सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 292 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 221

२०७ अकबर बीरबल विनोद


काने नाई की है। परन्तु इस समय इससे बचने के उपाय
सोचने चाहिये। बाद को मैं उससे निपट लूँगा।” वह बाद-
शाह से बोला-“गरीब परवर! मसल मशहूर है कि लोग जाते
तो अपने मन से हैं और आते दूसरों के मन से। जो
आपके पितृलोग मुझे वहाँ कुछ समय के लिये रोक लगे तो
मुझे विवश होकर उनका कहना मान कर रहना पड़ेगा। अतएव
हमारे कुटुम्ब के भरण पोषण का प्रबन्ध होना चाहिये। वहाँ
से मेरे लौटने का कोई निश्चित काल नहीं है, यदि
मुझे सवा लाख सिक्के मिलें तो मैं घर का सब प्रबन्ध करके
जाऊँ। मुझको इस कार्य के लिये दो मास का अवकाश
मिलना चाहिये।
बादशाह ने बीरबल की मांग स्वीकार करली। उन
रुपयों को बीरबल ने सुरंग खुदवाने में खर्च किया। यह
सुरंग बीरबल के आँगन से प्रारम्भ होकर स्मशान तक पहुँ-
चती थी। इसकी तयारी बड़ी सावधानी से की गई। बादशाह
को इस बात की हवा तक न छूने पाई। दो मांस में सुरंग
बनकर तयार हो गई। अब बीरबल बादशाह के पास गया
और सलाम कर बोला-“पृथ्वीनाथ! अब मैं अपने घरेलू कामों
को बिल्कुल ठीक कर स्वर्ग जाने के लिये तय्यार होकर आया
हूँ। बादशाह को इसमें बड़ी दिलचस्पी थी, वह तमाशा
देखने के अभिप्राय से अपने दरबारियों के सहित स्मशान पर
पहुँचा। काना नाई की तो पौ बारह थी, उसकी प्रसन्नता
का कहीं ठिकाना नहीं था। वह ऐसा फूला हुआ था मानो
किसी अहेरी ने बिना परिश्रमही बहुत बड़े बलिष्ठ जानवर