अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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है। मैं उनका सन्देश आपसे कह कर अपने पाप दोष से बरी
होगया हूँ। तब बादशाह बोले-“बीरबल ! मैने तेरी बातें और
अपने पित्रों का सन्देशा तो सुन लिया, परन्तु आखिर इसका
उपाय क्या है, भला यहाँ पर ऐसा कौन नाई है जिसे भेजूं?”
बीरबल बोला-“हाँ इस विषय पर मैंने पहले विचार किया
था और अब भी आँखें फैलाकर देखता हूँ तो मुझे अपने काने
नाऊ के सामने दूसरा कोई भी नहीं जँचता। वह घास के
धुएँ के साथ स्वर्ग में बड़ी आसानी से पहुँच जायगा।”
बादशाह को बीरबल की युक्ति जँच गई और वे काने नाऊ
को बुलवाकर सब समाचार कह सुनाये। काने नाई को बीर-
बल का सजीव लौटना सुनकर बड़ा दुख हुआ। उसे स्वर्ग
जाने के लिये उसे बाध्य होना पड़ा। बिचारे को अपनी मृत्यु
प्रत्यक्ष नाचती हुई दिखलाई पड़ी। जान बचाने का कोई
दूसरा मार्ग न देखकर उसने बादशाह से एक मास की
मुहलत ली। इस मुहलत से उसका प्रयोजन छिपकर भाग
जाना था। बादशाह इतनी लम्बी छुट्टी स्वीकार नहीं
किये और बोले-“स्वर्ग में क्षौर कराने के लिये हमारे पितर
बड़े आकुल हो रहे हैं; इसलिये तू अपने घर का पूरा पूरा
प्रबन्ध करके एक हफ्ते के भीतर जानेके लिये तय्यार होकर
लौट आओ यदि तुझे स्वर्ग से पलटने में देर होगी तो मैं
तेरे कुटुम्ब के खाने पहनने का प्रबन्ध सरकारी कोष से
करवा दूँगा। नाई ने अपने मनमें विचार किया-“अच्छा
आठही दिन कहाँ का थोड़ा है, इतने दिनों में तो मैं कहाँ
का कहाँ पहुँच जाऊँगा। बीरबल की युक्ति मुझे फाँस