अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल विनोद २२०
तुम्हारो और इसकी इसी में भलाई है कि एक अच्छे बर की
तलाश कर इसकी यथाशीघ्र शादी कर दो।” बूढ़े मनुष्य ने
दीवानकी उचित सलाह को मानने का बचन दिया और उससे
बिदा हो अपनी कन्या के साथ खुशी २ घर लौट आया।
महाकाली के ठट्ठे
एक दिन बीरबल को डराने के विचार से महाकाली ने
अपना हजार मुख वाला विकराल रूप धारण कर रात्रि
समय में उसको दर्शन दिया। बीरबल महामाया को देख
हँसते हँसते उनको प्रणाम किया और फिर सन्न मार
गया। इसका यह हाल देख देवी विचार-मग्न हो गई। उसने
मन में विचारा—“पहले तो मेरे ऐसे भयानक स्वरूप को
देखकर इसे डरना चाहिये था, सो यह कुछ भी भयभीत न
हुआ। दूसरे मुझे देखकर हँसा, तीसरे तुरत ही गमगीन
भी हो गया। इसलिये इसकी मार्मिक बातों का भेद
लेना चाहिये। वह प्रगट में बोली-“भक्तवर बीरबल !
तू मुझे देखकर पहले तो हँसा फिर उदास क्यों हो गया।”
बीरबल बड़ी दीनताई से बोला-“मातेश्वरी ! आप अन्तर-
यामिनी हैं, आपसे किसीका कुछ छिपाव नहीं है। फिर भी
आपके पूछने पर बिना बतलाये भी अनुचित है। मेरे हँसने
का यह सबब है कि आपका दर्शन कर मैं बड़ा आनन्दित
हुआ, परन्तु दूसरा कारण मैं नहीं बतलाऊँगा।”
जब देवी ने उसे धीरज देकर अभयदान देने का वचन