनो को
चाहती थीं। ब्राह्मण ने यह न जानते हुए कि किसे दें सोचा कि आचार्य्य को
पूछ कर जिसे देना योग्य होगा, उसीको दूँगा। उसने आचार्य्य के पास जा
यह प्रश्न पूछते हुए पहली गाथा कही—
सरीरदव्वं वड्ढव्वं सोजच्चं साधु सीलियं
ब्राह्मणन्त्वेव पुच्छाम कम्नु तेसं वणिम्हसे ॥
[ शरीर के सौंदर्य्य वाले को, आयु बडी वाले को, जाति बडी वाले को
वा सदाचारी को ? हे ब्राह्मण ! तुम्हें पूछते है कि उन्हे किसे दें ? ]
सरीरद्वयं आदि से उन चारो में विद्यमान् गुणो का प्रकाशन किया गया
है। अभिप्राय यह है—मेरी लडकियाँ चार प्रकार के आदमियो को चाहती
हैं। उनमें से एक के पास सरीरदव्वं है, शरीर सम्पत्ति है, सौन्दर्य्य है। एक
के पास वढद्वयं वृद्धभाव, ज्येष्ठपन है। एक के पास सोजच्चं अच्छी जाति
वाला होना, जाति सम्पत्ति है। सुजच्चं भी पाठ है। एक के पास साधुसीलियं
सुन्दर चरित्र वाला होना, सदाचार सम्पत्ति है। ब्राह्मणन्त्वेव पुच्छाम;
उनमें से यह अमुक को देनी चाहिए, हम इसका निश्चय न कर सकने के कारण
आप ब्राह्मण को ही पूछते हैं। कम्नु तेसं वणिम्हसे उन चार जनो में से किसका
वरण करें ? किसकी इच्छा करें ? पूछता हूँ कि वे कुमारियाँ किसे दें ?
इसे सुन आचार्य्य ने कहा—"रूप सम्पत्ति आदि विद्यमान रहने,पर भी
दु शील निन्दित है। इसलिए वह ठीक नहीं। हमें शीलवान् ही अच्छा लगता
है।"
इस विचार को प्रकट करने के लिए दूसरी गाथा कही—

साधुसील ] ३०५
अत्यो अत्यि सरीरम्हि वढव्यस्स नमोकरे,
अत्यो अत्यि सुजातम्हि सीलं अस्माकरुच्चति ॥
[ शरीर की भी अपनी विशेषता है, ज्येष्ठ को नमस्कार होता है। सुजात
की भी विशेषता है; लेकिन हमें तो शीलवान् अच्छा लगता है।]
अत्यो अत्यि सरीरम्हि, रूपवान् शरीर में भी अर्थ, विशेषता, उन्नति
होती है। नही होती है, नही कहते। वढव्यस्स नमो करे, ज्येष्ठ को हम
नमस्कार ही करते हैं। ज्येष्ठ की ही वन्दना होती है। अत्यो अत्यि सुजातम्हि,
सुजात पुरुष की भी उन्नति होती है। जाति-सम्पत्ति भी इच्छा करने ही की
चीज़ है। सीलं अस्माकरुच्चति, हमें शील ही अच्छा लगता है। शीलवान्,
सदाचारी शरीर-सौन्दर्य से रहित भी पूज्य प्रशंसनीय होता है।
ब्राह्मण ने उसकी बात सुन सदाचारी को ही लडकियाँ दीं।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यों के अन्त में ब्राह्मण स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय ब्राह्मण यही था; प्रसिद्ध आचार्य्य तो मैं ही था।