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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

अकबर बीरबल विनोद ११६

अकबर बीरबल विनोद ११६
निकलने का कोई रास्ता नहीं मालूम था । दैवात्
बादशाह को जोर से टट्टी लगी। वह घोड़े को एक पेड़ से
बाँध कर घनी झाड़ियों की तरफ गया और पाखाने फिरने
लगा । एक भयानक भेषधारी-राक्षस रूप, काला भुशुण्ड,
बाल बढ़ाये, बड़े-बड़े दाँत आगे को निकाले विहंगम डीलडौल
का दिखलाई पड़ा। वह डाकता कूदता तथा उछलता
हुआ दहाड़ने लगा। थोड़ी देर बाद वह बादशाह के समीप
आ पहुँचा और अपनी तेज आँखों से घूर कर बोला-“तू बड़ा
प्रजापीड़न करता है; अतएव आ कर मेरा भक्ष बन !”
उसका इतना कहना था कि बादशाह एकदम भयकातर
हो गया और काँपता हुआ उस देव से बोला-“हे देव ! मैं
आपके सामने प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज से फिर प्रजा को कभी
न सताऊँगा, आप कृपा कर मुझे जीता-जागता छोड़ दीजिये ।”
तब उस देव से अधिक कुछ करते न बना और बादशाह से
कहा-“अब तेरे प्राण बचने का एकमात्र यही साधन है कि
तू मेरे जूतों को अपने शिर पर रखकर एक फर्लाङ्ग मेरे साथ
चले, अन्य कोई उपाय मेरे पास नहीं है यदि जान बचाना
चाहता है तो आगे आ। 'मरता क्या न करता' बिचारा बादशाह
उसकी लाल पीली आँखें देखकर थरथर काँप रहा था। डरवश
उसके प्रस्ताव को स्वीकार किया । बादशाह को जूता ढोने
पर उद्यत देख विशालकाय दैत्य को दया आ गई और उसे
बिना किसी प्रकार का दण्ड दिये ही छोड़ दिया । बादशाह
नगर को चला गया-
बीरबल की छुट्टी पूरी हो चुकी थी अतएव अपनी ड्यूटी

११७ अकबर बीरबल बिनोद
पर हाजिर होने का निश्चय कर वह अपने घर आया। जब बाद-
शाह को विदित हुआ कि बीरबल तीर्थाटन कर लौट आया है
तो एक दूत उसे बुलाने को भेजा। बीरबल बादशाह के बुलावे
पर तुरत दर्बार में हाजिर हुआ और अदब से सलाम कर अपनी
जगह पर जा बैठा। बादशाह को अब भी पहली बात की ढक
सवार थी। वह बोला- "बीरबल ताक पर का सेव।" बीरबल ने
उत्तर दिया- "जी हुजूर पाखाने वाला देव।" बीरबल के इस
उत्तर से बादशाह की आँखें खुल गईं और वह अपने किये
पर शरमिन्दा हुआ। उसी दिन से सवाल का जवाब पाकर
फिर उसने बीरबल से सेव की बात कभी न छेड़ी।
कालान्तर में उसे विदित हो गया कि जंगल वाला देव
और कोई न था बल्कि वह बीरबल की ही करतूत थी। अत-
एव देव का भ्रम जो उसके हृदय में समा गया था वह
क्रमशः जाता रहा और दिन सानन्द बीतने लगे।
—:🌾:—
दर्पण में मोहरें
एक रात्रि में किसी मनुष्य को जब कि वह अचेत निद्रा
देवी की गोद में पड़ा २ विश्राम कर रहा था, ऐसा स्वप्न
दीख पड़ा- "मैं किसी वेश्या के पास सोया हुआ हूँ। तमाम रात
उसके साथ सोहबत करने के बाद उसे दस अशर्फियाँ देकर घर
लौट रहा हूँ।" जब वह नींद से जगा तो उसे स्वप्न की सारी
बातें ज्यों की त्यों स्मरण रहीं। उस का फलाफल जानने के
अभिप्राय से उस मनुष्य ने स्वप्न की बातें अपनी मित्रमण्डली