अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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सा उपाय कीजियेगा?" बादशाह ने कहा- "इतने दिनों तक तो
मुझे उनकी सुधि न रही, परन्तु अब तुम्हारे कहने से मुझे भी
विचार करना पड़ा। भाई ! सबसे बड़ी अड़चन की एक बात है
कि आखिरस इस काम के लिये किसे भेजूं ।" तब उस काने
नाईने कहा-"आप अपने पितरों की कमाई तो ले लेते हैं; परन्तु
अब उनकी खोज खबर तक नहीं लेते, भला वे क्या कहेंगे।
बादशाह बोला- "आखिर इस काम को करने के लिये
तुमने किसको उपयुक्त सोचा है। फिर वह जायगा किस
मार्ग से।" तब नाई बोला-"पृथ्वीनाथ ! यह तो आप जाने
कि किसे भेजना चाहिये; परन्तु जाने का मार्ग मैं आपको
बतला सकता हूँ। बादशाह ने कहा-"भली बात है तू शीघ्र
बतला।" काने ने कहा-"आप जिस आदमी को भेजना चाहें
उसे स्मशान पर भेजकर पहले उसके ऊपर घास के बहुत
से पुलिन्दे डलवा दें। जिससे ऊपर से देखने में वह मीनार
के समान देख पड़े फिर उसमें आग लगा देने से वह आदमी
धुयें के साथ पितर लोक में आपसे आप पहुँच जायगा
(भीतर ही भीतर) बिना औषधि के ही बाधा दूर हो
जायगी।"
बादशाह बोला- "यह तो हुआ परन्तु भेजें किसे, यह
भी तू ही निश्चय कर दे।" वह बोला-"भेजे तो वह
जिसे आगे पीछे दीपक भी दिखाने वाला कोई न हो, आपके
यहाँ तो हजारों आदमी एक से एक धकड़ पड़े हुए हैं, हाँ
वह काम बड़े चतुर आदमी का है।" बादशाह ने कहा-"भाई
केवल इतना कह देने से मेरा काम नहीं सरता; आखिर तुम