अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context२०३ अकबर बीरबल बिनोद
होकर बोले-“ऐ नीच सरदार खाँ ! तुमको मैंने इतना
ऊंचा पद प्रदान किया था जिसका तूने मुझे इस प्रकार से
बदला चुकायो, जा मुँहमें कालिख लगाकर मेरी आँखों से
ओझल हो जा। फिर बीरबल ने तुरत उसे कारागृह में
भेज दिया। इसका प्रभाव दूसरे सरदारों पर भी बड़ा गहरा
पड़ा। वे डरवश थरथर काँपने लगे।”
दूसरे दिन सरदारखाँ बादशाह की आज्ञा से भरी सभा
में उपस्थित किया गया और सबके सामने उसको कड़ी सजा
भुगतने का हुक्म सुनाया गया। मुसलमान दरबारी और सर-
दार लोग बीरबल से बहुत चिढ़गये और सभों ने आपस में
मिलकर बीरबल को दर्बार से निकाल बाहर करने की गुप्त चेष्टा
करने लगे। उन्होंने गुप्तरूप से बीरबल की बड़ी शिकायत की
परन्तु बादशाह उनकी एक बात भी सच्ची नहीं मानते थे
उनका बीरबल पर सच्चा अनुराग था और वे उसकी अनेकों
परीक्षाएँ भी ले चुके थे। जिस कारण उन्हें बीरबल पर
कभी अविश्वास नहीं होता था। उन लोगों का जब कोई
चारा न चला तो एक काने नाई को मिलाया और उसे
धन का प्रलोभन देकर इस काम के लिये अग्रसर किया। एक
दिन वह नाई हजामत बनाते समय बादशाह को पिघला कर
बोला-“पृथ्वीनाथ ! आप रोज बड़े से बड़े कर्म किया करते हैं
परन्तु एक बात पर आपने कभी विचार नहीं किया। आप के
बाप दादों को स्वर्ग गये एक जमाना गुजर गया; परन्तु
आपने उनकी सुधि तक न ली, भला वे अपने मन में आपको
क्या कहते होंगे, कहीं वे आपसे नाराज हो जायें तो फिर कौन