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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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Page 227

२१३ अकबर बीरबल विनोद


कवि का कहना है—
“जैसा को तैसा मिले, मिले नीच को नीच।
पानी को पानी मिले, मिले कींच को कींच॥”
जैसी करनी वैसी पार उतरनी। मैंने दूसरे की बुराई की
थी वह मेरे ही सिर बीती। खैर आगे का आगे देखा जायगा,
आज ही से उसकी याद में क्यों मरूँ। सातवें दिन बादशाह
ने उसे बुलाने के लिये अपना एक सिपाही भेजा। नाई
हजामत बनाने का लुह्खर लेकर बादशाह के पास गया। यहाँ
उसे स्वर्ग भेजने की सब तय्यारी हो चुकी थी। बादशाह की
आज्ञा से बीरबल ने पहले ही से श्मशान पर घास के पुलिन्दों का
ढेर लगवा चुका था। काने को लेकर बादशाह श्मशान पर
पहुँचे और उसे एक जगह बैठाकर ऊपर से घास के पुलिन्दों
को सजवा दिया। जब यह काम समाप्त हो गया तो एक
सिपाहीको आग लगाने की आज्ञा मिली। वह उसमें तुरत
आग लगा दी। बीरबल ने इस प्रकार अपने बुद्धि बल से
काने नाई का अन्तिम संस्कार किया।
जो दूसरे के लिये खंदक खोदता है उसके लिये ईश्वर
मड़ार खोद देता है। हमें चाहिये कि दूसरों की बुराई से
सदैव बचते रहें। कौन जानता है कि किस समय
क्या का क्या हो जायगा। रुपये देने वालों को जैसे रुपयों के
बदले रुपया और सूद नफा में मिलता है, उसी तरह सेर भर
बुराई के बदले में सूद सहित सवा सेर भुगतनी पड़ती
है, और उसकी सफाई मुफ्त में हो जाती है।