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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

अकबरबीरबल विनोद ६२

अकबरबीरबल विनोद ६२
ऐसी ईर्ष्या वश केशवदास उसको अपने पंजे में फाँस
लेना चाहता था। उसे विश्वास था कि यदि वह रुपये न देगा
तो दीनदयाल की इतनी ख्याति है कि कहीं न कहीं से
रुपये अवश्य प्राप्तकर लेगा। सुअवसर आया देख उसने अपनी
दुष्ट प्रकृत्यानुसार एक तरकीब खूब सोच विचारकर निकाली
और दीनदयाल से बोला—"महाशय जी ! आज आप
कर्ज लेने के विचार से पहले पहल मेरे द्वार पर आये हैं अत-
-एव मैं इतने अल्प समय के लिये रुपयों का सूद लेना उचित
नहीं समझता; परन्तु इसके साथ आपको भी मेरी एक शर्त
माननी पड़ेगी। यदि आप एक हफ्ते में मेरे रुपये वापस न
करदेंगे तो मैं अपने हाथ से आपके शरीर के किसी भी भाग
से एक सेर मांस काट कर निकाल लूँगा।"
दीनदयाल ने रुपया लौटाने का पहले ही से इतना थोड़ा
समय रक्खा था कि उसके अन्तरगत उसका लौटाया जाना
कठिन था। अब तो मारवाड़ी ने तीन दिनों, की अवधि
और कम कर दी। परन्तु हुण्डी सकरने की कोई दूसरी सूरत
न देख दीनदयाल को लाचार होकर मारवाड़ी के शर्तनामे
पर हस्ताक्षर कर रुपये लेने पड़े। घर पहुँच कर उन रुपयों से
उसने हुण्डी की रकम अदा करदी। लेनदार रुपये पाकर
लौट गये और ईश्वर की कृपा से उसकी धाक जस की तस
बनी रही।
दीनदयाल को किसी कार्य्य विशेष के कारण एक दूसरे
नगर को जाना पड़ा। जब लौट कर घर आया तो उसको
मारवाड़ी के रुपये चुकाने की बात याद आई। इतने अल्प