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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages
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अकबर बीरबल बिनोद २०२
दिया है, परन्तु मेरे सामने तेरी दाल न गलेगी और झट म्यान
से तलवार खींचकर बीरबल पर झपटा। बीरबल अपनी
नकली पोशाक उतारकर खासा बीरबल बन गया।'' सरदार
खाँ बीरबल को पहचान कर सन्न हो गया और उसकी
जबान एकदम बन्द हो गई। डरके कारण थरथर काँपने लगा।
बीरबल बोला-''ऐ प्रजा पर अत्याचार करने वाले सर-
दार खाँ ! अब तुम मेरे कैदी हो गये हो। तुमको मेरे साथ
चलना पड़ेगा। तुम प्रजा के रक्षा के निमित्त रक्खे गये थे
धिक्कार है तुम्हारी इस करतूत पर।''
सरदार खाँ चुपचाप बीरबल के साथ हो लिया फिर बीरबल
उस कन्या से बोला-"तू भी मेरे साथ चल। कल मैं तेरे पिता
को बुलवाकर सारी बातें समझा कर तुझे उसके साथ भेज
दूँँगा। कन्या ने सहर्ष बीरबल के साथ जाना स्वीकार किया
घर पहुँच कर बीरबल ने उसे अपनी स्त्री के हवाले किया।
और सरदार खाँ को एक कोठरी में कैदी के रूप में बन्द रक्खा।
सबेरा होते ही उसे सिपाहियों के पहरे में बादशाह के
सामने उपस्थित किया।
बादशाह तथा अन्य सभासद सरदार खाँ के सम्बन्ध में
कुछ नहीं जानते थे। एकाएक उसको कैदी के रूप में देखकर
चकित हो गये। बीरबल से उसका भेद पूछा और बीरबल
अपने भ्रमण से लेकर सरदार खाँ के पकड़े जाने तक की
सारी बातें बादशाह से कह सुनाया। बादशाह जो बात
सुनने का स्वप्न में भी कयास नहीं करता था वह सुनकर
और सामने सरदार खाँ कैदी को देखकर आग बबूला हो

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२०३ अकबर बीरबल बिनोद
होकर बोले-“ऐ नीच सरदार खाँ ! तुमको मैंने इतना
ऊंचा पद प्रदान किया था जिसका तूने मुझे इस प्रकार से
बदला चुकायो, जा मुँहमें कालिख लगाकर मेरी आँखों से
ओझल हो जा। फिर बीरबल ने तुरत उसे कारागृह में
भेज दिया। इसका प्रभाव दूसरे सरदारों पर भी बड़ा गहरा
पड़ा। वे डरवश थरथर काँपने लगे।”
दूसरे दिन सरदारखाँ बादशाह की आज्ञा से भरी सभा
में उपस्थित किया गया और सबके सामने उसको कड़ी सजा
भुगतने का हुक्म सुनाया गया। मुसलमान दरबारी और सर-
दार लोग बीरबल से बहुत चिढ़गये और सभों ने आपस में
मिलकर बीरबल को दर्बार से निकाल बाहर करने की गुप्त चेष्टा
करने लगे। उन्होंने गुप्तरूप से बीरबल की बड़ी शिकायत की
परन्तु बादशाह उनकी एक बात भी सच्ची नहीं मानते थे
उनका बीरबल पर सच्चा अनुराग था और वे उसकी अनेकों
परीक्षाएँ भी ले चुके थे। जिस कारण उन्हें बीरबल पर
कभी अविश्वास नहीं होता था। उन लोगों का जब कोई
चारा न चला तो एक काने नाई को मिलाया और उसे
धन का प्रलोभन देकर इस काम के लिये अग्रसर किया। एक
दिन वह नाई हजामत बनाते समय बादशाह को पिघला कर
बोला-“पृथ्वीनाथ ! आप रोज बड़े से बड़े कर्म किया करते हैं
परन्तु एक बात पर आपने कभी विचार नहीं किया। आप के
बाप दादों को स्वर्ग गये एक जमाना गुजर गया; परन्तु
आपने उनकी सुधि तक न ली, भला वे अपने मन में आपको
क्या कहते होंगे, कहीं वे आपसे नाराज हो जायें तो फिर कौन

[Header] अकबर बीरबल विनोद २०४

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[Header] अकबर बीरबल विनोद २०४
सा उपाय कीजियेगा?" बादशाह ने कहा- "इतने दिनों तक तो
मुझे उनकी सुधि न रही, परन्तु अब तुम्हारे कहने से मुझे भी
विचार करना पड़ा। भाई ! सबसे बड़ी अड़चन की एक बात है
कि आखिरस इस काम के लिये किसे भेजूं ।" तब उस काने
नाईने कहा-"आप अपने पितरों की कमाई तो ले लेते हैं; परन्तु
अब उनकी खोज खबर तक नहीं लेते, भला वे क्या कहेंगे।
बादशाह बोला- "आखिर इस काम को करने के लिये
तुमने किसको उपयुक्त सोचा है। फिर वह जायगा किस
मार्ग से।" तब नाई बोला-"पृथ्वीनाथ ! यह तो आप जाने
कि किसे भेजना चाहिये; परन्तु जाने का मार्ग मैं आपको
बतला सकता हूँ। बादशाह ने कहा-"भली बात है तू शीघ्र
बतला।" काने ने कहा-"आप जिस आदमी को भेजना चाहें
उसे स्मशान पर भेजकर पहले उसके ऊपर घास के बहुत
से पुलिन्दे डलवा दें। जिससे ऊपर से देखने में वह मीनार
के समान देख पड़े फिर उसमें आग लगा देने से वह आदमी
धुयें के साथ पितर लोक में आपसे आप पहुँच जायगा
(भीतर ही भीतर) बिना औषधि के ही बाधा दूर हो
जायगी।"
बादशाह बोला- "यह तो हुआ परन्तु भेजें किसे, यह
भी तू ही निश्चय कर दे।" वह बोला-"भेजे तो वह
जिसे आगे पीछे दीपक भी दिखाने वाला कोई न हो, आपके
यहाँ तो हजारों आदमी एक से एक धकड़ पड़े हुए हैं, हाँ
वह काम बड़े चतुर आदमी का है।" बादशाह ने कहा-"भाई
केवल इतना कह देने से मेरा काम नहीं सरता; आखिर तुम

२०५ अकबर बीरबल विनोद

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२०५ अकबर बीरबल विनोद
अपनी समझ से किसे उपयुक्त समझते हो।" नाई ने उत्तर
दिया- "पृथ्वीनाथ ! मेरी समझ से तो इस काम के उपयुक्त
अ-अ-अ-अरे हां, अच्छा बतला दूँ, हाँ ! बीरबल है, आगे
आपकी इच्छा चाहे जिसको भेजें।"
बादशाह ने कहा- "कहता तो तू बहुत ठीक है; परन्तु
एक बात फिर भी बड़े अड़चन की आ पड़ती है, बीरबल के
जानेके बाद यहाँका कार्य कौन सँभालेगा।"नाई बोला-इसमें
कौनसी बड़ी बात है, उस जगह पर अल्प काल के लिये
कोई दूसरा ही आदमी नियुक्त कर दिया जायगा। यदि आप
वह पद मुझे देना चाहें तो उतने समय तक मैं ही संभाल
दूँगा।" बादशाह हँस पड़े और बोले- "शाबस बच्चे ! कैसा
मुँहमें पानी भर आया ?" तुमको भी दीवान पद के लिये
उत्कण्ठा हो गई।" नाई कुछ सिटपिटा गया, परन्तु फिर
भी मुँह आछत कायल होना अच्छा नहीं समझता था।
उसने कहा- "पृथ्वीनाथ ! इसमें कोई ऐसी बात नहीं है; मैं तो
योंही कह रहा था। यदि आप कहेंगे तो मैं ही चला जाऊँगा
परन्तु मैं जरा वैसा आदमी हूँ। यदि आप किसी को कत्तई
न भेजेंगे तो आप पर पितृऋण बना ही रह जायगा। मुझे
विश्वास पड़ रहा है कि जब आप बीरबलको जाने की आज्ञा देंगे
तो वह अनेक प्रकार से निबुकने की कोशिश करेगा, परन्तु
अपनी बात पर दृढ़ होकर अड़ जायँगे तो जाने के लिये उद्यत
होगा। बड़े बूढ़ों की प्रसन्नता के लिये किसी न किसी को
भेजना बहुत जरूरी है, आगे आप स्वयं मुख्तार हैं। बीरबल
ने नाई की अपील मंजूर करली और उसे घर जाने की आज्ञा

अकबर बीरबल विनोद २०६

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अकबर बीरबल विनोद २०६

दो। वह बड़ी प्रसन्नतापूर्वक वहाँ से प्रस्थान किया और
मुसलमानों की मण्डली में पहुँचकर सबको बधाई दी। वे
लोग उसकी सारी बातें सुनकर बड़े प्रसन्न हुए।
दूसरे दिन दरबार में पहुँचते ही बादशाह को नाई की
बात याद आई और बीरबल को बुलाकर बोले-"बीरबल !
आज कितने समयों से हमें अपने पुरुषाओं का कुछ
समाचार नहीं मिला है इसलिये इस समय मेरे मन में एक-
दम उचाट सा हो गया है, तुम जाकर उनका समाचार बूझ
आओ। बीरबल की आँखें खुल गईं; उसने समझ लिया कि
इसमें फँसाने की बातें हैं। अच्छा देखा जायगा। वह बोला-"
पृथ्वीनाथ ! यह दास जाने को नाहीं नहीं करता, परन्तु
एक बात की अड़चन पड़ेगी। वह यह कि वहाँ पहुँचने के लिये
कोई रास्ता नहीं है फिर क्या किया जाय ? यदि मार्ग का
प्रबन्ध आप करादें तो मैं सहर्ष कल की जगह आजही यात्रा
करने के लिये मुस्तैद हूँ।" बादशाह बोला-"जो सुथनी
सिलाता है वह पाखाना फिरने के लिये उसमें छेद भी बनवा
लेता है। वहाँ पहुँचने की तरकीब काने नाऊ ने पहले ही
बतला दिया है, उसकी युक्ति मुझे भी पसन्द आई है। उसने
कहा है कि जाने वाले आदमी को स्मशान पर बैठा कर उसके
ऊपर से घास की सवा लक्ष पूलियाँ रखकर उसमें आग
सुलगा देने से काम बन जायगा, वह दूत उसी धूयें के साथ
वहाँ (यानी स्वर्ग को) पहुँच जायगा। अतएव तुम दो चार
दिनों में एकदम तयारी करके आओ।"
अब बीरबल समझ गया कि यह सब करामात उसी

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२०७ अकबर बीरबल विनोद


काने नाई की है। परन्तु इस समय इससे बचने के उपाय
सोचने चाहिये। बाद को मैं उससे निपट लूँगा।” वह बाद-
शाह से बोला-“गरीब परवर! मसल मशहूर है कि लोग जाते
तो अपने मन से हैं और आते दूसरों के मन से। जो
आपके पितृलोग मुझे वहाँ कुछ समय के लिये रोक लगे तो
मुझे विवश होकर उनका कहना मान कर रहना पड़ेगा। अतएव
हमारे कुटुम्ब के भरण पोषण का प्रबन्ध होना चाहिये। वहाँ
से मेरे लौटने का कोई निश्चित काल नहीं है, यदि
मुझे सवा लाख सिक्के मिलें तो मैं घर का सब प्रबन्ध करके
जाऊँ। मुझको इस कार्य के लिये दो मास का अवकाश
मिलना चाहिये।
बादशाह ने बीरबल की मांग स्वीकार करली। उन
रुपयों को बीरबल ने सुरंग खुदवाने में खर्च किया। यह
सुरंग बीरबल के आँगन से प्रारम्भ होकर स्मशान तक पहुँ-
चती थी। इसकी तयारी बड़ी सावधानी से की गई। बादशाह
को इस बात की हवा तक न छूने पाई। दो मांस में सुरंग
बनकर तयार हो गई। अब बीरबल बादशाह के पास गया
और सलाम कर बोला-“पृथ्वीनाथ! अब मैं अपने घरेलू कामों
को बिल्कुल ठीक कर स्वर्ग जाने के लिये तय्यार होकर आया
हूँ। बादशाह को इसमें बड़ी दिलचस्पी थी, वह तमाशा
देखने के अभिप्राय से अपने दरबारियों के सहित स्मशान पर
पहुँचा। काना नाई की तो पौ बारह थी, उसकी प्रसन्नता
का कहीं ठिकाना नहीं था। वह ऐसा फूला हुआ था मानो
किसी अहेरी ने बिना परिश्रमही बहुत बड़े बलिष्ठ जानवर

अकबर बीरबल विनोद २०८

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अकबर बीरबल विनोद २०८
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का शिकार किया हो।
बीरबल ने बादशाह से अनुमति लेकर गुप्त सुरंग के द्वार
पर प्रसन्नता-पूर्वक जा बैठा और नाई के कथनानुसार उसके
ऊपर घास फूसों का पुलंदा सजाकर चुना जाने लगा। बीर-
बल समय की प्रतीक्षा कर रहा था। जब उसने देखा कि अब
मैं घास के पुलिन्दों से भलीभाँति ढक दिया गया और यहाँ से
खिसकने में किसी की दृष्टि नहीं पड़ सकती तो सुरंग का
द्वार खोलकर उसके द्वारा कुशल-पूर्वक अपने घर जा पहुँचा।
और फिर छद्म भेष धारण कर श्मशान की घटना देखने के
लिये घाटपर जा पहुँचा। अभी तक घास चुनी जा रही थी।
जब सब घास भलीभाँति चुन दी गयी तो बादशाह की
आज्ञा से उसमें आग डाल दी गई, बहुतेरी हिन्दू जनता बादशाह
की मूर्खता की समालोचना करने लगी कारण कि बीरबल
की सुन्दर नीति से उन्हें बड़ा अनुराग था। इस प्रकार
श्मशान पर एकत्रित जनता का एक बहुत बड़ा भाग बादशाह
की आपकीर्ति फैलाने लगा-हाय ! हाय ! दीवान अब जीवित
नहीं होगा, अब हमें फिर उसके दर्शन की आशा न रही।
उसके कर्म में ब्रह्मा ने यही लिखा था।”
बीरबल क्रमशः उपस्थित जनता में घूमता फिरता मुस-
लमानों की टोली में जा पहुँचा। वे आपस में कह रहे थे-“हम
लोगों के मार्ग का कंटक आज इस प्रकार से टला। अब कोई
मुसलमान नया दीवान चुना जायगा। यह नालायक हम
लोगों को कभी गर्दन सीधी करने का मौका ही नहीं देता।
अब हमको आनन्द ही आनन्द का उपभोग होगा।”

२०६ अकबर बीरबल विनोद

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२०६ अकबर बीरबल विनोद
और आगे बढ़कर बीरबल ने देखा तो काना नाई खूब डींग
मार रहा है और बहुतेरे ही मुसलमान एकत्रित होकर
उसकी बातें सुन रहे हैं। उसने कहा-"यह मेरी ही करतूत
से आज इस अधोगति को प्राप्त हुआ है; यदि मैं इतनी युक्ति
न लड़ाता तो भला कोई उसका एक बाल भी बाँका कर सकता
था। मीर खाँ, अब आप अपने कौल के अनुसार मुझे पुरस्कार
दीजिये।" आपने अपनी आँखों देखा है कि वह भीतर ही
भीतर जलकर खाक हो गया, अब किसी को उसकी हड्डी
गुड्डी भी देखने को नसीब न होगी।"
बीरबल उसकी डींग सुन सुनकर जहर की घूँट घोंट रहा
था, कभी २ तो क्रोध के आवेश में आकर दाँतों तले ओठ दबाकर
रह जाता था। वह मनही मन बोला-"न घबराओ, अबकी बीर-
बल के हाथ से तुम्हारा छूटना कठिन है। मेरी ओसरी खतम
हो गई; अब तुम्हारी बारी है। जब सब घास जल गई, तो लोग
अपने अपने घर चले गये। बीरबल भी चुपके से अपनी गुप्त
कोठरी में जा बैठा। परन्तु उसे चैन कहाँ। रातके समय नित्य
नगर में फेरी लगाया करता था। गुप्तबास करते हुए जब
कई महीने बीत गये तो बीरबल ने अपने प्रकट होने का
निश्चय किया। इतने दिनों में उसको दाढ़ी और मूँछ पर्याप्त
बढ़ चुकी थी। सिर पर बड़ी बड़ी जटाएँ उग आई थीं।
इसी वेश में बीरबल ने दरबार में जाना उत्तम समझा।
तब एक दिन वह दरबारी कपड़ों से सुसज्जित होकर
बादशाह के पास गया। नगर में उसे बहुतेरे परिचित
मिले; परन्तु उसका रूपान्तर हो जानेके कारण वे उसे पहचान
१४

अकबर बीरबल विनोद २१०

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अकबर बीरबल विनोद २१०
ग सके । दरबार में पहुँचकर बीरबल बादशाहके सामने खड़ा
होगया। जब बादशाह उसे न पहचान सके तो वह स्वयं बोला-
"पृथ्वीनाथ! मेरा नाम बीरबल है, मैं आपकी आज्ञानुसार आपके
पित्रों से मिलकर वापस आया हूँ।" बादशाह उस को भली-
भाँति देखकर बोले- "वाहजी बीरबल, क्या तुम लौटकर आ
गये ? जरा मेरे पित्रों का समाचार वर्णन करो, वे प्रसन्न तो हैं
न ?" बीरबल ने कहा- "भला उनका क्या कहना है, आपके पुण्य
प्रभाव से वे बड़े आनन्द से हैं, जब मैंने उनको आपका कुशल
समाचार सुनाया तो वे बड़े हर्षित हुये और मुझे
आपका दीवान जानकर तो मुझसे इतना प्रेम करने लगे कि
मैं यहाँ आकर भी उन्हीं के प्रेम में विह्वल हो रहा हूँ। उनका
सुख इन्द्रके सुखभोग को भी लजाने वाला है। वहाँ उन्हें सब
बातों का सुख है केवल एकही बातकी कमी बतलाई है, वह यह
कि उस लोक में हजामत बनवाने के लिये नाई नहीं मिलता।
देखिये इसी से मेरी भी यह दशा हुई। मेरी तो केवल छ
महीने में यह हाल है और उनके बाल तो इतने बढ़ गये हैं
कि चलना फिरना दूभर हो रहा है। उनके सिर और दाढ़ी
के बार जमीन पर लेटते चलते हैं। मेरे चलते समय उन्होंने
आपसे एक चतुर नाई भेजने का अनुरोध किया है। मैं उन्हें
आपकी तरफ से धीरज देकर आया हूँ।
वहाँकी बहुतेरी सामग्रियाँ वे मेरे साथ भेजने वाले थे; परन्तु
फिर इस विचार से ठिठक गये कि नाई आने पर उसीके हाथसे
भेजा जायगा। मैं उनको एक चतुर नाई तुरत भेजनेका आश्वासन
दे आया हूँ। अब भेजना न भेजना आप की इच्छा पर निर्भर

२११ अकबर बीरबल विनोद

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२११ अकबर बीरबल विनोद
है। मैं उनका सन्देश आपसे कह कर अपने पाप दोष से बरी
होगया हूँ। तब बादशाह बोले-“बीरबल ! मैने तेरी बातें और
अपने पित्रों का सन्देशा तो सुन लिया, परन्तु आखिर इसका
उपाय क्या है, भला यहाँ पर ऐसा कौन नाई है जिसे भेजूं?”
बीरबल बोला-“हाँ इस विषय पर मैंने पहले विचार किया
था और अब भी आँखें फैलाकर देखता हूँ तो मुझे अपने काने
नाऊ के सामने दूसरा कोई भी नहीं जँचता। वह घास के
धुएँ के साथ स्वर्ग में बड़ी आसानी से पहुँच जायगा।”
बादशाह को बीरबल की युक्ति जँच गई और वे काने नाऊ
को बुलवाकर सब समाचार कह सुनाये। काने नाई को बीर-
बल का सजीव लौटना सुनकर बड़ा दुख हुआ। उसे स्वर्ग
जाने के लिये उसे बाध्य होना पड़ा। बिचारे को अपनी मृत्यु
प्रत्यक्ष नाचती हुई दिखलाई पड़ी। जान बचाने का कोई
दूसरा मार्ग न देखकर उसने बादशाह से एक मास की
मुहलत ली। इस मुहलत से उसका प्रयोजन छिपकर भाग
जाना था। बादशाह इतनी लम्बी छुट्टी स्वीकार नहीं
किये और बोले-“स्वर्ग में क्षौर कराने के लिये हमारे पितर
बड़े आकुल हो रहे हैं; इसलिये तू अपने घर का पूरा पूरा
प्रबन्ध करके एक हफ्ते के भीतर जानेके लिये तय्यार होकर
लौट आओ यदि तुझे स्वर्ग से पलटने में देर होगी तो मैं
तेरे कुटुम्ब के खाने पहनने का प्रबन्ध सरकारी कोष से
करवा दूँगा। नाई ने अपने मनमें विचार किया-“अच्छा
आठही दिन कहाँ का थोड़ा है, इतने दिनों में तो मैं कहाँ
का कहाँ पहुँच जाऊँगा। बीरबल की युक्ति मुझे फाँस

अकबर बीरबल विनोद $\qquad$ २१२

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अकबर बीरबल विनोद $\qquad$ २१२

न सकेगी। वह बादशाह को सलाम कर अपने घर का रास्ता
लिया।" बीरबल भी परछाईं की तरह इसके पीछे पड़ गया
था; वह इसकी सारी हरकतों को ध्यानपूर्वक देखता जा रहा
था। उसने समझ लिया था कि यह खोटा नाई बात छोड़ने
की युक्ति निकाल रहा है। अतएव इसपर बिना सच्ची चौकसी
किये काम न चलेगा।
बीरबल तो इसकी ताक में लगा ही था; ज्योंही काना नाई
दरबार से बाहर निकला, वह अपने एक स्वामिभक्त नौकर
को उसके पीछे लगा दिया। काना नाई रास्ते में अनेक प्रकार की
युक्ति सोचता विचारता हुआ अपने घर पहुँचा। अपने कुटुम्बके
स्त्री पुरुषों से दरबार की सारी बातें समझा कर बोला- "यदि
हमलोग गुप्त रीतिसे आज रात में ही नगर को छोड़कर इस
राज्य से बाहर निकल चलें तो बीरबल के कुचक्र से जीवन
रक्षा हो सकती है।" इसी बीच उसका छोटा लड़का दौड़ता
हुआ घर के भीतर आया और अपने पिता (काने नाई) से
बोला-"पिता जी आप यहाँ क्या कर रहे हैं, द्वार पर एक
सिपाही आकर बैठा है।" नाई का चेहरा फक् हो गया, उसने
कहा- "अब निश्चय मरना पड़ा। यह काम उसी बीरबल का जान
पड़ता है। इसको भयभीत देख उसकी स्त्री बोली- "स्वामी !
आप इतना डर क्यों रहे हैं; अभी चन्द रोज पहले बीरबल
भी तो गया था। जैसे वह काम कर के सजीव लौटा उसी
प्रकार आप भी लौट आइयेगा।" काने नाई ने कहा-"तू क्या
जाने बीरबल कैसे लौट आया है, उसपर तो देवी की छाया है
जिससे बच गया; मैं कदापि नहीं बच सकता। किसी

२१३ अकबर बीरबल विनोद

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२१३ अकबर बीरबल विनोद


कवि का कहना है—
“जैसा को तैसा मिले, मिले नीच को नीच।
पानी को पानी मिले, मिले कींच को कींच॥”
जैसी करनी वैसी पार उतरनी। मैंने दूसरे की बुराई की
थी वह मेरे ही सिर बीती। खैर आगे का आगे देखा जायगा,
आज ही से उसकी याद में क्यों मरूँ। सातवें दिन बादशाह
ने उसे बुलाने के लिये अपना एक सिपाही भेजा। नाई
हजामत बनाने का लुह्खर लेकर बादशाह के पास गया। यहाँ
उसे स्वर्ग भेजने की सब तय्यारी हो चुकी थी। बादशाह की
आज्ञा से बीरबल ने पहले ही से श्मशान पर घास के पुलिन्दों का
ढेर लगवा चुका था। काने को लेकर बादशाह श्मशान पर
पहुँचे और उसे एक जगह बैठाकर ऊपर से घास के पुलिन्दों
को सजवा दिया। जब यह काम समाप्त हो गया तो एक
सिपाहीको आग लगाने की आज्ञा मिली। वह उसमें तुरत
आग लगा दी। बीरबल ने इस प्रकार अपने बुद्धि बल से
काने नाई का अन्तिम संस्कार किया।
जो दूसरे के लिये खंदक खोदता है उसके लिये ईश्वर
मड़ार खोद देता है। हमें चाहिये कि दूसरों की बुराई से
सदैव बचते रहें। कौन जानता है कि किस समय
क्या का क्या हो जायगा। रुपये देने वालों को जैसे रुपयों के
बदले रुपया और सूद नफा में मिलता है, उसी तरह सेर भर
बुराई के बदले में सूद सहित सवा सेर भुगतनी पड़ती
है, और उसकी सफाई मुफ्त में हो जाती है।

<u>अकबर बीरबल विनोद</u> २१४

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<u>अकबर बीरबल विनोद</u> २१४
सौ गायों के एकमात्र अधिपति आप ही हैं
एक दिन तानसेन और बीरबल में कुछ विवाद छिड़गया,
वे प्रत्येक अपने २ को एकदूसरे से गुणी बतलाते थे । बादशाहने
कहा-“इस प्रकार तुम्हारा विवाद नहीं मिट सकता, इसके लिये
किसी को मध्यस्त बनाकर अपना न्याय करा लो ।” वे बोले-
“पृथ्वीनाथ ! आपकी आज्ञा हमें सिरोधार्य है । हम दोनों
इस बात पर सहमत हैं, परन्तु हमारी बुद्धि में नहीं आता कि
हम किसको अपना मध्यस्थ बनावें । कृपया आपही इसका
भी निपटारा कर दें । बादशाह ने कहा-“आपलोग महाराणा
प्रतापसिंह के पास जावें ।”
बीरबल और तानसेन दोनों ही एक साथ प्रतापसिंह से
जा मिले। तानसेन तो गायनाचार्य्य था ही, वह वहाँ पहुँचतेही
एक रागिनी छेड़ी । बीरबल अवसर की प्रतीक्षा करता हुआ
खामोश बैठा रहा। जब उसने देखा कि तानसेन अपने गान वाद्य से
राणा को मोहित कर बाजी मार लिया चाहता है तो बोला-
“राणाजी! हम दोनों एकही साथ साही दरबार से चलकर आपके
पास आये हैं और हम दोनोंही रास्ते में एक एक अलग अलग
मन्नतें मान चुके हैं । मैंने पुष्करजी में पहुँचकर प्रार्थना करी है
कि यदि मैं दरबार से मानपत्र प्राप्तकर लौटूँगा तो एकसौ गौ
ब्राह्मणों को दान करूँगा और मिया तानसेनजी ने खाजेखिजिर
की दरगाह में जाकर अपनी मन्नत की है कि जो मैं राणाजी से
प्रसंशापत्र प्राप्त करूँगा तो यहाँ पर एक सौ गौवों की कुरबानी
कराऊँगा । सौ गायों की जिन्दगी एकमात्र आपके हाथ है।

२१५ \hfill अकबर बीरबल विनोद

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२१५ \hfill अकबर बीरबल विनोद
\vskip 0.5em

आप चाहे उन्हें जीवदान दें वा बध करावें। यदि जिलाने का
विचार हो तबतो मुझे प्रशंसापत्र दीजिये और यदि सौ गौवों
को मरवाना हो तो तानसेन को दीजिये। राणासाहब हिन्दू
होकर भला गौवों की कुरबानी कब पसन्द कर सकते थे
उन्होंने तुरत अकबर को पत्र लिख भेजा-“बीरबल बड़ा गुणग्य
है, इसकी जितनी प्रशंसा की जाय सब थोड़ी है।” विचारे
तानसेन की गरदन झुक गई। वह चुपके से वहाँ से चलकर
दिल्ली पहुँचे अपने जीवन में फिर उन्होंने कभी बीरबल का
सामना नहीं किया।

\begin{center}
—०:\divideontimes:०—
\end{center}

\begin{center}
{\large\textbf{गरीब लड़की वेश्या के घर}}
\end{center}

दिल्ली नगर में एक अति दरिद्री मनुष्य रहता था।
उसकी हालत बड़ी अबतर थी। यहाँतक कि अन्न मिलता तो
वस्त्र नहीं और यदि वस्त्र मिलता तो अन्न का ही अभाव रहता।
उस मनुष्य को एक आठ वर्ष की कन्या थी, जो रूप रंग में
भली और शरीर की सुडौल थी। एक दिन एक दुष्ट मनुष्य
उस कन्या से मिला और उसे कुछ प्रलोभन देकर बहकाया।
जब वह बालिका छोटी बुद्धि के कारण उसके बहकावे में
आ गई तो वह उसे एक रंडी के घर ले जाकर बेच दिया।
वेश्या के घर जाकर कन्या को सब उपभोग की सामग्रियाँ
आसानीसे मिलने लगीं, खानेके लिये हरसमय नया नया और
स्वादिष्ट पदार्थ मिलता था। ऐसे सुख के उपभोग में पड़कर

अकबर बीरबल विनोद २१६

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अकबर बीरबल विनोद २१६

कन्या अपने पिता को एकदम भूलगई। इधर विचारा पिता
अपनी कन्या के लिये बहुत हाय हाय किया और अपने भर
सक उसकी बहुत खोज बीन की, परन्तु जब उसका कहीं भी
पता न चला तो लाचार होकर बैठ रहा।
वेश्या ने उस कन्या को नृत्य गान की शिक्षा दिलवाकर
उसे अपने फन में गुणागरी बना दिया। वह धीरे धीरे सारे
नगर में विख्यात हो गई। एक दिन ऐसी घटना घटी कि
वह एक जगह महफिल में नाच रही थी और उसी बीच
उसका पिता भी वहाँ पर जा पहुँचा। वह नाचने वाली कन्या
को गौर करके देखा तो मालूम हुआ कि वह उसकी ही राम-
पियारी नाम्नी कन्या है। उसके बदन में काटो तो खून नहीं;
परन्तु उस समय छेड़खानी करने से अपना अपमान समझ
कर वह चुप मार गया और उस वेश्या का पूरा परिचय लेकर
बादशाह के पास पहुँचा। जब बादशाह दरबार में आये तो
अपना एक अर्जीदावा पेश किया। बादशाह उसे पढ़ने के लिये
बीरबल को दिया। तब बीरलब उसे पढ़कर बादशाह को
सुनाया। बादशाह ने वेश्या को उसकी लड़की के सहित
तलब करने की आज्ञा दी। दूसरे दिन वेश्या कन्या के सहित
दरबार में उपस्थित हुई।
बीरबल बादशाह की अनुमति से निम्नलिखित प्रश्न
किया-“यह कन्या तुझे कहाँ से प्राप्त हुई है, और इसका पिता
कौन है?” वेश्या तो वेश्या भला वह कब की चूकने वाली थी,
इनकी पंडिताई सब पर विदित है, वह घर से ही कन्याको
भलीभाँति सिखा पढ़ा कर दरबार में लाई थी। उसने

२१७ अकबर बीरबल विनोद

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२१७ अकबर बीरबल विनोद
कहा-“पृथ्वीनाथ ! यह एक फकीर की कन्या है, जब यह
बहुत छोटी थी तभी वह फकीर इसे मेरे हाथ बेच गया था ।”
इसकी उम्र उस समय दो तीन वर्ष की थी। भली भाँति
बातचीत भी करना नहीं जानती थी। मेरे घर रहकर कई वर्षों
के बाद अब सयानी हुई है। लालन पालन के अतिरिक्त और
बहुत सा व्ययकरके मैंने इसे शिक्षिता बनाया है।
बीरबल ने उस कन्या से पूछा-“क्यों री छोकरी ! तू अपने
माता पिता को जानती है, तेरा जन्म किस जगह हुआ
था ?” लड़की बोली-“ना सरकार ! मैं तो अपने माता पिता
की सूरत भी नहीं पहचानती, जब से होश संभाले हूँ तब से
आजतक बराबर इन्हीं का साथ है और मैं इन्हीं को अपनी
माँ जानती हूँ ।” बीरबल ने वेश्या से पूछा-“तू इस लड़की
का नाम जानती है ? वेश्या बोली-“हाँ मैं इसको काशी
के नाम से पुकारती हूँ ?” बीरबल ने कहा-“अच्छा अब
आज तुम अपने घर जावो कलह दरबार के समय फिर
उपस्थित होना ।”
दूसरे दिन बीरबल ने उससे पहले ही लड़की के पिता
को तलब किया और उससे पूछा-“क्या तुम अपने लड़की का
असली नाम बतला सकते हो ?” पिता बोला-“हाँ सरकार !
मैं उसे सुभद्रा नाम से पुकारता हूँ। यह हमारे अड़ोस
पड़ोस के सभी लोग जानते हैं, आप उनसे भी पूछ सकते हैं।
बीरबल को उनके नाम के सम्बन्ध में और पूछ ताछ करने की
आवश्यकता नहीं जान पड़ी, इसलिये उसे वहीं तक रक्खा ।
इधर वेश्या भी समय पर उपस्थित हुई। इस मामले की

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बड़ी शोहरत हो गई थी इसलिये दोनों तरफ से बहुतेरे लोग
फैसला सुनने के लिये आये।
बीरबल ने चुपके से एक सिपाही को आज्ञा दी कि
इस भीड़ में घुसकर सुभद्रा सुभद्रा कई बार पुकारा, जो
कोई नाम को सुनकर कुछ भी संकुचित हो उसे पकड़
कर मेरे पास हाजिर करो। सिपाही ने चिल्लाकर सुभद्रा
को पुकारा। उसके पुकारते ही सब लोग सन्न हो गये;
परन्तु वह कन्या चुपके से खड़ी होकर इधर उधर देखने
लगी। सिपाही बीरबल की आज्ञानुसार उसका हाथ
पकड़ लिया और उसे उस के पास ले आया। वेश्या भी
लड़की के साथ हो ली।'
बीरबल ने कन्यासे पूछा— "क्यों री! तेरा नाम तो
काशी है न, फिर तू सुभद्रा के नाम से क्यों खड़ी हो गई।"
लड़की ने उत्तर दिया- "सरकार! मेरे पिता मुझे सुभद्रा
के नाम से ही पुकारते थे। अतएव सुभद्रा नाम के सुनते ही
मेरे कान खड़े हो गये।" बीरबल ने कहा- "अभी तू कल
अपने बयान में कह चुकी है कि मैं अपने पिता को नहीं
जानती और आज इस प्रकार कहती है?" वह लड़की चक्कर में
आ गई और डरवश थरथर काँपने लगी। वेश्या बीच बीचमें
अपने बचन की पुष्टि के लिये बोलना चाहती थी; परन्तु
बीरबल ने उसको डाटकर रोक दिया। वे बोले- "तू झूठी
साबित हो चुकी है क्योंकि तेरे बयानों में अन्तर पड़ रहा
है। मैं इस मिथ्या के बदले तुझे अभी दण्ड देता हूँ। यह
कह कर बीरबल ने एक कर्मचारी से कुछ सांकेतिक

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२१६ अकबल बीरबल विनोद

भाषण किया। कर्मचारी आज्ञा पाते ही एक कोड़ा हाथ में
लेकर सामने आया। उसे देखकर वेश्या डर गई, और तुरत
अपना कसूर गरदान लिया।” वह बोलो-“पृथ्वीनाथ ! मैं
इस कन्या को आज से तीन चार वर्ष पहले एक आदमी से
खरीदा था। वह आदमी मुझे झाँसा पट्टी पढ़ा इसके बदले में
काफी धन हड़प ले गया है। आप मेरे अपराधों को क्षमा करें।”
लड़की का पिता बीरबल के इसारे से अपनी कन्या के
पास खड़ा हो गया; बीरबल ने उस लड़की से पूछा-“क्या तू
इस आदमी को पहचानती है ? क्या इसकी शक्ल तेरे पिता से
मिलती है ?” लड़की को डर उत्पन्न हो गया, उसने
सोचा कि अगर झूठ बोलती हूँ तो बीरबल बीच सभा में
कोड़े लगवावेगे। अतएव सच बोलना ही अच्छा है। उसने
कहा-“हाँ हाँ यही मेरे जन्मदाता पिता हैं।” इतना कहकर वह
अपने पिता के चरणों पर गिर पडी, पिता ने उसे उठाकर छाती
से लगा लिया। बीरबल ने कहा-“वेश्या अब तेरे पास और कोई
सफाई देने की बात नहीं रही, तू एक साथही तीन अपराधों में
गिरफ्तार हुई है। पहला अपराध अबोध कन्या के फुसलाने
का, दूसरा दास ब्योसाय को तरक्की देने का और तीसरा
धोखा देने का है। इसलिये तुमको सात वर्ष की सजा दी जाती
है।” वह सिपाहियों द्वारा तत्क्षण कैद करली गई और वे
उसे लेकर कारागृह का मार्ग लिये। तब बीरबल उस
वृद्ध पुरुष को समीप बुलाकर बोले-“मैं तुम्हारी कन्या को
तुम्हें देता हूँ, परन्तु साथही इस बात की हिदायत भी करता
हूँ कि अब यह लड़की तुम्हारे यहाँ न रह सकेगी, इसलिये

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तुम्हारो और इसकी इसी में भलाई है कि एक अच्छे बर की
तलाश कर इसकी यथाशीघ्र शादी कर दो।” बूढ़े मनुष्य ने
दीवानकी उचित सलाह को मानने का बचन दिया और उससे
बिदा हो अपनी कन्या के साथ खुशी २ घर लौट आया।
महाकाली के ठट्ठे
एक दिन बीरबल को डराने के विचार से महाकाली ने
अपना हजार मुख वाला विकराल रूप धारण कर रात्रि
समय में उसको दर्शन दिया। बीरबल महामाया को देख
हँसते हँसते उनको प्रणाम किया और फिर सन्न मार
गया। इसका यह हाल देख देवी विचार-मग्न हो गई। उसने
मन में विचारा—“पहले तो मेरे ऐसे भयानक स्वरूप को
देखकर इसे डरना चाहिये था, सो यह कुछ भी भयभीत न
हुआ। दूसरे मुझे देखकर हँसा, तीसरे तुरत ही गमगीन
भी हो गया। इसलिये इसकी मार्मिक बातों का भेद
लेना चाहिये। वह प्रगट में बोली-“भक्तवर बीरबल !
तू मुझे देखकर पहले तो हँसा फिर उदास क्यों हो गया।”
बीरबल बड़ी दीनताई से बोला-“मातेश्वरी ! आप अन्तर-
यामिनी हैं, आपसे किसीका कुछ छिपाव नहीं है। फिर भी
आपके पूछने पर बिना बतलाये भी अनुचित है। मेरे हँसने
का यह सबब है कि आपका दर्शन कर मैं बड़ा आनन्दित
हुआ, परन्तु दूसरा कारण मैं नहीं बतलाऊँगा।”
जब देवी ने उसे धीरज देकर अभयदान देने का वचन

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दिया तो बीरबल बोला-“हे जगज्जननी जी! मैं अपने
मन में अनुमान कर रहा था कि मुझे केवल दो हाथ
एक सिर और एक नाक है और आपको हजार शिर
हजार नाक और केवल दो ही हाथ हैं। मैं जोखाम होने
पर एक ही नाक को अपने दोनों हाथों से साफ करते २
थक जाता हूँ, फिर जब आपको जुखाम होगा तो आप हजार
नाकों को केवल दो ही हाथों से कैसे साफ करेंगी। मुझे
इसी चिन्ता ने शोकित कर दिया था। देवी अपने भक्त
बीरबल के उत्तर से सन्तुष्ट हुई और उसको आशीर्वाद देती
हुईं अन्तर्धान हो गई।
हम दोनों एक साथ आवेंगे
एक दिन कोचीन नगर से चलकर दो व्यापारी दिल्ली
शहर में आये और घूमते फिरते एक नगर सेठ के पास जापहुँचे।
नगर सेठ के सात्विक और सरल स्वभाव को देख कर इनके
मन में बेईमानी समाई और उसे ठगने का विचार किया। ये
थोड़ेसे आभूषण भी अपने साथ लाये थे, उसे व्यापारीको दिख-
लाकर बोले-“आप मेरे इन आभूषणों को बिकवा दें तो हमपर
आपका बड़ा उपकार होगा।” व्यापारी आभूषणों को देखकर
उत्तर दिया-“आपका कहना बहुत ठीक है, पर यह कोई लड़कों
का खेल नहीं है जो इधर बनाया और उधर बिगाड़ दिया।
जब मैं इसे कुछ लोगों को दिखलाऊँगा और उन्हें पसन्द
आयेगा तब कहीं बिकेगा। आप लोग आभूषणों को मेरे
यहाँ छोड़ जाइये, फिर दूसरे दिन दोपहर में आना।”