अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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अकबर बीरबल विनोद २०८
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का शिकार किया हो।
बीरबल ने बादशाह से अनुमति लेकर गुप्त सुरंग के द्वार
पर प्रसन्नता-पूर्वक जा बैठा और नाई के कथनानुसार उसके
ऊपर घास फूसों का पुलंदा सजाकर चुना जाने लगा। बीर-
बल समय की प्रतीक्षा कर रहा था। जब उसने देखा कि अब
मैं घास के पुलिन्दों से भलीभाँति ढक दिया गया और यहाँ से
खिसकने में किसी की दृष्टि नहीं पड़ सकती तो सुरंग का
द्वार खोलकर उसके द्वारा कुशल-पूर्वक अपने घर जा पहुँचा।
और फिर छद्म भेष धारण कर श्मशान की घटना देखने के
लिये घाटपर जा पहुँचा। अभी तक घास चुनी जा रही थी।
जब सब घास भलीभाँति चुन दी गयी तो बादशाह की
आज्ञा से उसमें आग डाल दी गई, बहुतेरी हिन्दू जनता बादशाह
की मूर्खता की समालोचना करने लगी कारण कि बीरबल
की सुन्दर नीति से उन्हें बड़ा अनुराग था। इस प्रकार
श्मशान पर एकत्रित जनता का एक बहुत बड़ा भाग बादशाह
की आपकीर्ति फैलाने लगा-हाय ! हाय ! दीवान अब जीवित
नहीं होगा, अब हमें फिर उसके दर्शन की आशा न रही।
उसके कर्म में ब्रह्मा ने यही लिखा था।”
बीरबल क्रमशः उपस्थित जनता में घूमता फिरता मुस-
लमानों की टोली में जा पहुँचा। वे आपस में कह रहे थे-“हम
लोगों के मार्ग का कंटक आज इस प्रकार से टला। अब कोई
मुसलमान नया दीवान चुना जायगा। यह नालायक हम
लोगों को कभी गर्दन सीधी करने का मौका ही नहीं देता।
अब हमको आनन्द ही आनन्द का उपभोग होगा।”