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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

अकबर बीरबल विनोद १८२

अकबर बीरबल विनोद १८२
घड़ियों को वर्ष के समान काटती हैं। प्रभु क्या यह अनुचित
नहीं है? मैं अपने हृदय की गवाही अपने मुख से कहाँ तक दें,
उसे या तो हमारा मन या अन्तर्यामी ईश्वर ही जान
सकता है। क्या आप बतलाने की कृपा करेंगे कि इस समय
आप कितने समय के बाद लड़ाई से फुरसत पाकर महल में
आये हुए हैं?" अब यदि न्याय की दृष्टि से देखें तो आपको
हमें छोड़कर जाना उचित नहीं है।
बादशाह ने कहा- "बेगम साहिबा! आप समझती हैं कि
मैं एक लड़ाई ही के काम से बाहर रह जाता हूँ परन्तु दर-
असल ऐसा नहीं होता, लड़ाई में तो कभी २ जाने का मौका
लगता है। जो मैं अपनी प्रजाओं की देखरेख न करूँ तो भला
इतना बड़ा साम्राज्य कभी टिक सकता है, मेरी अपकीर्ति
संसार में फैल जावे। दो चार दिनों की तो तुम्हारी प्रार्थ-
नाएँ भले ही स्वीकृत की जा सकती हैं। परन्तु एक साल, वा
छ मास की गुंजायश नहीं है। मेरी अयोग सेवाओं से चिढ़कर
मेरे सरदार और शाहजादे मुझ से गदर मचा सकते हैं, फिर मैं
कितनी कठिनाई में पड़ जाऊँगा; क्या कभी इसपर भी विचार
दौड़ाती हो? हाँ इतना भले ही कर सकता हूँ कि जो
समय राजकीय कामों से बचाकर शिकार आदि में
लगाता हूँ वह तुम्हारे पास ही रहकर बिताऊँगा। अब
इससे अधिक और क्या चाहिये।"
बादशाह के ऐसे रूखे उत्तर से सकुचाकर बड़ी बेगम साहिबा
ने कहा- "प्रभु आप सारी बातें भले ही सही २ कहते हों, परन्तु
फिर यह भी विचार करें कि हम घर में रहने वाली बेगमों