अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
८१ अकबर बीरबल विनोद
८१ अकबर बीरबल विनोद
में बैठकर भोजन कर रहे थे। उनकी थाली में परोसे खाद्य पदार्थ
में एक बाल निकला जिसकारण पंडितजी को बड़ा रंज हुआ
और अपनी स्त्रीको संबोधित कर बोले-"देखो ! आज तो
मैं तुम्हारी पहली चूकके कारण तुम्हें क्षमा करता हूँ परन्तु फिर
यदि ऐसी असावधानी करोगी (खाद्य पदार्थ में बाल
निकलेगा) तो तुम्हारे शिर के बाल मूड़ लूँगा।" "हरि इच्छा
भावी बलवाना।" यद्यपि बिचारी स्त्री अपने स्वामी का जिद्दी
स्वभाव समझ कर बराबर भयभीत रहा करती थी और
भोजन बनाने वा परोसने के समय अपने बालों को खूब
सम्भार कर बाँधे रहती थी, परन्तु होनी को कौन रोक सकता
है, वह तो होकर ही रहती है। कुछ दिनोपरान्त एक दिन जब
युक्त पंडितजी फिर भोजन करने बैठे तो उनकी खाद्यसामग्री
में एक बाल निकला, पंडितजी बहुत नाराज हुए और अपने
स्त्री का बाल मुड़ा देने के लिये नाई को बुलवाया। अपने
स्वामी को नितान्त क्रोधित देखकर स्त्री ने भीतर से किवाड़
बन्द कर लिया। पंडित जी ने हजार हूँ डाट फटकार सुनाई
परन्तु स्त्री ने किवाड़ नहीं ही खोला। इतना सब होजाने पर भी
पंडित जी अपनी जिद्द पर तुले ही रहे। स्त्री ने सोचा "अब
इस प्रकार काम चलना कठिन दीख पड़ता है, कोई उपाय
तत्काल करनी चाहिये। उसने एक आदमी को पोहर भेजकर
अपने भाइयों को सहायता के लिये बुलवाया।
उसके चार भाई थे, अपनी बहिन को इस प्रकार अपमानित
होते सुन उन्हें अपने बहनोई के हठवादिता पर बड़ा खेद हुआ
और उसके उद्धार का उपाय सोचने लगे। इतने में उसके बड़े
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अकबर बीरबल बिनोद ८२
भाई को बीरबल से पुराना परिचय होने का स्मरण हो आया ।
वह तत्क्षण बहन के उद्धार का उपाय पूछने के लिये बीरबल
के घर पहुँचा । उस समय बीरबल चारपाई पर पड़े २ पुस्तक
पढ़ रहा था, अपने मित्र का सन्देशा सुन उसे पास बुलाकर
उसका कुशल समाचार पूछा । वह अपने बहिन की दुर्दशा का
आद्योपान्त कारण बतलाकर बोला- "मैं आपसे अपने बहिन के
उद्धार की तरकीब बूझने आया हूँ । मेरी मदद कीजिये ।”
बीरबल बोला—"तुम चारो भाई नंगे सिर होकर अपने
बहनोई के पास इस ढंग से जावो मानो कोई मर गया हो;
तब तक मैं भी आ पहुँचता हूँ। उधर पंडितजी स्त्री के द्वार
न खोलने पर क्रुद्ध होकर नौकरों से कहा- "अभी बढ़ई को बुला
लाकर दरवाजे को तोड़ डालो। इसी बीच वे चारो भी नंगधड़ंग
सिर खोले आ पहुँचे। इनके आनेके थोड़ी देर पश्चात बीरबल
भी शवदाह का सब सामान लिये हुए आया और पंडितजी के
ऐन द्वार पर टिकठी बाँधने लगा। उधर स्त्री के भाइयों ने
पंडितजी को जबरन चारोतरफ से कपड़े से ढक कर कफनि-
याना प्रारम्भ किया, जब पंडितजी ने चींचप्पड़ मचाया तो वे
क्रोधित होकर बोले-“खबरदार ! चुपचाप पड़े रहो, बिना पहले
तुम्हें कफनियाये किसकी मजाल है जो मेरी बहन को हाथ
लगाये।” वे पंडितजी को बाँध कर बीरबल के पास ले
गये। इस नवीन कौतूहल को देखने के लिये वहाँ पर
आदमियों की जमघट सी लग रही थी । अपने पड़ोसियों के
सामने अपनी ऐसी दुर्गति देख पंडितजी का शिर लज्जा के बोझ
से दब गया और अपनी रिहाई के लिये चारो सालों से अनुनय