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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

की।" इतना कह, उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही-

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नहीं हुआ ?" "भन्ते ! बुद्ध की याद से मन को प्रीति-युक्त कर, पानी के
प्रतिष्ठित हो मैं पृथ्वी को मर्दन करते हुए की तरह आया हूँ।" "उ:
न केवल तूने ही बुद्ध के गुणों का स्मरण कर रक्षा प्राप्त की है। प
समुद्र में नौका के टूटने पर उपासकों ने बुद्ध के गुणों की याद कर रक्ष
की।" इतना कह, उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही-
ख. अतीत कथा
पूर्वं काल में काश्यप सम्यक् सम्बुद्ध के समय में एक स्रोतापन्न
श्रावक, एक नाई गृहस्थ के साथ नौका पर चढ़ा। उस नाई की भार्य्या
नाई को उपासक को सौंपा-आर्य ! इसके सुख दुःख का भार आप र
सातवें दिन वह नौका समुद्र के बीच में टूट गई। वे दोनो जने एक
से चिमटे, एक द्वीप पर पहुँचे। यह नाई पक्षियों को मार कर, पका कर
के समय उपासक को भी देता। यह उपासक 'मुझे नहीं चाहिए" क
न खाता। वह सोचता त्रिरत्न की शरण को छोड़ कर हमारे लिए यह
दूसरा सहारा नहीं। उसने त्रिरत्न के गुणों का स्मरण किया।
उसके स्मरण करते करते उस द्वीप के नागराज ने अपने शरीर की
नौका बनाई। समुद्र-देवता नौका चलाने वाला बना। नौका सात र
भरी गई। तीन मस्तूल थे। इन्द्रनीलमणि की जोतें। सोने के चप्पू।
देवता ने नौका में खड़े होकर घोषणा की—क्या कोई जम्बूद्वीप जाने
है ? उपासक बोला-हम जाएँगे ? तो आ नौका पर चढ़। उसने
पर चढ़ नाई को आवाज दी। समुद्रदेवता ने कहा-तुझे ही जाना मिल
इसे नहीं। क्या कारण है ? कारण यही है कि यह शीलवान् नहीं है
नौका तेरे लिए लाया हूँ। इसके लिए नहीं।
"रहो ! मैं अपने दिए दान का, रक्षा किए गए शील का, तथा भावन
गई भावना का इसे हिस्सेदार बनाता हूँ।"
"स्वामी ! मैं अनुमोदन करता हूँ।"
"अब ले चलूँगा" कह देवता ने उसे भी चढ़ा, दोनों जनों को समुद्र
निकाल, नदी से वाराणसी पहुँचा अपने प्रभाव से उन दोनों के घर पर धन प

¸ सीलानिसंस ] २७५
दिया। फिर, 'पण्डित की ही संगति करनी चाहिए। यदि इस नाई की इस
उपासक के साथ संगति नहीं होती, तो यह समुद्र के बीच म ही नष्ट हो जाता,
कहते हुए देवता न पण्डित की संगति की महिमा बखानते हुए यह दो गाथाएँ
कहीं—
पस्स सद्धाय सीलस्स चागस्स च अय फल
नागो नावाव वण्णेन सद्ध वहति उपासक ॥
सद्धिरेव समासेय सन्भि कुब्बेथ सय्यव
सत हि सन्निवासेन सोत्थि गच्छति नहापितो ॥
[ श्रद्धा, शील और त्याग के इस फल को देखो । नाग नौका की शक्ल बना
कर श्रद्धावान् उपासक का वहन करता है। सत्पुरुष के साथ रहे, सत्पुरुष के
ही साथ दोस्ती कर । सत्पुरुष के साथ रहन से नाई कल्याण को प्राप्त होता है । ]
पस्स किसी विशष को सम्बोधा न कर केवल देखने को कहता है।
सद्धाय लौकिक तथा लोकोत्तर श्रद्धा स । शील में भी इसी प्रकार । चगस्स
दान का त्याग तथा चित्तमैल का त्याग। अय फल यह फल। गुण या परि-
णाम अर्थ है। अथवा त्याग के फल को देखो। यह नाग नौका की शक्ल में,
यह अर्थ भी समझना चाहिए। नावाव वण्णेन नौका के आकार से। सद्ध
तीन रत्नो में प्रतिष्ठित श्रद्धा । सन्भिरेव पण्डितो के ही साथ। समासेय
एक साथ रह निवास कर यही अर्थ है। कुब्बेथ, कर। सन्थव मित्रता,
तृष्णा-पूर्ण दोस्ती तो किसी से न करनी चाहिए। नहापितो—नाई गृहस्थ।
न्हापितो यह भी पाठ है।
इस प्रकार समुद्र देवता आकाश में ठहर, धर्मोपदेश दे तथा नसीहत कर,
नागराजा को साथ ल अपने विमान को ही चला गया।
शास्ता न यह धर्मदेशना ला, आर्य-सत्यो को प्रकाशित कर जातक का
मेल बैठाया। आर्य-सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर उपासक सकृदा-
गामीफल म प्रतिष्ठित हुआ । तब स्त्रोतापन्न उपासक परिनिर्वाण को प्राप्त
हुआ। नागराजा सारिपुत्त ! समुद्रदेवता तो मैं ही था।