अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल विनोद २१६
कन्या अपने पिता को एकदम भूलगई। इधर विचारा पिता
अपनी कन्या के लिये बहुत हाय हाय किया और अपने भर
सक उसकी बहुत खोज बीन की, परन्तु जब उसका कहीं भी
पता न चला तो लाचार होकर बैठ रहा।
वेश्या ने उस कन्या को नृत्य गान की शिक्षा दिलवाकर
उसे अपने फन में गुणागरी बना दिया। वह धीरे धीरे सारे
नगर में विख्यात हो गई। एक दिन ऐसी घटना घटी कि
वह एक जगह महफिल में नाच रही थी और उसी बीच
उसका पिता भी वहाँ पर जा पहुँचा। वह नाचने वाली कन्या
को गौर करके देखा तो मालूम हुआ कि वह उसकी ही राम-
पियारी नाम्नी कन्या है। उसके बदन में काटो तो खून नहीं;
परन्तु उस समय छेड़खानी करने से अपना अपमान समझ
कर वह चुप मार गया और उस वेश्या का पूरा परिचय लेकर
बादशाह के पास पहुँचा। जब बादशाह दरबार में आये तो
अपना एक अर्जीदावा पेश किया। बादशाह उसे पढ़ने के लिये
बीरबल को दिया। तब बीरलब उसे पढ़कर बादशाह को
सुनाया। बादशाह ने वेश्या को उसकी लड़की के सहित
तलब करने की आज्ञा दी। दूसरे दिन वेश्या कन्या के सहित
दरबार में उपस्थित हुई।
बीरबल बादशाह की अनुमति से निम्नलिखित प्रश्न
किया-“यह कन्या तुझे कहाँ से प्राप्त हुई है, और इसका पिता
कौन है?” वेश्या तो वेश्या भला वह कब की चूकने वाली थी,
इनकी पंडिताई सब पर विदित है, वह घर से ही कन्याको
भलीभाँति सिखा पढ़ा कर दरबार में लाई थी। उसने