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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

१६६ अकबर बीरबल विनोद

१६६ अकबर बीरबल विनोद
उठकर !अपने पति से क्षमा प्रार्थना की। वह सदैव के
लिये उसकी चेलिन हो गई।
बीरबल के द्वेषियों का दिल टूट गया और उसी तारीख
से लोगों ने उसका अनिष्ट सोचना छोड़ दिया।
———०*०———
गद्दी पर पाखाना
सिंहल द्वीप का बादशाह् दिल्लीधीश्वर से कुछ भीतर २
कुढ़ा करता था। एक दिन उसे नीचा दिखानेके अभिप्राय से एक
वेश्या को कुछ सिखला पढ़ाकर दिल्ली भेजा। वह वारांगना
महासुन्दरी और नृत्य कला की पूर्ण पण्डिता थी। उसने
दिल्ली नगर में पहुँचकर एक बढ़िया मकान सड़क के
चौराहे पर किराये में लिया और उसमें नित्य सायंकाल में
श्रृङ्गार कर गायन वाद्य किया करती थी। तबला और
सारंगी बजाने वाले भी सिंहल द्वीप ही से अपने साथ
लायी थी। धीरे २ इसकी शोहरत नागरिकों में फैली। वे उसके
पास अधिक संख्या में आने जाने लगे, वह किसी से कुछ नहीं
लेती थी बल्कि आगतोंकी बड़ी प्रीतिपूर्वक स्वागत करती थी।
इसकी ऐसी प्रतिष्ठा सुनकर बादशाह के कितने दरबारी भी
गुप्तरूप से उसके पास आये और उसकी आवभगत और कलावि-
शेषता से मुग्ध होकर लौटे। यह बात बड़े तेजी से अमीर गरीबके
कानों तक फैल गई। जब बादशाह ने इस नवयौवना वेश्या की
प्रशंसा अपने दरबारियों के मुख से सुनी तो उसे भी उसको
देखने की इच्छा हुई। वह उसके मकान पर नहीं जा सकता।