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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

About this granth

The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.

The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.

The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.

सूक्त-११४ देवता—अग्नि

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वैश्वानरेण सयुजा सजोषास्तान् प्रतीचो निर्दह जातवेदः.. (२)
हे अग्नि! जो शत्रु हमें सोते हुए मारना चाहता है, जो हमें जागते हुए मारना चाहता है,
जो शत्रु हमें बैठे हुए मारना चाहता है तथा जो शत्रु हमें चलते हुए मारना चाहता है, हे अग्नि!
तुम जठराग्नि से मिल कर और समान प्रीति वाले बन कर हमें मारने के लिए सामने आते हुए
शत्रुओं को जलाओ. (२)
सूक्त-११४ देवता—अग्नि
इदमुग्राय बभ्रवे नमो यो अक्षेषु तनूवशी.
घृतेन कलिं शिक्षामि स नो मृडातीदृशे.. (१)
अधिक बलशाली एवं मटमैले रंग वाले उस देव को नमस्कार है जो जुए में विजय प्राप्त
कराता है. वह जुए में पासों से इच्छानुसार विजय दिलाने वाला है. मंत्र युक्त घृत के द्वारा मैं
कलि अर्थात पराजय देने वाले पांच अंकों को नष्ट करता हूं. नमस्कार से प्रसन्न जुए का देव
इस प्रकार के जय लक्षण फल के द्वारा हमें सुखी करें. (१)
घृतमप्सराभ्यो वह त्वमग्ने पांसूनक्षेभ्यः सिकता उपश्व.
यथाभागं हव्यदातिं जुषाणा मदन्ति देवा उभयानि हव्या.. (२)
हे अग्नि! तुम हमारी विजय के लिए अंतरिक्ष में घूमने वाली अप्सराओं को आज्य
अर्थात् घृत पहुंचाओ तथा हमारे विरोधी जुआरियों के लिए सूक्ष्म धूल के कण, शकर और
जल पहुंचाओ, जिस से वे पराजित हों. अपनेअपने भाग के अनुसार हवि प्राप्त करते हुए देव
दो प्रकार के हवि से अर्थात् सोम और घृत से तृप्त होते हैं. (२)
अप्सरसः सधमादं मदन्ति हविर्धानमन्तरा सूर्यं च.
ता मे हस्तौ सं सृजन्तु घृतेन सपत्नं मे कितवं रन्धयन्तु.. (३)
जुए की देवियां अप्सराएं भूलोक और अंतरिक्षलोक में एक साथ प्रसन्न होती हैं. वे
अप्सराएं मेरे दोनों हाथों को जय लक्षण फल से संयुक्त करें तथा मेरे विरोधी जुआरी को मेरे
वश में करें. (३)
आदिनवं प्रतिदीव्ने घृतेनास्माँ अभि क्षर.
वृक्षमिवाशन्या जहि यो अस्मान् प्रतिदीव्यति.. (४)
मैं अपने विरोधी जुआरी को जीतने के लिए पासों के द्वारा जुआ खेलता हूं. हे जुए से
संबंधित देवियो! मुझे सारपूर्ण विजय से युक्त कराओ. जो जुआरी मुझे जीतने के लिए मेरे
विरोध में जुआ खेलता है, उस का उसी प्रकार विनाश करो, जिस प्रकार बिजली सूखे वृक्ष
का विनाश कर देती है. (४)
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यो नो द्युवे धनमिदं चकार यो अक्षाणां ग्लहनं शेषणं च.
स नो देवो हविरिदं जुषाणो गन्धर्वेभिः सधमादं मदेम.. (५)
जिस देव ने जुआ खेलते हुए लोगों को विरोधी जुआरी की हार के रूप में धन दिलाया
है तथा जिस देव ने विरोधी जुआरी के पासों का ग्रहण और विरोध में दमन किया है, वह देव
हमारी इस हवि को स्वीकार करे. हम जुए के देवों अर्थात् गंधर्वों के साथ प्रसन्न रहें. (५)
संवसव इति वो नामधेयमुग्रंपश्या राष्ट्रभृतो ह्य१क्षाः.
तेभ्यो व इन्द्वो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (६)
हे गंधर्वो अर्थात् जुए के पासो! तुम वसु अर्थात् धन प्राप्त कराते हो, इसलिए तुम्हारा
नाम संवसु है. क्योंकि पासे उग्रंपश्या राष्ट्रभृत नामक दो अप्सराओं से संबंधित हैं, इसलिए
हम उन गंधर्वों अथवा पासों के लिए सोमयुक्त हवि प्रयुक्त करते हैं. इस के पश्चात जुआ
खेलते हुए हम धनों के स्वामी बनें. (६)
देवान् यन्नाधितो हुवे ब्रह्मचर्यं यदूषिम.
अक्षान् यद् बभ्रूनालभे ते नो मृडन्त्वीदृशे.. (७)
मैं दुःखी हो कर अग्नि आदि देवों को धन लाभ के हेतु बुलाता हूं. मैं ने वेदमंत्रों के ग्रहण
के नियमों का पालन किया है तथा मैं मटमैले रंग के पासों को जुआ खेलने के लिए निर्मित
कर रहा हूं इसलिए जुए के अधिष्ठाता देव जय लक्षण फल के द्वारा हमें सुखी करें. (७)
सूक्त-११५ देवता—इंद्र, अग्नि
अग्न इन्द्रश्च दाशुषे हतो वृत्राण्यप्रति. उभा हि वृत्रहन्तमा.. (१)
हे अग्नि और इंद्र! तुम हवि देने वाले यजमान के पापों को पूर्ण रूप से नष्ट करो,
क्योंकि तुम दोनों अर्थात् अग्नि और इंद्र ने वृत्र का वध किया है. (१)
याभ्यामजयन्त्स्व १ र्ग्य एव यावातस्थतुर्भुवनानि विश्वा.
प्रचर्षणी वृषणा वज्रबाहू अग्निमिन्द्रं वृत्रहणा हुवे ऽ हम्.. (२)
पूर्वजों ने जिन अग्नि और इंद्र की सहायता से स्वर्ग को अपने अधीन किया है, जिन
अग्नि और इंद्र ने सारे लोकों को अपनी महिमा से व्याप्त कर लिया है तथा जो अपने
उपासकों के कर्म के फल को विशेष रूप से देखते हैं, उन्हें मनचाहा फल देने वाले, हाथों में
वज्र धारण करने वाले तथा वृत्र हंता अग्नि और इंद्र को मैं विजय पाने के लिए बुलाता हूं.
(२)
उप त्वा देवो अग्रभीच्चमसेन बृहस्पतिः.
इन्द्र गीर्भिर्न आ विश यजमानाय सुन्वते.. (३)
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सूक्त-११६ देवता—वृषभ

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हे इंद्र! तुम्हें बृहस्पति देव ने सोमपान के द्वारा अन्यत्र जाने से रोक दिया है. हे इंद्र! तुम
सोम निचोड़ने वाले यजमान को धन आदि से पुष्ट करने के लिए हम स्तोताओं की स्तुतियां
सुन कर आओ. (३)
सूक्त-११६ देवता—वृषभ
इन्द्रस्य कुक्षिरसि सोमधान आत्मा देवानामुत मानुषाणाम्.
इह प्रजा जनय यास्त आसु या अन्यत्रेह तास्ते रमन्ताम्.. (१)
हे छोड़े गए बैल! तुम सोम के आधार और इंद्र के उदर हो. तुम देवों और मनुष्यों के
शरीर हो. तुम इस लोक में संतान उत्पन्न करो. सामने उपस्थित इस गांव में अथवा तुम्हारे
निमित्त जो गाएं अन्यत्र विद्यमान हैं, उन में तुम्हारी प्रजाएं सुख से विहार करें. (१)
सूक्त-११७ देवता—जल
शुम्भनी द्यावापृथिवी अन्तिसुम्ने महिव्रते.
आपः सप्त सुस्रुवुर्देवीस्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१)
शोभाकारिणी, द्यावा पृथिवी के मध्य जो अज्ञानावृत जन चेतन और अचेत की मध्यवर्ती
दशा में वर्तमान हैं, वे सात प्रकार के दिव्य जल बरसाते हैं. ऐसे द्यावा पृथिवी हमें पाप कर्म से
बचाएं. (१)
मुञ्चन्तु मा शपथ्या ३ दथो वरुण्या दुत.
अथो यमस्य पड्वीशाद् विश्वस्माद् देवकिल्बिषात्.. (२)
जल अथवा ओषधियां मुझे ब्राह्मण के आक्रोश से उत्पन्न पाप से तथा असत्य भाषण
के कारण लगने वाले पाप से छुड़ाएं. वे यम के पाशों से तथा देव संबंधी सभी पापों से मुझे
बचाएं. (२)
सूक्त-११८ देवता—तृष्टिका
तृष्टिके तृष्टवन्दन उदमूं छिन्धि तृष्टिके. यथा कृतद्विषासो ऽ मुष्मै
शैप्यावते.. (१)
हे तृष्टिका अर्थात् दाह उत्पन्न करने वाली वाणापर्ण्य नामक जड़ीबूटी तथा हे दाह
उत्पन्न करने वाली तृष्टवंदना नामक जड़ीबूटी! इस स्त्री को भोक्ता पुरुष से बलपूर्वक दूर
करो. हे कोक उत्पन्न करने वाली जड़ीबूटी तृष्टिका! प्रजनन एवं संभोग में सक्षम इस पुरुष के
लिए तू द्वेष करने वाली बन. (१)
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तृष्टासि तृष्टिका विषा विषातक्यसि. परिवृक्ता यथासस्यृषभस्य वशेव..
(२)
हे तृष्टिका नामक जड़ीबूटी! तेरा स्वभाव दाह उत्पन्न करना है. जिस प्रकार तू विष
स्वरूपा एवं विष का संयोग करने वाली है तथा जिस प्रकार तू सभी के द्वारा वर्जित है, जिस
प्रकार बांझ गाय सांड के लिए त्याज्य होती है, उसी प्रकार वह नारी पुरुष के लिए विष
रूपिणी हो. (२)
सूक्त-११९ देवता—अग्नि, सोम
आ ते ददे वक्षणाभ्य आ ते ऽ हं हृदयाद् ददे.
आ ते मुखस्य संकाशात् सर्वं ते वर्च आ ददे.. (१)
हे नारी! मैं तेरी योनि एवं जांघों के तेज का अपहरण करता हूं. हे नारी! मैं तेरे स्वस्थ
मन से साधु पुरुष के ध्यान रूपी तेज का अपहरण करता हूं. मैं तेरे मुख से सब को प्रसन्न
करने वाले तेज का अपहरण करता हूं. अधिक क्या कहूं, मैं तेरे सभी अंगों से सौभाग्य रूपी
तेज का अपहरण करता हूं. (१)
प्रेतो यन्तु व्याध्यः प्रानुध्याः प्रो अशस्तयः.
अग्नी रक्षस्विनीर्हन्तु सोमो हन्तु दुरस्यतीः.. (२)
मानसिक व्याधियां इस गृह के पीड़ित पुरुष से दूर चली जाएं तथा मानसिक व्याधियों
से संबंधित लगातार स्मरण भी इस से दूर हो जाए. दूसरों के द्वारा होने वाली निंदा एवं हिंसा
भी इस से दूर रहे. अग्नि देव राक्षसों और राक्षसियों का विनाश करें तथा सोमदेव दूसरों द्वारा
होने वाली बुरी इच्छाओं को इस से दूर करें. (२)
सूक्त-१२० देवता—सविता
प्र पतेतः पापि लक्ष्मि नश्येतः प्रामुतः पत.
अयस्मयेनाङ्केन द्विषते त्वा सजामसि.. (१)
हे पाप रूपिणी लक्ष्मी अर्थात् दरिद्रता! तू इस प्रदेश से दूर चली जा. तू इस प्रदेश में
दिखाई मत दे तथा इस प्रदेश से बहुत दूर चली जा. मैं तुझे अपने शत्रु के साथ लोहे के कांटों
से बांधता हूं. (१)
या मा लक्ष्मीः पतयालूरजुष्टा ऽ भिचस्कन्द वन्दनेव वृक्षम्.
अन्यत्रास्मत् सवितस्तामितो धा हिरण्यहस्तो वसु नो रराणः.. (२)
वंदना नाम की लताविशेष जिस प्रकार वृक्ष को चारों ओर से लपेट लेती है, उसी प्रकार
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दुर्गति करने वाली तथा प्रिय न लगने वाली दरिद्रता ने मुझे सभी ओर से घेर लिया है. हे
सविता देव! इस दरिद्रता को मुझ से एवं मेरे प्रदेश से अन्यत्र स्थापित करो. हाथों में सोना
लिए हुए सविता ने हमें धन दिया है. (२)
एकशतं लक्ष्म्यो ३ मर्त्यस्य साकं तन्वा जनुषो ऽ धि जाता:.
तासां पापिष्ठा निरित: प्र हिण्म: शिवा अस्मभ्यं जातवेदो नि यच्छ.. (३)
एक सौ लक्ष्मियां मनुष्य के जन्म के साथ ही उत्पन्न होती हैं. उन में से अतिशय पापिष्ठ
लक्ष्मी को हम इस प्रदेश से दूर भेजते हैं. हे जन्म लेने वालों के ज्ञाता अग्नि देव! उन लक्ष्मियों
में जो मंगलकारिणी हैं, उन्हें हमारे साथ स्थापित करो. (३)
एता एना व्याकरं खिले गा विष्ठिता इव.
रमन्तां पुण्या लक्ष्मीर्या: पापीस्ता अनीनशम्.. (४)
मैं इन बताई गई एक सौ लक्ष्मियों को उसी प्रकार विभाजित कर के दो भागों में रखता
हूं जिस प्रकार गोशाला में बैठी हुई गायों को ग्वाला विभाजित करता है. पुण्य लक्ष्मियां मुझ
में सुख से निवास करें और पापकारिणी लक्ष्मियां मुझ से दूर चली जाएं. (४)
सूक्त-१२१ देवता—चंद्रमा
नमो रूराय च्यवनाय नोदनाय धृष्णवे.
नम: शीताय पूर्वकामकृत्वने.. (१)
शरीर का पसीना गिराने वाले, प्रेरक एवं सहन करने वाले, उष्णिग् ज्वर से संबंधित देव
को नमस्कार है. अभिलाषाओं का विनाश करने वाले शीत ज्वर से संबंधित देव को नमस्कार
है. (१)
यो अन्येद्युरुभयद्युरभ्येतीमं मण्डूकमभ्ये त्वव्रतः.. (२)
जो ज्वर दूसरे अथवा चौथे दिन आता है, वह नियमहीन ज्वर मेढक के पास चला जाए.
(२)
सूक्त-१२२ देवता—इंद्र
आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभि:.
मा त्वा केचिद् वि यमन् विं न पाशिनो ऽ ति धन्वेव तां इहि.. (१)
हे इंद्र! स्तुति करने वाले योग्य एवं मोरों के समान रोमों वाले घोड़ों की सहायता से यहां
आओ. हे इंद्र! कोई भी स्तोता अपनी स्तुतियों के द्वारा तुम्हें उस प्रकार न रोके, जिस प्रकार
पक्षियों को पकड़ने वाला चिड़ीमार पक्षियों को रोकता है. जिस प्रकार प्यासा यात्री जल वाले
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सूक्त-१२३ देवता—सोम, वरुण

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स्थान पर जाता है, उसी प्रकार दूसरे स्तुतिकर्ताओं का अतिक्रमण कर के तुम शीघ्र हमारे
पास आओ. (१)
सूक्त-१२३ देवता—सोम, वरुण
मर्माणि ते वर्मणा छादयामि सोमस्त्वा राजा ऽ मृतेनानु वस्ताम्.
उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वा ऽ नु देवा मदन्तु.. (१)
हे विजय के इच्छुक राजा! मैं तेरे मर्मस्थानों को कवच से ढकता हूं. सोम राजा तुझे
अपने अविनाशी तेज से आच्छादित करें. वरुण देव तेरे लिए अधिक सुख दें. इंद्र आदि सभी
देव शत्रु सेना को भयभीत करते हुए तुझे हर्षित करें. (१)
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सूक्त-१ देवता—आयु

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आठवां कांड
सूक्त-१ देवता—आयु
अन्तकाय मृत्यवे नमः प्राणा अपाना इह ते रमन्ताम्.
इहायमस्तु पुरुषः सहासुना सूर्यस्य भागे अमृतस्य लोके.. (१)
सभी प्राणियों का विनाश करने वाले मृत्यु को नमस्कार है. हे ब्रह्मचारी! प्राण और
अपान वायु तेरे शरीर में रमण करें. यह पुरुष प्राणों से युक्त हो. यह सूर्य प्रदेश में, भूलोक में
एवं अमृतलोक में वर्तमान रहे. (१)
उदेनं भगो अग्रभीदुदेनं सोमो अंशुमान्.
उदेनं मरुतो देवा उदिन्द्राग्नी स्वस्तये.. (२)
भग नामक अदिति पुत्र ने इस मूर्च्छित पुरुष का उद्धार किया है. अमृतमयी किरणों से
सोम ने इस का उद्धार किया है. मरुत् देवों ने एवं अग्नि ने क्षेम के लिए इस का उद्धार किया
है. (२)
इह ते ऽ सुरिह प्राण इहायुरिह ते मनः.
उत् त्वा निर्ऋत्याः पाशेभ्यो दैव्या वाचा भरामसि.. (३)
हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! तेरी प्राण वायु एवं चक्षु आदि इंद्रियां तेरे शरीर में
निवास करें. तेरी आयु एवं मन भी तेरे इसी शरीर में रहें. हम निर्ऋति नामक पाप देवता के
बंधनों से अपने मंत्रों द्वारा तेरा उद्धार करते हैं. (३)
उत् क्रामातः पुरुष माव पत्था मृत्योः पड्बीशमवमुञ्चमानः.
मा च्छित्था अस्माल्लोकादग्नेः सूर्यस्य संदृशः.. (४)
हे पुरुष! तू मृत्यु के उन पाशों से छूट जा एवं पतन से बच. मृत्युदेव के पाश तेरे पैरों को
बांधने वाले हैं. तू उन्हें काटता हुआ भूलोक से अलग मत हो. तू अग्नि और सूर्य का दर्शन
करने के लिए इस लोक में रह. (४)
तुभ्यं वातः पवतां मातरिश्वा तुभ्यं वर्षन्त्वमृतान्यापः.
सूर्यस्ते तन्वे ३ शं तपाति त्वां मृत्युर्दयतां मा प्र मेष्ठाः.. (५)
हे मरण के समीप पहुंचे हुए पुरुष! वायु तेरे सुख के लिए चले. जल तेरे लिए अमृत की
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वर्षा करे. सूर्य देव तेरे शरीर को सुख देने के लिए तपें. हे पुरुष! मृत्यु देव तुझ पर दया करें.
(५)
उद्यानं ते पुरुष नावयानं जीवातुं ते दक्षतातं कृणोमि.
आ हि रोहेमममृतं सुखं रथमथ जिर्विर्विदथमा वदासि.. (६)
हे पुरुष! मैं तेरे जीवन के लिए ओषधियों का निर्माण करता हूं तथा तुझे बल प्रदान
करता हूं. मृत्यु के पाशों से तेरा छुटकारा हो, तू उन पाशों में न फंसे. तू समाप्त न होने वाले
तथा इंद्रिय सुख के अनुकूल शरीर रूपी रथ पर बैठ. इस शरीर रूपी रथ पर बैठ कर तू कह
कि मुझे चेतना प्राप्त हो गई है. (६)
मा ते मनस्तत्र गान्मा तिरो भून्मा जीवेभ्यः प्र मदो मानु गाः पितॄन्.
विश्वे देवा अभि रक्षन्तु त्वेह.. (७)
तेरा मन यमराज के विषय में न जाए तथा तेरा मन विलीन भी न हो. तू अपने बंधुओं के
प्रति असावधान न रहे. तू मरे हुए पूर्वजों का अनुगमन मत कर. इंद्र आदि देव इसी शरीर में
तेरा पालन करें. (७)
मा गतानामा दीधीथा ये नयन्ति परावतम्.
आ रोह तमसो ज्योतिरेह्या ते हस्तौ रभामहे.. (८)
तू पितृलोक में गए हुओं के मार्ग का ध्यान मत कर तथा मृत पूर्वजों के लिए मत रो. मरे
हुए लोग तुझे भी यहां से दूर देश में ले जाएंगे. तू अंधकार को त्याग कर प्रकाश में स्थित हो.
हम अंधकार से प्रकाश में ले जाने के लिए तेरे हाथ पकड़ते हैं. (८)
श्यामश्च त्वा मा शबलश्च प्रेषितौ यमस्य यौ पथिरक्षी श्वानौ.
अर्वाङेहि मा वि दीध्यो मात्र तिष्ठः पराङ्मनाः.. (९)
हे मरने के समीप पहुंचे हुए पुरुष! यमराज के मार्ग के रक्षक दो कुत्ते हैं— एक काला
और दूसरा चितकबरा. वे दोनों तुझे बाधा न पहुंचाएं. कुत्तों के काटने से बच कर तू हमारी
ओर आ. तू मृत पुरुषों का ध्यान मत कर तथा इसी भूलोक में निवास करता हुआ एक बार
भी वहां से विमुख मत हो. (१)
मैतं पन्थामनु गा भीम एष येन पूर्वं नेयथ थं ब्रवीमि.
तम एतत् पुरुष मा प्र पत्था भयं परस्तादभयं ते अर्वाक्.. (१०)
हे प्राणहीन पुरुष! तू मरे हुए लोगों के मार्ग पर गमन मत कर. वह मार्ग भयानक है. मैं
तुझे उस मार्ग के विषय में बताता हूं, जिस मार्ग से लोग मृत्यु से पूर्व नहीं जाते हैं. तू इस
मृत्युरूपी अंधकार में प्रवेश मत कर, क्योंकि यमराज की नगरी में प्रवेश करने पर भय प्रतीत
होता है. हमारी ओर आने में तुझे अभय मिलेगा. (१०)
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रक्षन्तु त्वा ऽ ग्नयो ये अप्स्व १ न्ता रक्षतु त्वा मनुष्या ३ यमिन्धते.
वैश्वानरो रक्षतु जातवेदा दिव्यस्त्वा मा प्र धाग् विद्युता सह.. (११)
जल के मध्य में जो वाडव आदि अग्नियां हैं, वे तेरी रक्षा करें. मनुष्य यज्ञ करने के लिए
अथवा भोजन पकाने के लिए जिन अग्नियों को जलाते हैं, वे तेरी रक्षा करें. जन्म लेने वालों
को जानने वाले जठराग्नि देव तेरी रक्षा करें. आकाश की बिजली तेरे शरीर के साथ रहती हुई
तुझे भस्म न करे. (११)
मा त्वा क्रव्यादभि मंस्तारात् संकसुकाच्चर.
रक्षतु त्वा द्यौ रक्षतु पृथिवी सूर्यश्च त्वा रक्षतां चन्द्रमाश्च.
अन्तरिक्षं रक्षतु देवहेत्या:.. (१२)
मांस का नाश करने वाली अग्नि तुझे अपना आहार बनाने का विचार न करे. तू सब का
भक्षण करने वाली अग्नि से दूर देश में विचरण कर. पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चंद्रमा तथा
अंतरिक्ष देव के आयुध से तेरी रक्षा करें. (१२)
बोधश्च त्वा प्रतीबोधश्च रक्षतामस्वप्नश्च त्व ऽ नवद्राणश्च रक्षताम्.
गोपायंश्च त्वा जागृविश्च रक्षताम्.. (१३)
गोबोध और प्रतिबोध नामक ऋषि तेरी रक्षा करें. स्वप्न न देखने वाला, निद्रा न लेने
वाला, सदा शरीर की रक्षा करने वाला तथा जागने वाला देव – ये सब तेरी रक्षा करें. (१३)
ते त्वा रक्षन्तु ते त्वा गोपायन्तु तेभ्यो नमस्तेभ्यः स्वाहा.. (१४)
बोध आदि तेरा पालन करें और तेरी रक्षा करें. उन बोध आदि को नमस्कार है. यह हवि
उन के लिए उत्तम आहुति वाला हो. (१४)
जीवेभ्यस्त्वा समुद्रे वायुरिन्द्रो धाता दधातु सविता त्रायमाणः.
मा त्वा प्राणो बलं हासीदसुं ते ऽ नु ह्वयामसि.. (१५)
जीवनोपयोगी इंद्रियों के लिए एवं पुत्र, पत्नी, दास आदि की प्रसन्नता के लिए वायु, इंद्र,
धाता एवं सविता तुझे मृत्यु से छीन कर हमें प्रदान करें. तेरी रक्षा करते हुए सविता देव तेरे
प्राणों और शरीर के बल को तुझ से न छीनें. मैं तेरे प्राणों के अनुकूल उन का आह्वान करता
हूं. (१५)
मा त्वा जम्भः संहनुर्मा तमो विदन्मा जिह्वा बर्हिः प्रमयुः कथा स्याः.
उत् त्वादित्या वसवो भरन्तूदिन्द्राग्नी स्वस्तये.. (१६)
हे पुरुष! तुझे भक्षण करने के लिए मिले हुए दांतों वाला जंभ असुर न आए. अज्ञान
अथवा अंधकार भी तुझे प्राप्त न करे. तेरी विस्तृत जीभ राक्षसों का वर्णन न करे. जिस
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प्रकार तू हिंसा रहित बने, उसे जंभ असुर न जाने. अदिति पुत्र देव तुझे मृत्यु से छुड़ाएं. आठ
वसु इंद्र और अग्नि कल्याण के लिए तेरा उद्धार करें. (१६)
उत् त्वा द्यौरुत् पृथिव्युत् प्रजापतिरग्रभीत्.
उत् त्वा मृत्योरोषधयः सोमराज्ञीरपीपरन्.. (१७)
द्यौ देवता एवं पृथ्वी तेरा भरणपोषण करें. सभी देवों के पिता प्रजापति ने तेरा उद्धार
किया था. सोम की पत्नियों और जड़ीबूटियों ने मृत्यु से तुझे छुड़ाया था. (१७)
अयं देवा इहैवास्त्वयं मा ऽ मुत्र गादितः.
इमं सहस्रवीर्येण मृत्योरुत् पारयामसि.. (१८)
हे आदित्य आदि देवो! यह पुरुष यहीं भूलोक में रहे. यह पुरुष इस भूलोक से स्वर्ग में न
जाए. हम रक्षा करने वाले तुझ पुरुष को असीमित शक्ति के रक्षा विधान द्वारा मृत्यु से छीनते
हैं. (१८)
उत् त्वा मृत्योरपीपरं सं धमन्तु वयोधसः.
मा त्वा व्यस्तकेश्यो ३ मा त्वा ऽ घरुदो रुदन्.. (१९)
हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! अन्न के देव धाता तुझे मृत्यु से बचाएं एवं तेरा
उद्धार करें. बिखरे हुए केशों वाले बांधव एवं नारियां तेरी मृत्यु पर न रोएं. तेरे संबंधी दुःख के
कारण न रोएं. (१९)
आहार्षमविदं त्वा पुनरागाः पुनर्णवः.
सर्वाङ्ग सर्वं ते चक्षुः सर्वमायुश्च ते ऽ विदम्... (२०)
हे मृत्यु के द्वारा पकड़े हुए पुरुष! मैं ने तुझे मृत्यु से छीन लिया है और इस प्रकार तुझे
प्राप्त किया है. हे पुनः जन्म लेने वाले! तू संसार में दोबारा आया है. हे संपूर्ण अंगों वाले! तेरी
चक्षु आदि इंद्रियां अपनेअपने विषय का प्रकाशन करने वाली हों. मैं ने तेरी सौ वर्ष की आयु
प्राप्त कर ली है. (२०)
व्यवात् ते ज्योतिरभूदप त्वत् तमो अक्रमीत्.
अप त्वन्मृत्युं निर्ऋतिमप यक्ष्मं नि दध्मसि.. (२१)
हे अचेतन पुरुष! तेरी अचेतना निकल गई है. तुझे जीवनरूपी प्रकाश प्राप्त हो गया है.
मैं ने तुझ से मृत्यु की देवता निर्ऋति को दूर कर दिया है. मैं तेरे बाहरी और आंतरिक रोगों का
भी विनाश करता हूं. (२१)
सूक्त-२ देवता—आयु
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आ रभस्वेमाममृतस्य श्रुष्टिंमच्छिद्यमाना जरदष्टिरस्तु ते.
असुं ते आयुः पुनरा भरामि रजस्तमो मोप गा मा प्र मेष्ठाः.. (१)
हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! तुम हमारे द्वारा किए जाते हुए अमरण संबंधी
अनुष्ठान को अनुभव करो. तुम्हारा शरीर शत्रुओं के द्वारा छिन्नभिन्न न होने वाला तथा
वृद्धावस्था को प्राप्त करने वाला हो. इस के लिए मृत्यु से छीने गए तेरे प्राणों को मैं पुनः आयु
से भरता हूं. तू सत्व गुण के प्रतिबंधक रजोगुण और तमोगुण को प्राप्त न हो. तू हिंसा को भी
प्राप्त न हो. (१)
जीवतां ज्योतिरभ्येह्यर्वाङा त्वा हरामि शतशारदाय.
अवमुञ्चन् मृत्युपाशानशस्तिं द्राघीय आयुः प्रतरं ते दधामि.. (२)
हे पुरुष! तू मनुष्यों की ज्ञान दीप्ति प्राप्त कर के हमारे सामने आ. हम तुझे सौ संवत
तक जीने के लिए मृत्यु से छीन लाए हैं. मृत्यु के ज्वर, सिरदर्द आदि पाशों से हम ने तुझे
छुड़ाया है. हम तुझे निंदा से मुक्त करते हुए सौ वर्ष की दीर्घ आयु में अत्यधिक रूप से
स्थापित करते हैं. (२)
वातात् ते प्राणमविदं सूर्याच्चक्षुरहं तव.
यत् ते मनस्त्वयि तद् धारयामि सं वित्स्वाङ्गैर्वद जिह्वयालपन्.. (३)
हे प्राणरहित पुरुष! मैं ने तुम्हारे प्राणों को वायु से प्राप्त किया है. मैं ने तुम्हारे चक्षु को
सूर्य से प्राप्त किया है तथा मैं तुम्हारे मन को तुम्हीं में धारण करता हूं. इस प्रकार तुम सभी
अंगों से युक्त हो कर एवं जीभ से बोलते हुए व्यक्त उच्चारण करो. (३)
प्राणेन त्वा द्विपदां चतुष्पदामग्निमिव जातमभि सं धमामि.
नमस्ते मृत्यो चक्षुषे नमः प्राणाय ते ऽ करम्.. (४)
हे प्राणहीन पुरुष! मैं दो पैरों वाले अर्थात् स्त्रीपुरुषों और चार पैरों वाले अर्थात् गाय,
घोड़े आदि पशुओं के प्राणों से तुझे इस प्रकार संयुक्त करता हूं, जिस प्रकार अरणि मंथन से
अग्नि उत्पन्न होती है. हे मृत्यु! मैं ने तेरे क्रूर नेत्र के लिए नमस्कार किया है तथा तेरे अत्यधिक
बल के लिए भी मैं नमस्कार करता हूं. (४)
अयं जीवतु मा मृतेमं समीरयामसि.
कृणोम्यस्मै भेषजं मृत्यो मा पुरुषं वधीः.. (५)
यह प्राणहीन पुरुष जीवित रहे. यह मरण को प्राप्त न हो. हम इसे चेष्टा करने के लिए
प्रेरित करते हैं. हम इस मरने वाले पुरुष की चिकित्सा करते हैं. हे मृत्यु! तू इस का वध मत
कर. (५)
जीवलां नघारिषां जीवन्तीमोषधीमहम्.
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त्रायमाणां सहमानां सहस्वतीमिह हुवे ऽ स्मा अरिष्टतातये.. (६)
जीवन देने वाली, रोष रहित, सेवन करने वाले की रक्षिका, रोग को पराजित करने
वाली एवं शक्ति संपन्न जीवंती अर्थात् ग्वारपाठा नामक जड़ीबूटी को व्याधियों के नाश का
इच्छुक मैं इस शांति कर्म के लिए बुलाता हूं. वह इस समीपवर्ती पुरुष का रोग निवारण करे.
(६)
अधि ब्रूहि मा रभथाः सृजेमं तवैव सन्त्सर्वहाया इहास्तु.
भवाशर्वौ मृडतं शर्म यच्छतमपसिध्य दुरितं धत्तमायुः.. (७)
हे मृत्यु! तुम इस के पक्षपात का वचन कहो. अर्थात् बोलो कि यह मेरा है. तुम इसे
मारने का आरंभ मत करो. यह तुम्हारा ही जन है. यह भूलोक में सर्वत्र गति वाला बने. हे भव
और शर्व! तुम इसे सुखी करो तथा इस के कल्याण का प्रयत्न करो. तुम इस के व्याधि रूपी
पाप को निकाल कर इस में आयु को स्थापित करो. (७)
अस्मै मृत्यो अधि ब्रूहीमं दयस्वोदितो ३ यमेतु.
अरिष्टः सर्वाङ्गः सुश्रुज्जरसा शतहायन आत्मना भुजमश्रुताम्.. (८)
हे मृत्यु! यह तुम से भयभीत है. तुम इसे बताओ कि यह तुम्हारी कृपा के योग्य है. तुम
इस पर दया करो. यह अहिंसित, चक्षु आदि सभी अंगों से युक्त, उत्तम श्रोता एवं वृद्धावस्था
पा कर सौ वर्षों तक अन्य जनों की अपेक्षा अधिक भोग प्राप्त करे. (८)
देवानां हेतिः परि त्वा वृणक्तु पारयामि त्वा रजस उत् त्वा मृत्योरपीपरम्.
आरादग्निं क्रव्यादं निरूहं जीवातवे ते परिधिं दधामि.. (९)
रुद्र आदि देवों का आयुध तुम्हारी हिंसा न करे. मैं मूर्च्छा लक्षण वाले आवरण से तुम्हें
अलग करता हूं. मैं मृत्यु के पाश से तुम्हारा उद्धार करता हूं. मैं मांस खाने वाली अग्नि को
तुझ से दूर निकालता हूं तथा तेरे जीवन के लिए परकोटे के रूप में यज्ञ की अग्नि को धारण
करता हूं. (९)
यत् ते नियानं रजसं मृत्यो अनवधर्ष्यम्.
पथ इमं तस्माद् रक्षन्तो ब्रह्मास्मै वर्म कृण्मसि.. (१०)
हे मृत्यु! तेरे रजोमय मार्ग को कोई धर्षित नहीं कर सकता. उस मार्ग से मैं इस मृत्यु के
समीप पहुंचे हुए पुरुष के लिए मनन रूपी कवच पहनाता हूं. (१०)
कृणोमि ते प्राणापानौ जरां मृत्युं दीर्घमायुः स्वस्ति.
वैवस्वतेन प्रहितान् यमदूतांश्चरतो ऽ प सेधामि सर्वान्.. (११)
हे आयु को चाहने वाले पुरुष! मैं तेरे शरीर में प्राण और अपान वायु को स्थिर करता हूं.
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मैं ऐसा उपाय करता हूं, जिस से बुढ़ापा और मृत्यु तुझे न छू सकें. मैं तेरी आयु का विस्तार
कर के तेरा कल्याण करता हूं तथा यमराज के द्वारा भेजे हुए एवं सभी जगह घूमते हुए
यमदूतों को तुझ से दूर करता हूं. (११)
आरादरातिं निर्ऋतिं परो ग्राहिं क्रव्यादः पिशाचान्.
रक्षो यत् सर्वं दुर्भूतं तत् तम इवाप हन्मसि.. (१२)
शत्रु बनी हुई एवं आगे आ कर पकड़ने वाले पाप देवता निर्ऋति का मैं समीप से हनन
करता हूं तथा मांसाहारी पिशाचों का विनाश करता हूं. इस प्रकार दुष्टता को प्राप्त जो संपूर्ण
राक्षस जाति है तथा जो अंधकार के समान दूसरों को ढकने वाले हैं, उन का मैं विनाश करता
हूं. (१२)
अग्नेष्टे प्राणममृतादायुष्मतो वन्वे जातवेदसः.
यथा न रिष्या अमृतः सजूरसस्तत् ते कृणोमि तदु ते समृध्यताम्.. (१३)
हे पाप देवता निर्ऋति के द्वारा प्राणरहित बनाए गए पुरुष! चिरजीवी एवं मरणरहित
देव अग्नि से मैं तेरे प्राणों की याचना करता हूं. वह अग्नि देव सभी जन्म लेने वालों को
जानते हैं. हे पुरुष! जिस प्रकार तू न मरे और मरणरहित हो कर प्रसन्न बने, मैं तेरे लिए उसी
प्रकार का शांतिकर्म करता हूं. तुझ से संबंधित यह शांतिकर्म समृद्ध हो. (१३)
शिवे ते स्तां द्यावापृथिवी असंतापे अभिश्रियौ.
शं ते सूर्य आ तपतु शं वातो वातु ते हृदे.
शिवा अभि क्षरन्तु त्वापो दिव्याः पयस्वतीः.. (१४)
हे कुमार! तेरे घर से निकलने के समय द्यावा पृथ्वी मंगल करने वाली हों, संताप न
पहुंचाएं तथा तुझे धन प्रदान करें. सूर्य तेरे लिए सुखकारक तपें तथा वायु तेरे मन के अनुकूल
बन कर एवं सुखकारी हो कर चले. दिव्य जल तेरे लिए अनेक प्रकार के स्वादों से युक्त एवं
कल्याणकारी हो कर बरसें. (१४)
शिवास्ते सन्त्वोषधय उत् त्वाहार्षमधरस्या उत्तरां पृथिवीमभि.
तत्र त्वादित्यौ रक्षतां सूर्याचन्द्रमसावुभा.. (१५)
हे कुमार! तेरे भोजन के उपयोग में आने वाले गेहूं आदि अन्न सुखकारी हों. पृथ्‍वी के
निचले भाग की अपेक्षा तेरे निमित्त ऊंची पृथ्‍वी का उद्धार किया गया है. पृथ्वी के उच्च भाग
में अदिति के पुत्र सूर्य और चंद्रमा दोनों तेरी रक्षा करें. (१५)
यत् ते वासः परिधानं यां नीविं कृणुषे त्वम्.
शिवं ते तन्वे ३ तत् कृण्मः संस्पर्शेऽदृक्ष्णमस्तु ते.. (१६)
हे बालक! जो वस्त्र तेरे ऊपरी भाग को ढक रहा है और जिसे तूने कमर के नीचे पहना
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है, ये दोनों प्रकार के वस्त्र तेरे शरीर के लिए कल्याणकारी एवं सुखद हों. इस वस्त्र को मैं
ऐसा बनाता हूं कि यह छूने में कठोर न लगे. (१६)
यत् क्षुरेण मर्चयता सुतेजसा वप्ता वपसि केशश्मश्रु.
शुभं मुखं मा न आयुः प्र मोषीः.. (१७)
हे सविता देव! अथवा हजामत बनाने वाले पुरुष! जब तुम केश काटने वाले नाई हो
कर शोभन तेज वाले उस्तरे को चलाते हो, सिर और दाढ़ी के बाल काटते हो, तब मुंडन किए
जाते हुए इस बालक का मुख तेजस्वी बनाओ तथा इस की आयु को मत चुराओ. (१७)
शिवौ ते स्तां व्रीहिवावाबलासावदोमधौ.
एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुञ्चतो अंहसः.. (१८)
हे अन्न खाते हुए बालक! तेरे खाने के लिए निश्चित किए गए गेहूं और जौ तेरे लिए
सुखकारी एवं शरीर बढ़ाने वाले हों. उपयोग के पश्चात ये गेहूं और जौ तेरे शरीर को विशेष
रूप से पीड़ित न करें और तुझे पाप से छुड़ाएं. (१८)
यदश्नासि यत्पिबसि धान्यं कृष्याः पयः.
यदाद्यं १ यदनाद्यं सर्वं ते अन्नमविषं कृणोमि.. (१९)
हे कुमार! तुम जिस प्रकार के अनाज को कठिनता से खाते हो तथा दूध के समान
सारवान पिसे हुए धान्य को पीते हो, जो अन्न सुख से खाने योग्य है तथा जो खाने में कठिन
है, इन सभी प्रकार के अन्नों को मैं विषहीन बनाता हूं. (१९)
अह्ने च त्वा रात्रये चोभाभ्यां परि दद्मसि.
अरायेभ्यो जिघत्सुभ्य इमं मे परि रक्षत.. (२०)
हे कुमार! मैं रक्षा के निमित्त तुझे दिन और रात अर्थात् दोनों के देवताओं के लिए देता
हूं. हे देवताओ! तुम निर्धन के पास से तथा खाने वाले राक्षसों के पास से इस बालक की रक्षा
करना. (२०)
शतं ते ऽ युतं हायनान् द्वे युगे त्रीणि चत्वारि कृण्मः.
इन्द्राग्नी विश्वे देवास्ते ऽ नु मन्यन्तामहृणीयमानाः.. (२१)
हे बालक! मैं तेरी अवस्था के सौ वर्षों को हजार वर्ष, हजार वर्षों को दो युग, दो युगों
को तीन युग और तीन युगों को चार युग बनाता हूं. इस प्रकार की प्रार्थना को प्रसिद्ध इंद्र,
अग्नि तथा विश्वे देव लज्जा अथवा क्रोध न करते हुए स्वीकार करें. (२१)
शरदे त्वा हेमन्ताय वसन्ताय ग्रीष्माय परि दद्मसि.
वर्षाणि तुभ्यं स्योनानि येषु वर्धन्त ओषधीः.. (२२)
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हे बालक! मैं तुझे शरद ऋतु, हेमंत ऋतु, वसंत ऋतु और ग्रीष्म ऋतु के लिए देता हूं. हे
बालक! जिन वर्षों में भोग के साधन गेहूं, जौ आदि बढ़ते हैं, वे वर्ष तेरे लिए सुखकारी हों.
(२२)
मृत्युरीशे द्विपदां मृत्युरीशे चतुष्पदाम्.
तस्मात् त्वां मृत्योर्गोपतेरुद्धरामि स मा बिभेः.. (२३)
मृत्यु देव दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं. जिस प्रकार
ग्वाला पशुओं का स्वामी होता है, उसी प्रकार मृत्यु देव सभी प्राणियों के स्वामी हैं. मैं तेरा
मृत्यु से उद्धार करता हूं. तू भयभीत न हो. (२३)
सो ऽ रिष्ट न मरिष्यसि न मरिष्यसि मा बिभेः.
न वै तत्र म्रियन्ते नो यन्त्यधमं तमः.. (२४)
हे मृत्यु देव से विमुख अर्थात् मृत्यु की हिंसा से रहित पुरुष! तू मरेगा नहीं. तू मरेगा
नहीं, इसीलिए भय मत कर. जिस स्थान में शांति कर्म किया जाता है, वहां के लोग प्राण
त्याग नहीं करते हैं तथा असहनीय मूर्च्छा को भी प्राप्त नहीं करते. (२४)
सर्वो वै तत्र जीवति गौरश्वः पशुः.
यत्रेदं ब्रह्म क्रियते परिधिर्जीवनाय कम्.. (२५)
जहां गाय, घोड़े, पुरुष और पशु सभी जीवित रहते हैं, वहां महाशांति के लिए यज्ञ कर्म
एवं राक्षस, पिशाच आदि का निवारण करने वाला कर्म किया जाता है जो जीवन के लिए
कल्याणकारी होता है. (२५)
परि त्वा पातु समानेभ्यो ऽ भिचारात् सबन्धुभ्यः.
अमम्रिर्भवा ऽ मृतो ऽ तिजीवो मा ते हासिषुरसवः शरीरम्.. (२६)
हे शांति चाहने वाले पुरुष! मेरे द्वारा किया गया शांति कर्म सभी ओर से तेरा पालन
करे. यह तुझे विद्या एवं ऐश्वर्य में समान अन्य मनुष्यों और संबंधियों द्वारा किए हुए जादूटोने
से बचाए. तेरी मृत्यु न हो और तू अत्यधिक जीवन प्राप्त करे. प्राण तेरे शरीर का त्याग न
करें. (२६)
ये मृत्यव एकशतं या नाष्ट्रा अतितार्याः.
मुञ्चन्तु तस्मात् त्वां देवा अग्नेर्वैश्वानरादधि.. (२७)
यमराज के जो प्रसिद्ध आयुध ज्वर, सिरदर्द आदि सौ संख्या में हैं और जो लोगों का
नाश करने वाले हैं, उन से बचना कठिन है. अग्नि और वैश्वानर आदि देव तुझे उन सब से
बचाएं. (२७)
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अग्नेः शरीरमसि पारयिष्णु रक्षोहासि सपत्नहा.
अथो अमीवचातनः पूतुद्रुर्नाम भेषजम्.. (२८)
हे पूतद्रु नामक वृक्ष! तू अग्नि से व्याप्त शरीर वाला है. तू राक्षसों और शत्रुओं का
विनाशक है तथा रोग को बाहर निकालने वाला है. (२८)
सूक्त-३ देवता—अग्नि
रक्षोहणं वाजिनमा जिघर्मि मित्रं प्रथिष्ठमुप यामि शर्म.
शिशानो अग्निः क्रतुभिः समिद्धः स नो दिवा स रिषः पातु नक्तम्.. (१)
मैं राक्षसों का हनन करने वाले एवं बल के साधन अन्न से युक्त अग्नि के लिए हवन
करता हूं. यज्ञ के द्वारा मैं मित्र बने हुए विस्तार को प्राप्त अग्नि की शरण जाता हूं. तीक्ष्ण
ज्वालाओं वाले वे अग्नि देव आज्य आदि के द्वारा प्रज्वलित हों. इस प्रकार के अग्नि देव दिन
में हिंसा करने वाले से हमारी रक्षा करें. (१)
अयोदंष्ट्रो अर्चिषा यातुधानानुप स्पृश जातवेदः समिद्धः.
आ जिह्वया मूरदेवान् रभस्व क्रव्यादो वृष्ट्वापि धत्स्वासन्.. (२)
हे जन्म लेने वालों के ज्ञाता अग्नि देव! हमारे द्वारा किए हुए घृत आदि से भलीभांति
प्रज्वलित हो कर तुम लोहे के दांतों के समान अपनी ज्वालाओं के द्वारा राक्षसों को जला दो.
जादूटोने के द्वारा जो दूसरों की हत्या का खेल खेलते हैं, उन्हें तुम अपनी जीभ से स्पर्श करो
तथा मांस भक्षक राक्षस पिशाच आदि का विनाश कर के अपना मुख बंद कर लो. (२)
उभोभयाविन्नुप धेहि दंष्ट्रौ हिंस्रः शिशानो ऽ वरं परं च.
उतान्तरिक्षे परि याह्यग्ने जम्भैः सं धेह्यभि यातुधानान्.. (३)
यह रक्षा करने योग्य है और यह मारने योग्य है—इन दो प्रकार के ज्ञान वाले हे अग्नि
देव! तुम हिंसक एवं तीखी ज्वालाओं वाले हो. तुम हमारे शत्रु एवं हमारे द्वारा द्वेष किए गए
पुरुष को अपनी दोनों दाढ़ों के बीच में रख लो. इस के पश्चात तुम आकाश में विचरण करो.
हे अग्नि देव! मुझे बाधा पहुंचाने के निमित्त घूमते हुए राक्षसों को दांतों से चबा डालो. (३)
अग्ने त्वचं यातुधानस्य भिन्धि हिंसा ऽ शनिर्हरसा हन्त्वेनम्.
प्र पर्वाणि जातवेदः शृणीहि क्रव्यात् क्रविष्णुर्वि चिनोत्वेनम्.. (४)
हे अग्नि देव! तुम राक्षसों की त्वचा का छेदन करो. तुम्हारा हिंसक वज्र अपने ताप से
इन राक्षसों की हत्या करे. हे जातवेद अग्नि! राक्षसों के जोड़ों को अलगअलग कर दो. इस के
पश्चात भक्षक भेड़िया मांस की इच्छा करता हुआ इन्हें खींच कर ले जाए. (४)
यत्रेदानीं पश्यसि जातवेदस्तिष्ठन्तमग्न उत वा चरन्तम्.
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उतान्तरिक्षे पतन्तं यातुधानं तमस्ता विध्य शर्वा शिशानः.. (५)
हे जातवेद अग्नि देव! तुम कहीं बैठे हुए और कहीं चलतेफिरते हुए राक्षसों को देखते
हो. वे इस देश में हमारे प्रति उपद्रव करते हैं. आकाश में भी जाते हुए उस राक्षस को खींच
लेने वाले तुम तीक्ष्ण हो कर अपनी ज्वालाओं से मारो. (५)
यज्ञैरिषूः संनममानो अग्ने वाचा शल्याँ अशनिभिर्दिहानः.
ताभिर्विध्य हृदये यातुधानान् प्रतीचो बाहून् प्रति भङ्ग्ध्येषाम्.. (६)
हे अग्नि! तुम हमारे यज्ञों के द्वारा अपने बाणों को सीधा करते हुए एवं हमारी स्तुतियों
के द्वारा उन के फलों को तेज करते हुए उन बाणों को राक्षसों के हृदयों में चुभा दो. इस के
पश्चात् हमारे वध के लिए उठी राक्षसों की भुजाओं को भग्न कर दो. (६)
उतारब्धान्त्स्पृणुहि जातवेद उतारेभाणाँ ऋष्टिभिर्यातुधानान्.
अग्ने पूर्वो नि जहि शोशुचान आमादः क्ष्विङ्कास्तमदन्त्वेनीः.. (७)
हे जातवेद अग्नि देव! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमारा पालन करो तथा हल्ला
करने वाले राक्षसों का अपने आयुधों के द्वारा वध करो. तुम शत्रु को उस के आक्रमण के पूर्व
ही मार डालो. उस मारे हुए का भक्षण कच्चा मांस खाने वाले पक्षी करें. (७)
इह प्र ब्रूहि यतमः सो अग्ने यातुधानो य इदं कृणोति.
तमा रभस्व समिधा यविष्ठ नृचक्षसश्चक्षुषे रन्धयैनम्.. (८)
हे अग्नि देव! इस शांति कर्म में जो राक्षस हमारे शरीर को पीड़ा देने वाला काम करता
है, उन से कह दो कि वह तुम्हारे द्वारा प्रहार करने योग्य है. हे अधिक युवा अग्नि देव, उस
पापी को अपनी जलाने वाली ज्वाला से स्पर्श करो. हे अग्नि देव! तुम पुण्यात्मा और पापियों
को साक्षी रूप हो कर देखते हो. तुम इस पापी को अपनी दृष्टि के द्वारा वश में कर लो. (८)
तीक्ष्णेनाग्ने चक्षुषा रक्ष यज्ञं प्राञ्चं वसुभ्यः प्र णय प्रचेतः.
हिंस्रं रक्षांस्यभि शोशुचानं मा त्वा दभन् यातुधाना नृचक्षः.. (९)
हे अग्नि देव! अपने भयंकर एवं उग्र तेज के द्वारा हमारे यज्ञ की रक्षा करो. हे दयालु
मन वाले अग्नि देव! हमारे इस यज्ञ को देवों तक पहुंचाओ और यज्ञ की रक्षा करते हुए तुम
राक्षसों को मारो. वे तुम्हें अपने वश में न कर सकें. (९)
नृचक्षा रक्षः परि पश्य विक्षु तस्य त्रीणि प्रति शृणीह्यग्रा.
तस्याग्ने पृष्ठीर्हरसा शृणीहि त्रेधा मूलं यातुधानस्य वृश्च.. (१०)
हे अग्नि देव! मनुष्यों का जो दंड एवं अनुग्रह कार्य है, उस के द्रष्टा तुम ही हो. जो
राक्षस प्रजा को पीड़ा पहुंचाते है, तुम उन के ऊपर से तीन अंगों अर्थात् दो हाथों और तीसरे
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शीश को काट दो. तुम अपने तेज से उन राक्षसों की पसलियों तथा पैरों के तीन भागों को भी
काट दो. (१०)
त्रिर्यातुधानः प्रसितिं त एत्वृतं यो अग्ने अनृतेन हन्ति.
तमर्चिषा स्फूर्जयञ्जातवेदः समक्षमेनं गृणते नि युङ्ग्धि.. (११)
हे अग्नि देव! राक्षस तुम्हारी ज्वालाओं को तीन बार प्राप्त करें. अर्थात् अग्नि उन्हें तीन
बार प्रातः, दोपहर और शाम को जलाएं. जो मेरे सत्य यज्ञ को छल से नष्ट करता है, उसे
पकड़ कर मेरे सामने ही अपनी ज्वालाओं से नष्ट कर दो. (११)
यदग्ने अद्य मिथुना शपातो यद् वाचस्तृष्टं जनयन्त रेभाः.
मन्योर्मनसः शरव्या ३ जायते या तया विध्य हृदये यातुधानान्.. (१२)
हे अग्नि देव! जिस राक्षस के कारण स्त्री और पुरुष आक्रोश से भरे हुए हैं तथा यज्ञ के
श्रोता कटुवाणी से मंत्रों का उच्चारण कर रहे हैं, उस राक्षस पर अपने ज्वाला युक्त मन का
प्रहार करो. (१२)
परा शृणीहि तपसा यातुधानान् पराग्ने रक्षो हरसा शृणीहि.
परार्चिषा मूरदेवान्छृणीहि परासुतृपः शोशुचतः शृणीहि.. (१३)
हे अग्नि देव! अपने तेज से राक्षसों का विनाश करो तथा अपने प्राणनाशक तेज से उन्हें
मार डालो. हत्या कर्म के द्वारा पीड़ा करने वाले उन राक्षसों को अपनी ज्वाला से जला दो.
जो दूसरे के प्राणों से अपनेआप को तृप्त करते हैं, ऐसे राक्षसों को तुम अपनी ज्वाला से जला
दो. (१३)
पराद्य देवा वृजिनं शृणन्तु प्रत्यगेनं शपथा यन्तु सृष्टाः.
वाचास्तेनं शरव ऋच्छन्तु मर्मन् विश्वस्यैतु प्रसितिं यातुधानः.. (१४)
आज देवगण राक्षस एवं पाप देवता को ऐसा मारें कि वे लौट कर न आएं. राक्षसों
अथवा पाप को संतुष्ट करने वाले जो लोग हमें शाप देते हैं वह उन्हीं की ओर चला जाए.
असत्य वचन के द्वारा जो प्रहार करता है, देवों के बाण उस के मर्म स्थल में लगें. वह राक्षस
संसार को व्याप्त करने वाले अग्नि देव की ज्वाला में गिरे. (१४)
यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः.
यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च.. (१५)
जो राक्षस पुरुषों के मांस से अपना पोषण करता है तथा घोड़े और बकरी आदि के
मांस से पुष्ट होता है, हे अग्नि देव! जो राक्षस गाय का दूध चुराता है. उन सब के सिरों को
अपनी ज्वाला से काट दो. (१५)
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विषं गवां यातुधाना भरन्तामा वृश्चन्तामदितये दुरेवाः.
परैणान् देवः सविता ददातु परा भागमोषधीनां जयन्ताम्.. (१६)
गायों के दूध की कामना करते हुए राक्षस उन से विष प्राप्त करें. दुष्ट गति वाले राक्षस
सब को आश्रय देने वाली पृथिवी के सुख के लिए छिन्नभिन्न हो जाएं अर्थात् भूमि पर प्राप्त
होने वाले पदार्थों को न पा सकें. सविता देव ये राक्षस वधिकों को सौंप दे. ये सब गेहूं, जौ
आदि के भागीदार न बनें. (१६)
संवत्सरीणं पय उस्रियायास्तस्य माशीद् यातुधानो नृचक्षः.
पीयूषमग्ने यतमस्तितृप्सात् तं प्रत्यञ्चमर्चिषा विध्य मर्मणि.. (१७)
हे मनुष्यों को देखने वाले अग्नि देव! राक्षस हमारी गायों के वर्ष में होने वाले गर्भाधान,
प्रसव आदि को नष्ट न करें तथा उन का दूध न पिएं. उन में से जो राक्षस हवि रूपी अमृत एवं
गो घृत से अपनेआप को तृप्त करना चाहे, उस राक्षस को अपनी ज्वाला से ताड़ित कर के
विमुख करो. (१७)
सनादग्ने मृणसि यातुधानान् न त्वा रक्षांसि पृतनासु जिग्युः.
सहमूराननु दह क्रव्यादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्यायाः.. (१८)
हे अग्नि देव! तुम चिरकाल से राक्षसों का हनन करते हो, फिर भी राक्षस युद्धों में तुम्हें
जीत नहीं सकते हैं. इसलिए तुम मांसाहारी राक्षसों को मूल सहित जला दो. वे तुम्हारे दैवी
आयुध से न बच सकें. (१८)
त्वं नो अग्ने अधरादुदक्तस्त्वं पश्चादुत रक्षा पुरस्तात्.
प्रति त्ये ते अजरासस्तपिष्ठा अघशंसं शोशुचतो दहन्तु.. (१९)
हे अग्नि देव! तुम नीचे की दिशा से पीड़ा पहुंचाने वाले राक्षसों से, ऊपर की दिशा से
पीड़ा पहुंचाने वाले राक्षसों से तथा पूर्व दिशा से पीड़ा पहुंचाने वाले राक्षसों से हमारी रक्षा
करो. सर्वत्र वर्तमान तुम्हारी चिनगारी पापी राक्षसों का विनाश करे. हे राक्षस! अग्नि देव वृद्ध
न होने वाले, अतिशय संतापकारी एवं दीप्ति वाले हैं. (१९)
पश्चात् पुरस्तादधरादुतोत्तरात् कविः काव्येन परि पाह्यग्ने.
सखा सखायमजरो जरिम्णे अग्ने मर्ताँ अमर्त्यस्त्वं नः.. (२०)
हे सब कुछ जानने वाले अग्नि देव! तुम क्रांतदर्शी हो. इसलिए दक्षिण, उत्तर, पूर्व और
पश्चिम दिशाओं से बाधा पहुंचाने वाले राक्षसों को जानते हो. तुम अपने रक्षा व्यापारों के द्वारा
हमारी रक्षा करो. तुम मेरे सखा हो, इसलिए अपने सखा अर्थात् मेरी रक्षा करो. हे अग्नि देव!
तुम वृद्धावस्था रहित हो, मुझ वृद्ध और दुर्बल की रक्षा करो. तुम मरण रहित हो, मुझ
मरणधर्मा की रक्षा करो. (२०)
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तदग्ने चक्षुः प्रति धेहि रेभे शफारुजो येन पश्यसि यातुधानान्.
अथर्ववज्ज्योतिषा दैव्येन सत्यं धूर्वन्तमचितं न्योष.. (२१)
हे अग्नि देव! तुम शब्द करते हुए राक्षस पर अपनी वह दृष्टि डालो अर्थात् उसे जला दो,
जिस से तुम पशु रूपधारी राक्षसों को देखते हो. अथर्वा नाम के महर्षि ने अपने तप और मंत्र
के प्रभाव से जिस प्रकार राक्षस को जलाया, उसी प्रकार तुम भी अपनी दिव्य ज्योति से सत्य
की हिंसा करने वाले एवं ज्ञानहीन राक्षसों को पूरी तरह जला दो. (२१)
परि त्वाग्ने पुरं वयं विप्रं सहस्य धीमहि.
धृषद्वर्णं दिवेदिवे हन्तारं भङ्गुरावतः.. (२२)
हे सबको पराजित करने वाले अग्नि देव! हम तुम्हारा सभी प्रकार से ध्यान करते हैं.
तुम अभिलाषाएं पूर्ण करने वाले, मेधावी, अधिक वर्षा युक्त तथा प्रतिदिन गिरते हुए बल और
स्वभाव वाले राक्षसों के हंता हो. (२२)
विषेण भङ्गुरावतः प्रति स्म रक्षसो जहि.
अग्ने तिग्मेन शोचिषा तपुरग्राभिरर्चिभिः.. (२३)
हे अग्नि देव! विष के समान विनाशक अपने तीखे तेज से भग्नचरित्र वाले राक्षसों का
विनाश करो. तुम उन्हें अपनी ताप युक्त ज्वालाओं से भी जलाओ. (२३)
वि ज्योतिषा बृहता भात्यग्निरविर्विश्वानि कृणुते महित्वा.
प्रादेवीर्मायाः सहते दुरेवाः शिशीते शृङ्गे रक्षोभ्यो विनिक्षे.. (२४)
ये अग्नि देव महान तेज से प्रकाशित हैं. हे अग्नि देव! अपने तेजों की अधिकता से तुम
समस्त प्राणियों को प्रकट करते हो. ये अग्नि देव राक्षसों से संबंधित और कष्ट से जानने योग्य
मायाओं का पूर्णतया विनाश करते हैं तथा राक्षसों के विनाश के लिए अपने सींग पैने करते
हैं. (२४)
ये ते शृङ्गे अजरे जातवेदस्तिग्महेती ब्रह्मसंशिते.
ताभ्यां दुर्हार्दमभिदासन्तं किमीदिनं प्रत्यञ्चमर्चिषा जातवेदो वि निक्ष्व..
(२५)
हे जातवेद अग्नि! तुम्हारे जो प्रसिद्ध सींग हैं, उन के द्वारा तुम अपने विरोधियों का
विनाश करो. तुम्हारे सींग जरा रहित, तीखे आयुधों के समान एवं हमारे मंत्रों के द्वारा
शक्तिशाली बनाए गए हैं. तुम दुष्ट हृदय वाले सब के विनाशक एवं यह कौन है, यह कौन है,
इस प्रकार बोल कर विनाश करने वाले राक्षसों को मारो. (२५)
अग्नी रक्षांसि सेधति शुक्रशोचिरमर्त्यः. शुचिः पावक ईड्यः.. (२६)