अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल विनोद ४२
अकबर बीरबल विनोद ४२
परन्तु सभी देखनेवाले उसको नहीं देख पाते हाँ जो जन्मजा-
कुलीन और कर्म से पवित्र होते हैं वे उसे तुरत देख लेते हैं।”
बीरबल की इन बातोंसे बादशाह और घबड़ाया और मनमें
कल्पना करने लगा“—सबको तो वह स्वर्ग की परी और
उसकी दासी प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ती है और मुझे नहीं;
इसका क्या कारण है? हो न हो; मैं ही वर्णशंकर होऊँ।
अब तक मैं अपने को वर्णशंकर नहीं समझता था, परन्तु
आज इस स्वर्ग की परी के सामने परीक्षा होने पर मुझे
अपना वर्णशंकर होना निश्चित हो गया। मेरे ऐसे पतित
जीवन को कोटिशः धिक्कार है। अब मुझे इस भेद को
छिपाना आवश्यक है नहीं तो प्रजावर्ग में मेरी बड़ी अपकीर्ति
फैलेगी, मुँहपर तो सब वाह वाह करेंगे पीछे वर्णशंकर समझ
कर मेरी हँसी उड़ावेंगे। इतने में बीरबल फिर अंगुली का
संकेत करता हुआ बोला—“देखिये २ पृथ्वीनाथ ! वह चन्द्रा-
नना बैठी है और उसकी दासी बगल में खड़ी है। बादशाह
ने लाचार होकर उसकी बात मानली और बोला-“हाँ हाँ
अबकी बार वह मुझे प्रत्यक्ष दीख पड़ी। वह खिड़की में
खड़ी होकर इधर को ही देख रही है।”
बादशाह को परी का देख पड़ना स्वीकार करने पर
बीरबल सब सभासद और नये मंत्री के सहित महल के
चौथे खण्ड पर गया। वहाँ पर पहले से मुलायम कोंच और
मखमल की तकिया सुसज्जित रक्खी जा चुकी थी, बीरबल
बादशाह को कोंच पर बैठाकर उनसे गपाष्टक मारने लगा, पर
यह बात बादशाह को पसंद नहीं आती थी, उसका मन तो
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परी के देखने में लगा था। वह तत्क्षण बादशाह के मनकी
बात ताड़ गया, जल्दी में फूल और इत्र तथा गुलाबजल से
सबका स्वागतकर बोला-"गरीबपरवर ! आप और आपके
साथी मृत्यु लोक के वस्त्राभूषणों को धारण किये हुए हैं,
और ये सब नश्वर हैं, मैं सबको स्वर्गीय वस्त्र देता हूँ कृपया
उसे धारण कर इहलोक और परलोक दोनों का सुख अनु-
भव करें । ये कपड़े मैं पहले ही से अपने साथ लेता आया
हूँ और ये कभी नष्ट होने वाले भी नहीं हैं। भला बीरबल के
चकमें से कौन निकल सकता था, बादशाह के स्वीकार करते
ही सब लोग अपने कपड़े उतार २ कर अलग धर दिये
और बीरबल के दिये कपड़ों को धारण करने पर उद्यत
हुए। बीरबल कुछ सोच विचार कर बादशाह को तो असली
वस्त्र पहनाया परन्तु दीवान आदिकों को इतना ही कहकर
रह गया कि इन स्वर्गीय कपड़ों को पहन लीजिये ।
नये दीवान ने अपनी आँखों के सामने कोई वस्त्र न देख
कर मन में सोचा-"ऐसे कपड़े पहनने का अर्थ तो अपने को
नग्न करना है; परन्तु बीरबल की बात नामंजूर कर वर्णशंकर
कौन बने, इस बेइज्जती से तो नग्न होकर रहना ही अच्छा
है। उसके बदन पर केवल पाजामाशेषथा उसे भी उतार कर
अलग फेंक दिया और ऐसा ढोंग बनाया मानों लोगों के देखने
में स्वर्गीय कपड़े ही पहन रहा हो। फिर कपड़े पहने हुओं के
समान ऐँड़कर अपनी जगह पर नंग धड़ंग जा बैठा। उसके
बदन पर यदि एक लगोट न रह गया होता तो गुप्तेन्द्रियाँ
भी प्रगट दिखलाई पड़ने लगतीं। दीवान का ऐसा भेष