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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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२०६ अकबर बीरबल विनोद
और आगे बढ़कर बीरबल ने देखा तो काना नाई खूब डींग
मार रहा है और बहुतेरे ही मुसलमान एकत्रित होकर
उसकी बातें सुन रहे हैं। उसने कहा-"यह मेरी ही करतूत
से आज इस अधोगति को प्राप्त हुआ है; यदि मैं इतनी युक्ति
न लड़ाता तो भला कोई उसका एक बाल भी बाँका कर सकता
था। मीर खाँ, अब आप अपने कौल के अनुसार मुझे पुरस्कार
दीजिये।" आपने अपनी आँखों देखा है कि वह भीतर ही
भीतर जलकर खाक हो गया, अब किसी को उसकी हड्डी
गुड्डी भी देखने को नसीब न होगी।"
बीरबल उसकी डींग सुन सुनकर जहर की घूँट घोंट रहा
था, कभी २ तो क्रोध के आवेश में आकर दाँतों तले ओठ दबाकर
रह जाता था। वह मनही मन बोला-"न घबराओ, अबकी बीर-
बल के हाथ से तुम्हारा छूटना कठिन है। मेरी ओसरी खतम
हो गई; अब तुम्हारी बारी है। जब सब घास जल गई, तो लोग
अपने अपने घर चले गये। बीरबल भी चुपके से अपनी गुप्त
कोठरी में जा बैठा। परन्तु उसे चैन कहाँ। रातके समय नित्य
नगर में फेरी लगाया करता था। गुप्तबास करते हुए जब
कई महीने बीत गये तो बीरबल ने अपने प्रकट होने का
निश्चय किया। इतने दिनों में उसको दाढ़ी और मूँछ पर्याप्त
बढ़ चुकी थी। सिर पर बड़ी बड़ी जटाएँ उग आई थीं।
इसी वेश में बीरबल ने दरबार में जाना उत्तम समझा।
तब एक दिन वह दरबारी कपड़ों से सुसज्जित होकर
बादशाह के पास गया। नगर में उसे बहुतेरे परिचित
मिले; परन्तु उसका रूपान्तर हो जानेके कारण वे उसे पहचान
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