अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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आप चाहे उन्हें जीवदान दें वा बध करावें। यदि जिलाने का
विचार हो तबतो मुझे प्रशंसापत्र दीजिये और यदि सौ गौवों
को मरवाना हो तो तानसेन को दीजिये। राणासाहब हिन्दू
होकर भला गौवों की कुरबानी कब पसन्द कर सकते थे
उन्होंने तुरत अकबर को पत्र लिख भेजा-“बीरबल बड़ा गुणग्य
है, इसकी जितनी प्रशंसा की जाय सब थोड़ी है।” विचारे
तानसेन की गरदन झुक गई। वह चुपके से वहाँ से चलकर
दिल्ली पहुँचे अपने जीवन में फिर उन्होंने कभी बीरबल का
सामना नहीं किया।
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{\large\textbf{गरीब लड़की वेश्या के घर}}
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दिल्ली नगर में एक अति दरिद्री मनुष्य रहता था।
उसकी हालत बड़ी अबतर थी। यहाँतक कि अन्न मिलता तो
वस्त्र नहीं और यदि वस्त्र मिलता तो अन्न का ही अभाव रहता।
उस मनुष्य को एक आठ वर्ष की कन्या थी, जो रूप रंग में
भली और शरीर की सुडौल थी। एक दिन एक दुष्ट मनुष्य
उस कन्या से मिला और उसे कुछ प्रलोभन देकर बहकाया।
जब वह बालिका छोटी बुद्धि के कारण उसके बहकावे में
आ गई तो वह उसे एक रंडी के घर ले जाकर बेच दिया।
वेश्या के घर जाकर कन्या को सब उपभोग की सामग्रियाँ
आसानीसे मिलने लगीं, खानेके लिये हरसमय नया नया और
स्वादिष्ट पदार्थ मिलता था। ऐसे सुख के उपभोग में पड़कर