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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

अकबर बीरबल विनोद १११

Page 125Permalink

अकबर बीरबल विनोद १११
लेकर एक प्रश्न अपनी तरफ से किया। बादशाहने दरबारियों
को उत्तर देने के लिये उत्तेजित किया। उसका प्रश्न इस
प्रकार था-“किवाड़ बन्द करते समय उसमें चुरमुर चुरमुर
शब्द किस कारण होता है।" यानी उसका भावार्थ क्या है?
सब लोग अवाक होगये। उसकी शंका का समाधान करने में एक
दरबारी भी समर्थ न हुआ। बादशाह उसकी बुद्धिकी बड़ी प्रशंसा
की और मन ही मन बोला-“बहुत दिनों के बाद आज मुझे
बीरबल सा निपुण दीवान मिला है।" उसके मन से बीरबल
के अभाव की चिन्ता घट गई और दीवान के योग्य पोशाक
पहना कर उसे बीरबल के स्थान पर नियुक्त करने का विचार
प्रकट किया। तब उम्मीदवार बोला-“गरीबपरवर ! मैं दीवान
बनने की योग्यता नहीं रखता; कारणकी जिसकार्यको बीर-
बल सा बुद्धिसम्राट निभाता था वह मैं कैसे निभा सकूँगा ?
बादशाह ने कहा--“मैं बीरबल को निकाल दिया है जिस
कारण वह चिढ़कर यहाँ से कहीं बाहर चला गया है। मैंने
उसको बहुतेरा ढुढ़वाया पर उसका कहीं पता नहीं चलता, तब
लाचार होकर दूसरा दीवान नियुक्त करने पर आमादा हुआ
हूँ। जो मैं जानता कि बीरबल अमुक स्थान में है तो मैं
यत्नपूर्वक उसे बुलवा लेता।
नये दीवान ने उत्तर दिया-“पृथ्वीनाथ आपका प्रताप
पृथ्वी के कोने कोने में फैला हुआ है, यदि आप तनमय होकर
उसका खोज कराते तो वह कभी का प्रगट हो गया होता।"
बादशाह ने कहा-“नहीं ऐसी बात नहीं है, मैंने उसके लिये
बहुतेरा प्रयास किया, परन्तु उसको ढूढ़ नहीं पाया। हाँ